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खिलाड़ियों से भी हो नाम.. तब बने काम
बरेली।
Updated Thu, 14 Dec 2017 02:33 AM IST
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चयिननित िख्ाखिलाड़ी
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जहां आज भी बेटी पैदा होने पर सगे संबंधी सांत्वना देने लगते हैं, वहीं ऐसे में मां-बाप हैं जो चाहते हैं कि उनकी बेटियां आगे बढ़ें। आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावक भी बेटियों का भविष्य बनाने के लिए अपना पेट काटकर भी संसाधन जुटा लेते हैं। इन्हीं में से एक हैं फड़ लगाकर चप्पल बेचने वाले सीताराम सागर। उनकी बेटी दामिनी सागर और उसकी बचपन की दोस्त संजयनगर की निशा रानी का हैंडबॉल खिलाड़ी होने की वजह से सशस्त्र सीमा बल में कांस्टेबल के पद पर चयन हो गया है। उनकी सफलता से कोच हेमंत गंगवार बेहद खुश हैं।
घर में खाना भले न बना हो पर पापा ने खेलने भेजा
दामिनी के पिता नरकुलागंज निवासी सीताराम सागर बड़ा बाजार में चप्पलों का फड़ लगाते हैं। दामिनी बताती हैं कि कई बार ऐसे मौके आए जब मम्मी-पापा पर रुपये नहीं थे, घर में खाना नहीं बना पर किसी तरह उन्हें प्रैक्टिस के लिए भेजने को रुपये जुटाए गए। पिछले साल उनका इंडिया कैंप में चयन हुआ पर मां कुसुम की बीमारी के कारण नहीं जा पाईं। उन्होंने एक सीनियर नेशनल और चार जूनियर नेशनल हैंडबॉल टूर्नामेंट खेले हैं। दिसंबर, 2016 में लखनऊ में हुए जूनियर नेशनल में उनका दूसरा स्थान आया। वह तीन इंटर यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट भी खेल चुकी हैं। इस समय बरेली कॉलेज में बीए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। बोलीं, घर में कोई हैंडबॉल का नाम तक नहीं जानता था, पर मैं अच्छा करती गई तो सभी ने हमेशा हौसला बढ़ाया।
निशा का परिवार है मध्यमवर्गीय
संजयनगर की निशा रानी केपीआरसी में पढ़ने के समय से ही दामिनी की दोस्त हैं। दामिनी और निशान ने केपीआरसी स्कूल से ही साथ-साथ ही हैंडबॉल खेलनी शुरू की। निशा के पिता यशोदा नंदन की इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की दुकान है। उनके दो भाई और एक बहनों है। उन्होंने तीन जूनियर नेशनल टूर्नामेंट खेले। लखनऊ में हुए जूनियर नेशनल अंडर 19 टूर्नामेंट में उन्होंने दूसरा स्थान जीता। दोनों ही खिलाड़ी अपनी सफलता के लिए हैंड बाल सेकेट्री फजिल बेग और कोच हेमंत और पूर्व कोच इरफान अहमद को क्रेडिट देती हैं।
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गरीब मां-बाप की ये बेटियां भी खेल के बल पर बढ़ रहीं आगे
वर्षा रानी : नवाबगंज के अंचल इलाकी की वर्षा रानी अपनी मां के बल खेल में आगे बढ़ीं। उनके पिता शुरूआत में बेटी को खिलाने के लिए सहमत नहंी थे। पर धीरे-धीरे उनके प्रदर्शन से पिता का मन भी बदल गया। वह नेशनल अंडर 19 फुटबॉल प्रतियोगिता खेलकर आईं हैं। कोच मून रोविंसन ने बताया कि वर्षा के बाद अब उनकी बहन भी प्रोत्साहित होकर खेल रही है।
अंजलि प्रजापति : सुर्खा बानखाना के पैरालाइज्ड राकेश प्रजापति सब्जी बेचते हैं। उनकी सबसे बड़ी बेटी अंजलि ने सिर्फ तीन महीने की ट्रेनिंग के बल पर स्टेट बाक्सिंग टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता था। इस समय वह स्टेट टूर्नामेंट के लिए तैयारी कर रही हैं। इस खेल में कोच न होने की दिक्कतों का उन्हें सामना करना पड़ रहा है।
