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डॉ. अजय की मौत से टूट गया परिवार
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डॉ. अजय की मौत से टूट गया परिवार
आर्थिक तंगी भी आन पड़ी, एक माह से अधिक उपचार में खर्च हुए करीब तीस लाख
बेटे को पिता को न बचा पाने का साल रहा है गम, पत्नी बोलीं- जिंदगी लग रही बोझ
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। घर के मुखिया की मौत से परिवार टूट गया। कोरोना काल में ड्यूटी देते समय आयुष चिकित्सक डॉ. अजय श्रीवास्तव पॉजिटिव हुए। इसके बाद उन्हें श्रीकृष्णा मिशन हास्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति खराब हुई तो चिकित्सकों ने लखनऊ रेफर कर दिया। यहां करीब एक माह के इलाज के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
उनकी शहादत से लोग गमगीन हैं। मगर, यह मौत उनके परिवार पर व्रज बन कर टूटी। एक ओर जहां मुखिया चला गया तो दूसरी ओर परिवार आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है।
डॉ. अजय परिवार के एक कमाऊ सदस्य थे। परिवार में उनकी मां के अलावा दो बेटे व पत्नी हैं। 28 वर्षीय बड़े पुत्र कार्तिकेय कहते हैं कि पिता की बीमारी से पहले एक दुकान खोली थी, जो बीमारी के बाद इलाज के चलते बंद करनी पड़ी। रिश्तेदारों से कर्ज भी लिया। पिता के इलाज में करीब तीस लाख रुपये खर्च हुए, मगर अफसोस सिर्फ यही है कि हम उन्हें बचा नहीं सके।
पत्नी श्रवणलता श्रीवास्तव कहती हैं कि मुखिया के बिना घर की स्थिति क्या होती है हर कोई समझ सकता है। लाखों खर्च के बाद यदि पति बच जाते तो कोई बात नहीं थी, मगर उनकी मौत ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। उनका साथ था तो सब कुछ सामान्य था, मगर अब जिंदगी बोझ जैसी हो गई है।
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आर्थिक तंगी भी आन पड़ी, एक माह से अधिक उपचार में खर्च हुए करीब तीस लाख
बेटे को पिता को न बचा पाने का साल रहा है गम, पत्नी बोलीं- जिंदगी लग रही बोझ
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। घर के मुखिया की मौत से परिवार टूट गया। कोरोना काल में ड्यूटी देते समय आयुष चिकित्सक डॉ. अजय श्रीवास्तव पॉजिटिव हुए। इसके बाद उन्हें श्रीकृष्णा मिशन हास्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति खराब हुई तो चिकित्सकों ने लखनऊ रेफर कर दिया। यहां करीब एक माह के इलाज के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
उनकी शहादत से लोग गमगीन हैं। मगर, यह मौत उनके परिवार पर व्रज बन कर टूटी। एक ओर जहां मुखिया चला गया तो दूसरी ओर परिवार आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है।
डॉ. अजय परिवार के एक कमाऊ सदस्य थे। परिवार में उनकी मां के अलावा दो बेटे व पत्नी हैं। 28 वर्षीय बड़े पुत्र कार्तिकेय कहते हैं कि पिता की बीमारी से पहले एक दुकान खोली थी, जो बीमारी के बाद इलाज के चलते बंद करनी पड़ी। रिश्तेदारों से कर्ज भी लिया। पिता के इलाज में करीब तीस लाख रुपये खर्च हुए, मगर अफसोस सिर्फ यही है कि हम उन्हें बचा नहीं सके।
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पत्नी श्रवणलता श्रीवास्तव कहती हैं कि मुखिया के बिना घर की स्थिति क्या होती है हर कोई समझ सकता है। लाखों खर्च के बाद यदि पति बच जाते तो कोई बात नहीं थी, मगर उनकी मौत ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। उनका साथ था तो सब कुछ सामान्य था, मगर अब जिंदगी बोझ जैसी हो गई है।
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