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साईं ने हिंदू मुसलमानों को एकता की प्रेरणा दी
Basti
Updated Mon, 20 Oct 2014 05:30 AM IST
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बस्ती। टाउन क्लब चल रहे तीन दिवसीय साईं कथा के दूसरे दिन कथावाचक उमाशंकर ने कहा कि साईं ने जीवन का अधिकांश समय शिरडी में बिताया। उनके उपदेशों और चमत्कारों के कारण विश्व भर में उनके अनुयायी हैं। बालक के चमत्कारों में अखंडता में एकता तथा हिन्दू मुसलमानों को एक रहने की प्रेरणा छिपी होती थी।
उन्होंने कहा कि जब शिरडी में बाबा अपने चमत्कारों से लोगों को प्रभावित कर रहे थे, उस समय देश तमाम चुनौतियों से जूझ रहा था। अंग्रेजी हुकूमत हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की कोशिश में थी। ऐसे में र्साइं बाबा के उपदेशों की खास उपयोगिता थी। आज भी ऐसी ही चुनौतियां देश के सामने हैं। इसलिए उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं। उमाशंकर ने कहा कि बाबा का सारा जीवन मानवता की सेवा में बीता। वे इसे सबसे बड़ा धर्म मानते थे। आज के परिवेश में सारे बैर भाव भुलाकर यदि मानवता को धर्म के रूप में अंगीकार कर लिया जाए तो काफी हद तक समस्याओं का निराकरण खुद हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आदि मानव का कोई धर्म नहीं था। लोगों ने आगे चलकर अपनी सुविधानुसार धर्म और भाषा का निर्माण कर लिया और धीरे-धीरे मानवता से भटक गए।
उमाशंकर ने कहा कि अब्दुल्ला र्साइं के प्रधान सेवक थे। उनकी हर गतिविधि के बारे में जानते थे। इनका जन्म 1871 में हुआ था। द्वारकामाई से निकलकर बाबा जब कभी एकांत स्थान (लेनी बाग) में जाते तो अब्दुल्ला भी उनके साथ रहते। जबकि अन्य किसी भक्त को वहां जाने की अनुमति नहीं रहती थी। यहां नीम और पीपल के दो वृक्ष हैं। इनके बीच एक गड्ढा था। उसमें एक अखंड दीप जला करती थी इसे नंदा दीप के नाम से जाना जाता था। यह एक दिव्य ज्योति है। भक्तों की इसके प्रति अटूट आस्था है। मान्यता है कि यहां माथा टेकने से बाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसकी सफाई और रोज दीप की बत्ती बदलने की जिम्मेदारी अब्दुल्ला को सौंपी गई थी। चावड़ी और द्वारकामाई की सफाई और अन्य कार्यों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर थी। नंदा दीप आज भी अपनी जगह पर है। श्रद्धालुओं ने इसके इर्द-गिर्द चबूतरे का निर्माण करवा दिया है। अब्दुल्ला द्वारकामाई के सामने बने एक अस्तबल में रहते थे। अब इसे अब्दुल्ला बाबा की झोपड़ी के नाम से जानते हैं। 1918 में साईं के समाधि लेने के बाद वे लगातार 1954 तक उनकी समाधि की देखरेख करते रहे।
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दो अक्टूबर 1958 को अब्दुल्ला की मृत्यु हो गई। अब्दुल्ला ने र्साइं की सेवा हनुमान की तरह की। आज भी श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी करवाने के लिए पहले अब्दुल्ला बाबा की झोपड़ी और नंदा दीप के चबूतरे पर अपनी हाजिरी लगाते हैं। मुख्य यजमान दिनेश श्रीवास्तव, लता श्रीवास्तव रहे। इस दौरान साईं कृपा संस्थान के संत कुमार नंदन, राजेश उर्फ दीपू, ज्योति वर्मा, अश्विनी अग्रवाल, संदीप श्रीवास्तव, ओपी राय, सुनील श्रीवास्तव, एचपी यादव, जितेंद्र अरोड़ा, अरुण श्रीवास्तव आदि ने सहयोग दिया।
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उन्होंने कहा कि जब शिरडी में बाबा अपने चमत्कारों से लोगों को प्रभावित कर रहे थे, उस समय देश तमाम चुनौतियों से जूझ रहा था। अंग्रेजी हुकूमत हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की कोशिश में थी। ऐसे में र्साइं बाबा के उपदेशों की खास उपयोगिता थी। आज भी ऐसी ही चुनौतियां देश के सामने हैं। इसलिए उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं। उमाशंकर ने कहा कि बाबा का सारा जीवन मानवता की सेवा में बीता। वे इसे सबसे बड़ा धर्म मानते थे। आज के परिवेश में सारे बैर भाव भुलाकर यदि मानवता को धर्म के रूप में अंगीकार कर लिया जाए तो काफी हद तक समस्याओं का निराकरण खुद हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आदि मानव का कोई धर्म नहीं था। लोगों ने आगे चलकर अपनी सुविधानुसार धर्म और भाषा का निर्माण कर लिया और धीरे-धीरे मानवता से भटक गए।
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उमाशंकर ने कहा कि अब्दुल्ला र्साइं के प्रधान सेवक थे। उनकी हर गतिविधि के बारे में जानते थे। इनका जन्म 1871 में हुआ था। द्वारकामाई से निकलकर बाबा जब कभी एकांत स्थान (लेनी बाग) में जाते तो अब्दुल्ला भी उनके साथ रहते। जबकि अन्य किसी भक्त को वहां जाने की अनुमति नहीं रहती थी। यहां नीम और पीपल के दो वृक्ष हैं। इनके बीच एक गड्ढा था। उसमें एक अखंड दीप जला करती थी इसे नंदा दीप के नाम से जाना जाता था। यह एक दिव्य ज्योति है। भक्तों की इसके प्रति अटूट आस्था है। मान्यता है कि यहां माथा टेकने से बाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसकी सफाई और रोज दीप की बत्ती बदलने की जिम्मेदारी अब्दुल्ला को सौंपी गई थी। चावड़ी और द्वारकामाई की सफाई और अन्य कार्यों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर थी। नंदा दीप आज भी अपनी जगह पर है। श्रद्धालुओं ने इसके इर्द-गिर्द चबूतरे का निर्माण करवा दिया है। अब्दुल्ला द्वारकामाई के सामने बने एक अस्तबल में रहते थे। अब इसे अब्दुल्ला बाबा की झोपड़ी के नाम से जानते हैं। 1918 में साईं के समाधि लेने के बाद वे लगातार 1954 तक उनकी समाधि की देखरेख करते रहे।
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दो अक्टूबर 1958 को अब्दुल्ला की मृत्यु हो गई। अब्दुल्ला ने र्साइं की सेवा हनुमान की तरह की। आज भी श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी करवाने के लिए पहले अब्दुल्ला बाबा की झोपड़ी और नंदा दीप के चबूतरे पर अपनी हाजिरी लगाते हैं। मुख्य यजमान दिनेश श्रीवास्तव, लता श्रीवास्तव रहे। इस दौरान साईं कृपा संस्थान के संत कुमार नंदन, राजेश उर्फ दीपू, ज्योति वर्मा, अश्विनी अग्रवाल, संदीप श्रीवास्तव, ओपी राय, सुनील श्रीवास्तव, एचपी यादव, जितेंद्र अरोड़ा, अरुण श्रीवास्तव आदि ने सहयोग दिया।