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कहीं पशुओं की दवा तो नहीं ले रही गिद्धों की जान!
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Wed, 25 May 2016 01:32 AM IST
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अब तक पशुओं को दर्द निवारक दवा के तौर पर डाइक्लोफिनिक दी जाती थी। इस दवा को देने के बाद अगर पशु की मौत हो जाती और मरने के बाद उसे गिद्ध खाते तो वह दवा गिद्ध के शरीर में भी पहुंच जाती। आईवीआरआई के वाइल्ड लाइफ विभाग के अध्यक्ष डॉ. एके शर्मा ने बताया कि पशुओं की यह दवा गिद्ध के शरीर में जाने के बाद उसकी किडनी को डैमेज कर देती। किडनी डैमेज होने के बाद गिद्ध की मौत हो जाती। कई शोध में यह सामने आ चुका है कि इससे गिद्ध लगातार मर रहे हैं। इसीलिए सरकार ने पशुओं को यह दवा देने पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन अब भी तमाम ऐसी दर्द निवारक दवाएं बाजार में बिक रही हैं, जो गिद्धों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) और बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) मिलकर पशुओं की दर्द निवारक दवाएं टेस्ट करेंगे और उन्हें प्रमाणित करेंगे। अगर दवाएं गिद्धों के लिए नुकसानदायक हुईं तो बाजार में उनकी बिक्री रोकी जाएगी।
पर्यावरण के सफाई कर्मी कहे जाने वाले गिद्धों की लगातार घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरण मंत्रालय भी चिंतित है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से आईवीआरआई और बीएनएचएस को ‘असेसमेंट ऑफ सेफ्टी’ नाम का प्रोजेक्ट मिला है। यह प्रोजेक्ट तीन साल के लिए दिया गया है। आईवीआरआई के वाइल्ड लाइफ विभाग के अध्यक्ष डॉ. एके शर्मा और बीएनएचएस के डॉ. विभू प्रकाश के निर्देशन में पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाओं पर शोध होगा।
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शोध के पहले चरण में कीटोफिनॉन, एनर्जीन, पैरासिटामॉल, निमोस्लाइड का टेस्ट किया जाएगा। वैज्ञानिक जांच करके यह देखेंगे कि ये दर्द निवारक दवाएं गिद्धों के लिए नुकसानदायक हैं या नहीं। अगर टेस्ट में ये दवाएं नुकसानदायक मिलीं तो फिर इन दवाओं पर मंत्रालय प्रतिबंध लगा देगा। एक-एक कर सभी दर्द निवारक दवाओं को वैज्ञानिक जांचेंगे और उसे प्रमाणित करके देंगे कि ये गिद्धों के लिए नुकसानदायक हैं या नहीं।
गिद्धों की संख्या में 97 फीसदी कमी हुई
देश में गिद्धों की संख्या में पिछले एक दशक में 97 फीसदी की गिरावट आने के बाद पर्यावरण को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस पक्षी को बचाने की जरूरत है। गिद्धों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण भी काफी हद तक प्रभावित हुआ है। एक अध्ययन के अनुसार गिद्धों की 20 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से भारतीय उपमहाद्वीप में नौ प्रजातियां मिलती हैं। तीन प्रभावित प्रजातियां भारतीय सफेद पीठ वाले गिद्ध, लंबी चोंच वाले गिद्ध और पतली चोंच वाले गिद्ध एक समय में भारत में सामान्य थे।
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भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) और बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) मिलकर पशुओं की दर्द निवारक दवाएं टेस्ट करेंगे और उन्हें प्रमाणित करेंगे। अगर दवाएं गिद्धों के लिए नुकसानदायक हुईं तो बाजार में उनकी बिक्री रोकी जाएगी।
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पर्यावरण के सफाई कर्मी कहे जाने वाले गिद्धों की लगातार घटती संख्या को देखते हुए पर्यावरण मंत्रालय भी चिंतित है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से आईवीआरआई और बीएनएचएस को ‘असेसमेंट ऑफ सेफ्टी’ नाम का प्रोजेक्ट मिला है। यह प्रोजेक्ट तीन साल के लिए दिया गया है। आईवीआरआई के वाइल्ड लाइफ विभाग के अध्यक्ष डॉ. एके शर्मा और बीएनएचएस के डॉ. विभू प्रकाश के निर्देशन में पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाओं पर शोध होगा।
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शोध के पहले चरण में कीटोफिनॉन, एनर्जीन, पैरासिटामॉल, निमोस्लाइड का टेस्ट किया जाएगा। वैज्ञानिक जांच करके यह देखेंगे कि ये दर्द निवारक दवाएं गिद्धों के लिए नुकसानदायक हैं या नहीं। अगर टेस्ट में ये दवाएं नुकसानदायक मिलीं तो फिर इन दवाओं पर मंत्रालय प्रतिबंध लगा देगा। एक-एक कर सभी दर्द निवारक दवाओं को वैज्ञानिक जांचेंगे और उसे प्रमाणित करके देंगे कि ये गिद्धों के लिए नुकसानदायक हैं या नहीं।
गिद्धों की संख्या में 97 फीसदी कमी हुई
देश में गिद्धों की संख्या में पिछले एक दशक में 97 फीसदी की गिरावट आने के बाद पर्यावरण को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस पक्षी को बचाने की जरूरत है। गिद्धों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण भी काफी हद तक प्रभावित हुआ है। एक अध्ययन के अनुसार गिद्धों की 20 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से भारतीय उपमहाद्वीप में नौ प्रजातियां मिलती हैं। तीन प्रभावित प्रजातियां भारतीय सफेद पीठ वाले गिद्ध, लंबी चोंच वाले गिद्ध और पतली चोंच वाले गिद्ध एक समय में भारत में सामान्य थे।