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प्रदूषण और धूम्रपान दे रहा सीओपीडी को दावत
Basti
Updated Wed, 21 Nov 2012 12:00 PM IST
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बस्ती। प्रदूषित वातावरण व धूम्रपान आदमी को सीओपीडी की ओर तेज से अग्रसर कर रही है। क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनोरी डिजीज (सीओपीडी) एक क्रोनिक फेफड़ों की बीमारी है। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और उसमें सूजन आ जाती है। वर्तमान समय में सीओपीडी हर चौथी मौत का कारण बन रही है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि सीओपीडी लोगों को अपनी की गिरफ्त में ले रहा है। डाक्टरों का मानना है कि जागरूकता ही बीमारी से बचाव का कारगर उपाय है। मरीजोें को जागरूक करने और उनके बेहतर इलाज के लिए हर साल नवंबर के तीसरे बुधवार को सीओपीडी दिवस मनाया जाता है। वैसे तो सीओपीडी के मरीजों का आंकड़ा लगा पाना मुश्किल है। मगर बोर्ड और लंग्स डिजीज के सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व में 10.11 फीसदी सीओपीडी के मरीज हैं। भारत में इससे पांच फीसदी पुरुष और 2.6 फीसदी महिलाएं पीड़ित हैं। जिला अस्पताल के वरिष्ठ चेस्ट फिजिशियन डा. वीएस त्रिपाठी की मानें तो सीओपीडी का मुख्य कारण वायु प्रदूषण व और धूम्रपान है। सिगरेट, सिगार व बीड़ी से निकलने वाला धुआं फेफड़े पर बुरा प्रभाव डालता है। इसके अलावा अंगीठी, उपलों, लकड़ी और स्टोव से निकलने वाला धुआं सीओपीडी को निमंत्रित करता है। कहते हैं कि कोहरे में धूल के मिश्रित होने पर हवा स्मॉग का रूप ले लेती है, जो और भी खतरनाक होती है। कहा कि इस घातक बीमारी से जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस रोग में एंटी बायोटिक व एंटी एलर्जिक दवा दी जाती है। अत्यधिक गंभीर परिस्थिति में आक्सीजन थेरेपी की जाती है। शहर के प्रसिद्ध चेस्ट फिजिशियन डॉ. अजय कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि धूम्रपान करने वालों में 15-20 प्रतिशत सीओपीडी से ग्रसित होते हैं। कहा कि इसकी मुख्य जांच स्पाइरोमीटरी या लंग फंक्शन टेस्ट के माध्यम से हो सकता है। टेस्ट से इसकी प्रारंभिक अवस्था का पता लगाया जा सकता है। जिसके बाद रोग का इलाज करने में आसानी होती है।
क्या है रोग के लक्षण
- खासी आने के साथ सांस का फूलना
- लगातार बलगमयुक्त खांसी आना
- संक्रमण अधिक होने पर रक्त के छींटे आना
-तेज चलने पर सांस फूलना
- फेफडे़ में कड़ापन
-मांसपेशियों का कमजोर होना
-खून की कमी होना
सलाह
-धूम्रपान से बचें
-धुआं और प्रदूषण से बचें
-ठंड के दिनों में कोहरे से विशेष बचाव
-विशेषज्ञ चिकित्सक से इलाज कराएं
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स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि सीओपीडी लोगों को अपनी की गिरफ्त में ले रहा है। डाक्टरों का मानना है कि जागरूकता ही बीमारी से बचाव का कारगर उपाय है। मरीजोें को जागरूक करने और उनके बेहतर इलाज के लिए हर साल नवंबर के तीसरे बुधवार को सीओपीडी दिवस मनाया जाता है। वैसे तो सीओपीडी के मरीजों का आंकड़ा लगा पाना मुश्किल है। मगर बोर्ड और लंग्स डिजीज के सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व में 10.11 फीसदी सीओपीडी के मरीज हैं। भारत में इससे पांच फीसदी पुरुष और 2.6 फीसदी महिलाएं पीड़ित हैं। जिला अस्पताल के वरिष्ठ चेस्ट फिजिशियन डा. वीएस त्रिपाठी की मानें तो सीओपीडी का मुख्य कारण वायु प्रदूषण व और धूम्रपान है। सिगरेट, सिगार व बीड़ी से निकलने वाला धुआं फेफड़े पर बुरा प्रभाव डालता है। इसके अलावा अंगीठी, उपलों, लकड़ी और स्टोव से निकलने वाला धुआं सीओपीडी को निमंत्रित करता है। कहते हैं कि कोहरे में धूल के मिश्रित होने पर हवा स्मॉग का रूप ले लेती है, जो और भी खतरनाक होती है। कहा कि इस घातक बीमारी से जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस रोग में एंटी बायोटिक व एंटी एलर्जिक दवा दी जाती है। अत्यधिक गंभीर परिस्थिति में आक्सीजन थेरेपी की जाती है। शहर के प्रसिद्ध चेस्ट फिजिशियन डॉ. अजय कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि धूम्रपान करने वालों में 15-20 प्रतिशत सीओपीडी से ग्रसित होते हैं। कहा कि इसकी मुख्य जांच स्पाइरोमीटरी या लंग फंक्शन टेस्ट के माध्यम से हो सकता है। टेस्ट से इसकी प्रारंभिक अवस्था का पता लगाया जा सकता है। जिसके बाद रोग का इलाज करने में आसानी होती है।
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क्या है रोग के लक्षण
- खासी आने के साथ सांस का फूलना
- लगातार बलगमयुक्त खांसी आना
- संक्रमण अधिक होने पर रक्त के छींटे आना
-तेज चलने पर सांस फूलना
- फेफडे़ में कड़ापन
-मांसपेशियों का कमजोर होना
-खून की कमी होना
सलाह
-धूम्रपान से बचें
-धुआं और प्रदूषण से बचें
-ठंड के दिनों में कोहरे से विशेष बचाव
-विशेषज्ञ चिकित्सक से इलाज कराएं