काजल: मजदूर पिता और आशा वर्कर की यह बेटी रिठौरा के लाड़पुर से 20 किलोमीटर का सफर करके प्रैक्टिस के लिए शहर आती हैं। रुहेलखंड एथलेटिक्स प्रतियोगिता की आठ सौ मीटर दौड़ में उन्होंने कांस्य पदक जीता। वह मार्च में होने वाले ओपन स्टेट के लिए कोच साहिबे आलम के अंडर प्रैक्टिस कर रही है।
घर में खाना भले न बना हो पर पापा ने खेलने भेजा
दामिनी के पिता नरकुलागंज निवासी सीताराम सागर बड़ा बाजार में चप्पलों का फड़ लगाते हैं। दामिनी बताती हैं कि कई बार ऐसे मौके आए जब मम्मी-पापा पर रुपये नहीं थे, घर में खाना नहीं बना पर किसी तरह उन्हें प्रैक्टिस के लिए भेजने को रुपये जुटाए गए। पिछले साल उनका इंडिया कैंप में चयन हुआ पर मां कुसुम की बीमारी के कारण नहीं जा पाईं। उन्होंने एक सीनियर नेशनल और चार जूनियर नेशनल हैंडबॉल टूर्नामेंट खेले हैं। दिसंबर, 2016 में लखनऊ में हुए जूनियर नेशनल में उनका दूसरा स्थान आया। वह तीन इंटर यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट भी खेल चुकी हैं। इस समय बरेली कॉलेज में बीए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं। बोलीं, घर में कोई हैंडबॉल का नाम तक नहीं जानता था, पर मैं अच्छा करती गई तो सभी ने हमेशा हौसला बढ़ाया।
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निशा का परिवार है मध्यमवर्गीय
संजयनगर की निशा रानी केपीआरसी में पढ़ने के समय से ही दामिनी की दोस्त हैं। दामिनी और निशान ने केपीआरसी स्कूल से ही साथ-साथ ही हैंडबॉल खेलनी शुरू की। निशा के पिता यशोदा नंदन की इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की दुकान है। उनके दो भाई और एक बहनों है। उन्होंने तीन जूनियर नेशनल टूर्नामेंट खेले। लखनऊ में हुए जूनियर नेशनल अंडर 19 टूर्नामेंट में उन्होंने दूसरा स्थान जीता। दोनों ही खिलाड़ी अपनी सफलता के लिए हैंड बाल सेकेट्री फजिल बेग और कोच हेमंत और पूर्व कोच इरफान अहमद को क्रेडिट देती हैं।
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गरीब मां-बाप की ये बेटियां भी खेल के बल पर बढ़ रहीं आगे
वर्षा रानी : नवाबगंज के अंचल इलाकी की वर्षा रानी अपनी मां के बल खेल में आगे बढ़ीं। उनके पिता शुरूआत में बेटी को खिलाने के लिए सहमत नहंी थे। पर धीरे-धीरे उनके प्रदर्शन से पिता का मन भी बदल गया। वह नेशनल अंडर 19 फुटबॉल प्रतियोगिता खेलकर आईं हैं। कोच मून रोविंसन ने बताया कि वर्षा के बाद अब उनकी बहन भी प्रोत्साहित होकर खेल रही है।
अंजलि प्रजापति : सुर्खा बानखाना के पैरालाइज्ड राकेश प्रजापति सब्जी बेचते हैं। उनकी सबसे बड़ी बेटी अंजलि ने सिर्फ तीन महीने की ट्रेनिंग के बल पर स्टेट बाक्सिंग टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता था। इस समय वह स्टेट टूर्नामेंट के लिए तैयारी कर रही हैं। इस खेल में कोच न होने की दिक्कतों का उन्हें सामना करना पड़ रहा है।
काजल: मजदूर पिता और आशा वर्कर की यह बेटी रिठौरा के लाड़पुर से 20 किलोमीटर का सफर करके प्रैक्टिस के लिए शहर आती हैं। रुहेलखंड एथलेटिक्स प्रतियोगिता की आठ सौ मीटर दौड़ में उन्होंने कांस्य पदक जीता। वह मार्च में होने वाले ओपन स्टेट के लिए कोच साहिबे आलम के अंडर प्रैक्टिस कर रही है।