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Basti News: बच्चों में ही झलकती है मां की दुनिया...आंचल की छांव में करती हैं परवरिश

Sun, 10 May 2026 12:31 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 10 May 2026 12:31 AM IST
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A mother's world is reflected in her children...she nurtures them under the shade of her pallu.
घर पर अपनी दोनों बेटियों के साथ एआरटीओ माला बाजपेई।
बस्ती। मां की सारी दुनिया बच्चों में ही झलकती है। बच्चों के प्रति मां का ममत्व कभी कम नहीं होता है। बुजुर्ग होने के बाद भी मां अपने बच्चों को आंचल की छांव में रखना चाहती है। सामाजिक सरोकार से जुड़े रहने से लेकर नौकरी एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने वाली महिलाएं भी अपने संतान की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। समाज में अपनी प्रतिभा एवं हुनर के चलते खुद की पहचान बनाने वाली महिलाएं भी अपने बच्चों के प्रति ममत्व का भाव लिए उनकी अच्छे से परवरिश कर रही है।
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मां ने ही सिखाया बच्चों का ख्याल रखना : माला बाजपेई
बस्ती में एआरटीओ प्रशासन के पद तैनात माला बाजपेई के पास दो बेटियां है। वह स्वयं अफसर हैं और उनके पति भी नौकरी में है। इसके बाद भी वह अपने बच्चों का पूरा ख्याल रखती है। कहती हैं कि उनकी मां और सास दोनों नौकरी में थी। शादी के पहले मां से और शादी के बाद सास से गृहस्थी चलाने की सीख मिली। बताया कि उनकी मां नौकरी में रहते हुए भी हम लोगों का पूरा ख्याल रखती थी। अच्छे ढंग से परवरिश के साथ हम लोगों के पढ़ाई-लिखाई पर पूरा फोकस करती थीं। उन्हीं की देन हैं कि शादी के बाद गृहस्थी संभालने में कोई कठिनाई नहीं हुई। नौकरी करते हुए संतान हुए, बच्चे जब छोटे थे तो थोड़ा कठिनाई हुई। लेकिन अब मेरी दोनों बेटियां बड़ी हो गई हैं। वह हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती हैं। राेजाना उनसे बात करना, उनकी समस्या को जानना और उनकी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करती रहती हूं। छुट्टियों में दोनों बेटियों को अपने साथ रखती हूं। मेरा मानना हैं कि जहां संयुक्त परिवार की परंपरा है वहां बच्चों के पालन-पोषण में दिक्कत कम होती है। नानी, दादी, बुआ, चाचा-चाची आदि घर के सदस्यों का भी बच्चों पर नजर रहता है। बच्चे जब अच्छे माहौल में पलते हैं तो आगे चलकर उन्हें एक अच्छी दिशा भी मिलती है।
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मरीजों के साथ परिवार संभाल रहीं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजू

फोटो

बस्ती। 100 बेड हर्रैया महिला अस्पताल में तैनात स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजू कन्नौजिया भी ड्यूटी के साथ परिवार संभाल रही हैं। 20 माह की बिटिया और फिर परिवार की जिम्मेदारियां उन्हें निखार दिया। वह कहती हैं कि कई बार ऐसा होता है कि मेरा बच्चा सो चुका होता है और मैं अस्पताल में किसी दूसरे बच्चे व मां की जान बचाने की कोशिश कर रही होती हूं। उस पल एक डॉक्टर और मां दोनों भावनाएं साथ चलती है। ड्यूटी के लंबे घंटों के बाद जब घर पहुंचती हूं तो 20 माह की बेटी को गोद में उठाते ही थकान दूर हो जाती है। मम्मा का प्यार पाकर व भी खुश होती है। रोज कोई न कोई गर्भवती व बच्चा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है। ऐसे में मां की ममता वहां भी एक जैसी होती है। बच्चा अपना हो या पराए का, ममता तो ममता है। इस पेशे में चुनौतियां जरूर होती है, लेकिन सही समय पर सही प्राथमिकता तय करना ही इस सफर को संभव बनाता है। ड्यूटी के साथ बच्चे की देखभाल मां के लिए आसान नहीं।
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फोटो
सुबह चार बजे शुरू हो जाती है नर्सिंग ऑफिसर साधना की दिनचर्या

बस्ती। नगरीय पीएचसी नरहरिया में नर्सिंग ऑफिसर पद पर तैनात साधना भट्ट का कहती हैं कि ड्यूटी के साथ एक मां की जिम्मेदारी निभाना चुनौतीपूर्ण है। सुबह चार बजे दिनचर्या शुरू होती है और रात 11 बजे सोना नसीब होता है। इस दरमियान घर की जिम्मेदारी के साथ अस्पताल में मरीजों की सेवा करनी होती है। दो बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, टिफिन तैयार करना और फिर खुद को तैयार कर समय से ड्यूटी पहुंचाना कठिन होता है। ऊपर से परिवार को भी देखना। मगर, महिला संघर्ष करना जानती है, ऐसे में बच्चों और परिवार के साथ ड्यूटी के बाद समय मिल जाना थकान को दूर कर जाता है। अस्पताल में मरीजों की नाराजगी झेलकर परिवार में पहुंचना और फिर सुकून मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं होता है। एक महिला का संघर्ष ही उसे निखारता है।

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शिक्षक के साथ मां का दायित्व निभा रहीं आकांक्षा
बस्ती। सदर ब्लॉक के कंपोजिट विद्यालय में कार्यरत शिक्षिका आकांक्षा राव खुद के बच्चों के साथ स्कूली बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के साथ उनके बीच प्यार बांटती हैं। कहती हैं कि उसी समय में सुकून है। संघर्ष से ही जीवन में निखार आता है। सुबह चार बजे सोकर जगना और रात 11 बजे सोना दिनचर्या में शुमार है। एक शिक्षक के साथ मां का दायित्व निभाना कठिन है। बिटिया को स्कूल के लिए तैयार करना, फिर छोड़ना और बेटा को साथ लेकर ड्यूटी करना चुनौतीपूर्ण होता है। साथ ही शिक्षण कार्य के साथ परिवार को भी संभालना मुश्किल होता है। मगर, घर पहुंचने पर बेटी की मुस्कान थकान दूर कर देती है। पति अमित सिंह भी शिक्षक है, ऐसे में बच्चों को संभालते हुए खुद को तराश रही हूं। संघर्ष ही जीवन है, इसी में रहकर निखार आएगा।
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