बरेली : दस गुना कम हुआ प्रदूषण का स्तर, बर्ड वॉचर के मुताबिक चिड़ियों को मिली संजीवनी
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जी हां, इसे प्रकृति का हस्तक्षेप ही मानिए। मानव समाज ने अपनी जिन लिप्साओं और महत्वाकांक्षाओं को विकास का नाम देकर पर्यावरण का सत्यानाश किया और तमाम पशु-पक्षियों को अपने ठिकाने छोड़कर कहीं और बसेरा ढूंढने के लिए विवश कर दिया, कोरोना के बहाने यह सारी मनमानी थम गई है। पर्यावरण में तब्दीली आई तो इंसानों के समीप अपने ठिकाने ढूंढने वाली गौरैया कई सालों बाद फिर गांव और शहर की बस्तियों में चली आई है। वन विभाग के बर्ड वाचरों ने हाल ही में इस नन्हीं चिड़िया की आमद को रिकॉर्ड किया है। कोयल और बुलबुल की सुरीली चहचहाहट बढ़ना भी उनके लिए अचरज भरा है।
12 साल बाद लौटी नन्हीं गौरैया, फुदकी और पर्पल सनबर्ड को भी रास आया लॉकडाउन
बर्ड वाचरों के मुताबिक शहरीकरण शुरू होने के साथ बरेली में 25 साल पहले गौरैया की तादाद कम होनी शुरू हो गई थी। बर्ड वाचर काजलदास गुप्ता के मुताबिक कुछ समय तक आईवीआरआई और कैंट इलाके में सिमटे रहने के बाद 12 साल पहले शहर से गौरैया लगभग पूरी तरह गायब हो गई। मुलायम सिंह यादव ने अपने शासन में गौरैया के लिए जगह-जगह घोसले रखवाने की योजना भी चलाई थी लेकिन यह सरकारी योजना भी गौरैया को वापस नहीं ला सकी। लेकिन अब लॉकडाउन के दो हफ्तों बाद ही गौरैया अब फिर इधर-उधर फुदकती दिखने लगी है। गौरैया के साथ कई सालों बाद फुदकी और बैंगनी शकरखोरा के नाम से जानी जाने वाली पर्पल सनबर्ड भी अब शहर में फिर लौट आई है।पर्यावरण और मौसम का भी मिजाज भी बताती हैं चिड़ियां
बर्ड वॉचर सचिन गौड़ बताते हैं कि पक्षियों की मौजूदगी और उनका व्यवहार पर्यावरण में हो रहे बदलावों का भी संकेत देता है। भूकंप या तूफान आने से पहले गौरैया, बुलबुल, कोयल, कबूतर, कौआ, गिद्ध आदि पक्षी अपना स्थान बदलने लगते हैं। उन्होंने बताया कि प्रोफेशनल बर्ड वाचर जब अक्सर जंगलों में पक्षियों के बारे में अध्ययन के लिए निकलते हैं तो उनकी वहां मौजूदगी और व्यवहार के आधार पर मौसम का भी अनुमान लगाते हैं।घोसले न उजाड़े तो हर सुबह कानों में घोलती रहेंगी मधुर संगीत के सुर
बर्ड वॉचर बताते हैं कि घनी इमारतों का झुंड बन चुके शहर में पक्षियों को घोसले बनाने के साथ अपना पेट भरने की समस्या होती थी जो अब भी बरकरार है। तमाम पक्षी सालों तक पेड़ों या घरों की छतों जैसी उपयुक्त जगहों पर घोसले बनाकर इंसानों के आसपास रहने की कोशिश करते रहे लेकिन बढ़ता प्रदूषण उनके लिए बर्दाश्त के बाहर हो गया। एक स्थिति यह आई कि गौरैया गांवों तक में कम हो गई और उसे लुप्तप्राय: पक्षी की श्रेणी में दर्ज कर वर्ल्ड स्पैरो डे मनाया जाने लगा। लॉकडाउन ने उन्हें एक बार फिर आजादी दे दी। अनुकूल परिस्थितियों से वह फिर तड़के ही चहचहाकर लोगों को जगाने लगी हैं। ये चिड़ियां अपने घोसले भी बनाएंगी जो लोगों ने अगर न उजाड़े तो उनकी तादाद और बढ़ती जाएगी।वायु और ध्वनि दोनों प्रदूषण पक्षियों के लिए खतरनाक हैं। इस समय दोनों का स्तर काफी कम है। खासकर ध्वनि प्रदूषण तो बिलकुल भी नहीं है। यही वजह है कि पक्षियों की आवाज अब सुनाई देने लगी है। पक्षियों के आने से पारिस्थतिकी तंत्र में भी आने वाले दिनों में बदलाव दिखाई दे सकते हैं। - भरतलाल, डीएफओ
एक्यूआई पर पांच प्वाइंट और नीचे लुढ़का प्रदूषण का स्तर
लॉकडाउन का तोहफा: अब सामान्य से भी 20 प्वाइंट कम हुआ लेवललॉकडाउन में तमाम कारखाने, ट्रैफिक और निर्माण बंद होने से प्रदूषण का स्तर लगातार कम होता जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बरेली में पिछले दस दिनों में वायु प्रदूषण का मानक एक्यूआई पांच प्वाइंट और नीचे आकर 40 पर टिक गया है। अफसरों ने कई सालों बाद शहर की आबोहवा इतनी ज्यादा शुद्ध होने की बात कही है। जनवरी में ही ग्रीनपीस इंडिया की ओर से जारी रिपोर्ट में बरेली को देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में छठे नंबर पर बताया गया था। 2018-19 के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में बरेली में एक्यूआई का लेवल तीन सौ के पार बताया गया था जो फरवरी 2020 में चार सौ के पार पहुंच गया। 22 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के बाद प्रदूषण स्तर गिरना शुरू हुआ तो दस दिन में ही एक्यूूआई 50 पर पहुंच गया। अब इसे 40 रिकॉर्ड किया गया है जो सामान्य से भी 20 प्वाइंट कम है। बरेली कॉलेज के एमिरेट प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक लॉकडाउन और बढ़ने के आसार हैं। लिहाजा प्रदूषण स्तर और भी नीचे जा सकता है।