UP: इस जिले में एफडीआर तकनीक से पहली सड़क का हो रहा निर्माण, प्रति किमी 30 लाख की बचत
ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के सहायक अभियंता ने बताया कि नई तकनीक से तैयार सड़क की मियाद 10 वर्ष है। पुरानी तकनीक में भी यही मियाद होती है। एफडीआर तकनीक से सड़क निर्माण में रुपये की बचत होती है।
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बरेली जिले में फुल डेफ्थ रिक्लेमेशन (एफडीआर) तकनीक से पहली सड़क का निर्माण (रिठौरा से खाईखेड़ा तक शुरू) हो रहा है। यह रोड पुरानी सड़क के मलबे से ही बनाई जा रही है। 12.5 किलोमीटर लंबी इस सड़क पर 12.44 करोड़ रुपये की लागत आएगी। अभी तक 3.75 मीटर चौड़ी सड़क को अब 5.5 मीटर चौड़ा बनाया जा रहा है, लेकिन चौड़ीकरण के बाद भी इसकी लागत नहीं बढ़ेगी।
ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के सहायक अभियंता संजय कुमार ने बताया कि अगर पुराना मलबा इस्तेमाल नहीं किया जाता तो लागत 1.30 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से आती, लेकिन इस तकनीक से 30 लाख रुपये प्रति किलोमीटर की बचत हुई है।
साथ ही एक घन मीटर भी नई गिट्टी नहीं लगानी पड़ी। पुरानी गिट्टी को मशीन के जरिये सीमेंट और केमिकल में मिश्रित कर सड़क का आधार तैयार करते हैं, अगर गिट्टी की जरूरत है तो मिट्टी की मात्रा बढ़ाकर मैटेरियल तैयार होता है। इसे पेस्ट करके सड़क की सतह बनाते हैं, फिर डामर डाला जाता है।
10 वर्ष होगी सड़क की मियाद
नई तकनीक से तैयार सड़क की मियाद 10 वर्ष है। पुरानी तकनीक में भी यही मियाद होती है। पांच वर्ष तक मरम्मत की जिम्मेदारी इस तकनीक में भी निर्माण करने वाली फर्म की होती है। विदेशी तकनीक एफडीआर सबसे पहले हैदराबाद में आई। जर्मनी में मैटेरियल तैयार करने के लिए मशीन बनी। इसी मशीन से निर्माण हो रहा है।
यूपी के कुछ अभियंताओं को सबसे पहले हैदराबाद में प्रशिक्षण दिलाया गया। फिर विभिन्न जिलों में काम शुरू हुए। पहले चरण में चित्रकूट, सीतापुर, आगरा में सड़कें बनीं थीं। इन्हें दिखाकर ही उत्तर प्रदेश रूरल रोड डेवपलेपमेंट अथॉर्टी ने ट्रेनिंग कराई है।
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ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के सहायक अभियंता संजय कुमार ने बताया कि मैंने पिछले वर्ष एफडीआर तकनीक के लिए सीतापुर में प्रशिक्षण लिया, फिर जिले में पहली सड़क का निर्माण शुरू कराया है। नवंबर तक सड़क की सतह बन जाएगी। डामर संबंधी काम दिसंबर और जनवरी की सर्दी में नहीं हो सकता है, इसलिए फरवरी में काम पूरा होने के आसार हैं।