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दुग्ध उत्पादन में फौजी ने बनाया रिकॉर्ड
basti
Updated Sun, 12 Nov 2017 11:27 PM IST
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उपलिब्ध्ाब्धि
- फोटो : amar ujala
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उत्साह से लबरेज, बुलंदी छूने को बेताब है फौजी राममणि त्रिपाठी का हौसला। तभी तो उन्हें नौवीं बार सरकार ने रिकॉर्ड तोड़ दूध उत्पादन के लिए गोकुल पुरस्कार से नवाजा है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उन्हें दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने गन्ना संस्थान लखनऊ में समारोहपूर्वक सम्मानित किया। वर्ष 2016-17 के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला है।
मूल रूप से फुलवरिया पांडेय गांव के रहने वाले राममणि का बचपन बेहद अभाव में गुजरा। क्योंकि तीन साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया। खेती-बाड़ी से परिवार की जीविका चला रहे थे। इसी बीच उनकी नियुक्ति थल सेना में हो गई। घर-बार परिवार के बड़े भाई देख रहे थे। सरकारी नौकरी में आने के बाद माली स्थिति सुधर ही रही थी कि इसी बीच पिता तुल्य भाई ने भी साथ छोड़ दिया। इस दौरान उनकी सेवा के सात साल हो गए थे, लेकिन अब वे परिवार को लेकर चिंतित हो उठे। देश सेवा छोड़कर वह गांव लौट आए। यहां पहुंचे तो कुछ ही दिनों में आर्थिक दिक्कतें होनी शुरू हो गईं। इससे निजात पाने के विकल्प में 1994 में उन्होेंने एक गाय और एक भैंस खरीदी। माली हालत थोड़ी सुधरी तो उनकी लगन और परिश्रम देखकर बैंक ने उन्हें ऋण मुहैया कराया। इससे गायों की संख्या बढ़ गई। मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया। अब उनके मन में दुग्ध के क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाने का सपना पलने लगा। इसके लिए वह वर्ष 2007 आते-आते अत्याधुनिक संसाधनों का प्रयोग कर डेयरी से 25 हजार लीटर दूध प्रतिवर्ष का उत्पादन करने लगे। यह दूध वह दुग्ध संघ को मुहैया कराए। दूध उत्पादन के क्षेत्र में बुलंद हौसलों ने इन्हें मुकाम दिलाया वर्ष 2009 में। इस वर्ष इनका उत्पादन 30 हजार लीटर पहुंच गया और प्रदेश सरकार ने इन्हें गोकुल पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद वे लगातार दूध उत्पादन बढ़ाते रहे और उन्हें अब तक नौ बार सरकार ने गोकुल पुरस्कार से नवाजा है।
खेत से भी पैदा हो रहा सोना
राममणि कहते हैं कि वह अपने खेतों में रासायनिक खाद का प्रयोग बिल्कुल नहीं करते। गोबर की खाद से भरपूर अनाज पैदा करते हैं जो बाजार में महंगे दामों पर बिक जाता है। दूध की गुणवत्ता प्रभावित न हो इसके लिए वह अत्याधुनिक मशीनों से पशुओं का दूध निकालते हैं।
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उत्साह से लबरेज, बुलंदी छूने को बेताब है फौजी राममणि त्रिपाठी का हौसला। तभी तो उन्हें नौवीं बार सरकार ने रिकॉर्ड तोड़ दूध उत्पादन के लिए गोकुल पुरस्कार से नवाजा है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उन्हें दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने गन्ना संस्थान लखनऊ में समारोहपूर्वक सम्मानित किया। वर्ष 2016-17 के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला है।
मूल रूप से फुलवरिया पांडेय गांव के रहने वाले राममणि का बचपन बेहद अभाव में गुजरा। क्योंकि तीन साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया। खेती-बाड़ी से परिवार की जीविका चला रहे थे। इसी बीच उनकी नियुक्ति थल सेना में हो गई। घर-बार परिवार के बड़े भाई देख रहे थे। सरकारी नौकरी में आने के बाद माली स्थिति सुधर ही रही थी कि इसी बीच पिता तुल्य भाई ने भी साथ छोड़ दिया। इस दौरान उनकी सेवा के सात साल हो गए थे, लेकिन अब वे परिवार को लेकर चिंतित हो उठे। देश सेवा छोड़कर वह गांव लौट आए। यहां पहुंचे तो कुछ ही दिनों में आर्थिक दिक्कतें होनी शुरू हो गईं। इससे निजात पाने के विकल्प में 1994 में उन्होेंने एक गाय और एक भैंस खरीदी। माली हालत थोड़ी सुधरी तो उनकी लगन और परिश्रम देखकर बैंक ने उन्हें ऋण मुहैया कराया। इससे गायों की संख्या बढ़ गई। मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया। अब उनके मन में दुग्ध के क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाने का सपना पलने लगा। इसके लिए वह वर्ष 2007 आते-आते अत्याधुनिक संसाधनों का प्रयोग कर डेयरी से 25 हजार लीटर दूध प्रतिवर्ष का उत्पादन करने लगे। यह दूध वह दुग्ध संघ को मुहैया कराए। दूध उत्पादन के क्षेत्र में बुलंद हौसलों ने इन्हें मुकाम दिलाया वर्ष 2009 में। इस वर्ष इनका उत्पादन 30 हजार लीटर पहुंच गया और प्रदेश सरकार ने इन्हें गोकुल पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद वे लगातार दूध उत्पादन बढ़ाते रहे और उन्हें अब तक नौ बार सरकार ने गोकुल पुरस्कार से नवाजा है।
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खेत से भी पैदा हो रहा सोना
राममणि कहते हैं कि वह अपने खेतों में रासायनिक खाद का प्रयोग बिल्कुल नहीं करते। गोबर की खाद से भरपूर अनाज पैदा करते हैं जो बाजार में महंगे दामों पर बिक जाता है। दूध की गुणवत्ता प्रभावित न हो इसके लिए वह अत्याधुनिक मशीनों से पशुओं का दूध निकालते हैं।
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