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Basti News: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को रानी के बलिदान ने बना दिया जनक्रांति
Fri, 11 Aug 2023 12:06 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Fri, 11 Aug 2023 12:06 AM IST
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शहीद स्मारक छावनी
विक्रमजोत (बस्ती)। अमोढ़ा रियासत की रानी तलाश कुंवरि के बलिदान ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को जनक्रांति बना दिया। स्वतंत्रता के इस आंदोलन में रानी पूरी ताकत से लड़ीं और अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।
आज भी गौरव के साथ याद किया जाता है। उस आंदोलन में रानी ने पूरी ताकत से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। वह वीरगति को प्राप्त हुईं। इसके बाद रानी के सिपहसालारों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग में शामिल सैकड़ों क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने छावनी में पीपल के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला नहीं डिगा। फिरंगियों को देश से खदेड़ने की लड़ाई जारी रखी और उन्हें कामयाबी भी मिली।
देश की आजादी के 76 साल पूरे होने पर हर तरफ उल्लास है। इसके पीछे उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अमर बलिदान है, जिन्हें याद कर आज भी हमें गर्व की अनुभूति होती है। ऐसा ही एक नाम महारानी तलाश कुंवरि का है, जिन्हें बस्ती ही नहीं, पूर्वांचल के लोग याद करते हैं। वह अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक थीं। एसआर पीजी कॉलेज दसिया के कार्यवाहक प्राचार्य व इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र श्रीवास्तव ने बस्ती स्वतंत्रता आंदोलन पर लंबा शोध किया और स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान शीर्षक से पुस्तक भी लिखी।
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वह बताते हैं कि सन 1852 में महाराजा जंगबहादुर सिंह के निधन के बाद रानी तलाश कुंवरि को सत्ता की बागडोर संभालनी पड़ी। उस समय अंग्रेज अपने राज्य विस्तार में पूरी ताकत झोंके हुए थे। ब्रिटिश हुकूमत की नजर एकाएक अमोढ़ा रियासत पर पड़ी। उसे हथियाने को कुचक्र रचना शुरू कर दिया। तब इर्द-गिर्द की मित्र रियासतों का संगठन बना, जिसमें अमोढ़ा भी शामिल हो गया। रियासतों ने अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में यह लड़ाई शुरू की। इधर, रानी की बढ़ती ताकत से तिलमिलाए अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए 1858 में कर्नल ह्यूज के के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज को आक्रमण के लिए भेजा। रानी और उनके सैनिक अंग्रेजों से वीरता से लड़े। अंग्रेज रानी को जिंदा पकड़ना चाहते थे, लेकिन रानी ने सौगंध ले रखी थी कि वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगेंगी। इसी संकल्प को आत्मसात कर वह अंग्रेजों से युद्ध करते पखेरवा कुंवर सम्मय माता के स्थान पर पहुंच गईं।
सिपहसालारों को बुलाकर कहा कि अब प्राण बचाना मुश्किल है। यहीं पर उन्होंने दो मार्च 1858 को छाती में कटार घोंप कर बलिदान दे दिया। रानी ने देश में बस्ती का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराया। उनकी वीरता किसी मायने में रानी लक्ष्मीबाई कम नहीं है। रानी की मौत के बाद उनके शव को सहयोगियों ने छिपा लिया। बाद में शव को अमोढ़ा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी का चौरा के पास दफना दिया गया। यह जगह रानी चौरा के टीले के नाम से प्रसिद्ध है, जबकि पखेरवा में रानी के घोड़े को दफनाया गया है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है।
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पीपल के पेड़ पर दी गई फांसी
रानी की शहादत के बाद भी क्षेत्र के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। तब अंग्रेजों की सेना ने गांव-गांव जाकर रानी के सैनिकों और उनका सहयोग करने वालों को पकड़ा। मुकदमे का नाटक कर अंग्रेजों ने डेढ़ सौ सैनिकों को छावनी में पीपल के पेड़ से लटका कर मौत के घाट उतार दिया। यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा है। करीब पांच सौ क्रांतिकारियों को अंग्रेजों
ने फांसी दी।
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छावनी शहीद स्थल पर लगता है मेला
छावनी शहीद स्थल का निर्माण वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने कराया। यहां 1992 से मेला लगता आ रहा है। यहां शिलालेख पर महारानी का जीवन परिचय लिखा है तो दूसरी तरफ शहीदों का नाम अंकित है। हालांकि शिलालेख में सिर्फ 19 शहीदों का नाम अंकित है।
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आज भी गौरव के साथ याद किया जाता है। उस आंदोलन में रानी ने पूरी ताकत से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। वह वीरगति को प्राप्त हुईं। इसके बाद रानी के सिपहसालारों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग में शामिल सैकड़ों क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने छावनी में पीपल के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला नहीं डिगा। फिरंगियों को देश से खदेड़ने की लड़ाई जारी रखी और उन्हें कामयाबी भी मिली।
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देश की आजादी के 76 साल पूरे होने पर हर तरफ उल्लास है। इसके पीछे उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अमर बलिदान है, जिन्हें याद कर आज भी हमें गर्व की अनुभूति होती है। ऐसा ही एक नाम महारानी तलाश कुंवरि का है, जिन्हें बस्ती ही नहीं, पूर्वांचल के लोग याद करते हैं। वह अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक थीं। एसआर पीजी कॉलेज दसिया के कार्यवाहक प्राचार्य व इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र श्रीवास्तव ने बस्ती स्वतंत्रता आंदोलन पर लंबा शोध किया और स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान शीर्षक से पुस्तक भी लिखी।
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वह बताते हैं कि सन 1852 में महाराजा जंगबहादुर सिंह के निधन के बाद रानी तलाश कुंवरि को सत्ता की बागडोर संभालनी पड़ी। उस समय अंग्रेज अपने राज्य विस्तार में पूरी ताकत झोंके हुए थे। ब्रिटिश हुकूमत की नजर एकाएक अमोढ़ा रियासत पर पड़ी। उसे हथियाने को कुचक्र रचना शुरू कर दिया। तब इर्द-गिर्द की मित्र रियासतों का संगठन बना, जिसमें अमोढ़ा भी शामिल हो गया। रियासतों ने अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में यह लड़ाई शुरू की। इधर, रानी की बढ़ती ताकत से तिलमिलाए अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए 1858 में कर्नल ह्यूज के के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज को आक्रमण के लिए भेजा। रानी और उनके सैनिक अंग्रेजों से वीरता से लड़े। अंग्रेज रानी को जिंदा पकड़ना चाहते थे, लेकिन रानी ने सौगंध ले रखी थी कि वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगेंगी। इसी संकल्प को आत्मसात कर वह अंग्रेजों से युद्ध करते पखेरवा कुंवर सम्मय माता के स्थान पर पहुंच गईं।
सिपहसालारों को बुलाकर कहा कि अब प्राण बचाना मुश्किल है। यहीं पर उन्होंने दो मार्च 1858 को छाती में कटार घोंप कर बलिदान दे दिया। रानी ने देश में बस्ती का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराया। उनकी वीरता किसी मायने में रानी लक्ष्मीबाई कम नहीं है। रानी की मौत के बाद उनके शव को सहयोगियों ने छिपा लिया। बाद में शव को अमोढ़ा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी का चौरा के पास दफना दिया गया। यह जगह रानी चौरा के टीले के नाम से प्रसिद्ध है, जबकि पखेरवा में रानी के घोड़े को दफनाया गया है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है।
पीपल के पेड़ पर दी गई फांसी
रानी की शहादत के बाद भी क्षेत्र के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। तब अंग्रेजों की सेना ने गांव-गांव जाकर रानी के सैनिकों और उनका सहयोग करने वालों को पकड़ा। मुकदमे का नाटक कर अंग्रेजों ने डेढ़ सौ सैनिकों को छावनी में पीपल के पेड़ से लटका कर मौत के घाट उतार दिया। यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा है। करीब पांच सौ क्रांतिकारियों को अंग्रेजों
ने फांसी दी।
छावनी शहीद स्थल पर लगता है मेला
छावनी शहीद स्थल का निर्माण वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने कराया। यहां 1992 से मेला लगता आ रहा है। यहां शिलालेख पर महारानी का जीवन परिचय लिखा है तो दूसरी तरफ शहीदों का नाम अंकित है। हालांकि शिलालेख में सिर्फ 19 शहीदों का नाम अंकित है।