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गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र बनेगा खीरी: अल्का दुबे मैलानी में गिद्ध संरक्षण पर हुई गोष्ठी
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मैलानी। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी की जीव विज्ञानी अल्का दुबे ने कहा कि वन विभाग एवं बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से खीरी जिले को गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र बनाया जाएगा।
अल्का दुबे ने यहां फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में आयोजित गोष्ठी में कहा कि दुधवा टाइगर रिजर्व और उसके आसपास नेपाल सीमा तक क्षेत्र को गिद्धों के लिए सुरक्षित बनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि गिद्धों की संख्या देश में लाखों तक थी, लेकिन आज पूरे देश में हजारों की संख्या में भी गिद्ध नहीं हैं। यानी गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी हुई। वर्ष 1990 से अब तक गिद्धों की संख्या में 99 प्रतिशत तक कमी आई है। आलम यह है कि गिद्ध अब विलुप्ति के कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण पशुओं के उपचार में प्रयोग होने वाली दर्द निवारक डाइक्लोफिनेक दवा है। इस दवा के उपयोग के बाद पशुओं की मौत होने पर डाइक्लोनिक के जहरीले तत्व मृत पशु के शव में रह जाते हैं, जिन्हें खाने के बाद गिद्ध भी मौत के मुंह में समा जाते हैं। गिद्धों की घटती संख्या का यही मुख्य कारण है। इसी कारण सरकार ने वर्ष 2006 में इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया। अब पता चला है कि मानव उपचार में प्रयुक्त होने वाली डाइक्लोफिनेक दवा की डोज बढ़ाकर उसे पशुओं के इलाज में प्रयोग किया जा रहा है। जबकि इसकी जगह मैलोक्सीकेम दवा का उपयोग किया जा सकता है, जोकि पशुओं और गिद्धों दोनों के लिए सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि गिद्धों का संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी है, जोकि मृत पशुओं के शवों को खाकर इनसे उत्पन्न होने वाले खतरनाक रोगों से मनुष्य की रक्षा करते हुए पर्यावरण को भी शुद्ध करता है। यही नहीं गिद्ध की धार्मिक महत्ता भी है। गिद्धों का संरक्षण कर स्वच्छ भारत मिशन को भी सफल बनाया जा सकता है। उन्होंने वनकर्मियों से गिद्घों के संरक्षण के इस कार्यक्रम में सहयोग की अपील की करते हुए कहा कि खीरी जिला गिद्घों के संरक्षण के लिए मुफीद साबित हो सकता है। इसके अलावा जीव विज्ञानी अक्षय वाघमारे ने देश में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रजाति के बारे में विस्तार से बताया। इस मौके पर वन क्षेत्राधिकारी मैलानी केपी सिंह, सेंक्चुरी आरपी सिंह, डिप्टी रेंजर पतिराज सिंह, उदय राज कुशवाहा, अनिल कुमार, वन दरोगा गणेश शंकर शुक्ला, मोहन राम, शशि भूषण सिंह, अवधेश कुमार सहित अन्य स्टाफ मौजूद रहा।
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अल्का दुबे ने यहां फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में आयोजित गोष्ठी में कहा कि दुधवा टाइगर रिजर्व और उसके आसपास नेपाल सीमा तक क्षेत्र को गिद्धों के लिए सुरक्षित बनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि गिद्धों की संख्या देश में लाखों तक थी, लेकिन आज पूरे देश में हजारों की संख्या में भी गिद्ध नहीं हैं। यानी गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी हुई। वर्ष 1990 से अब तक गिद्धों की संख्या में 99 प्रतिशत तक कमी आई है। आलम यह है कि गिद्ध अब विलुप्ति के कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण पशुओं के उपचार में प्रयोग होने वाली दर्द निवारक डाइक्लोफिनेक दवा है। इस दवा के उपयोग के बाद पशुओं की मौत होने पर डाइक्लोनिक के जहरीले तत्व मृत पशु के शव में रह जाते हैं, जिन्हें खाने के बाद गिद्ध भी मौत के मुंह में समा जाते हैं। गिद्धों की घटती संख्या का यही मुख्य कारण है। इसी कारण सरकार ने वर्ष 2006 में इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया। अब पता चला है कि मानव उपचार में प्रयुक्त होने वाली डाइक्लोफिनेक दवा की डोज बढ़ाकर उसे पशुओं के इलाज में प्रयोग किया जा रहा है। जबकि इसकी जगह मैलोक्सीकेम दवा का उपयोग किया जा सकता है, जोकि पशुओं और गिद्धों दोनों के लिए सुरक्षित है।
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उन्होंने बताया कि गिद्धों का संरक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी है, जोकि मृत पशुओं के शवों को खाकर इनसे उत्पन्न होने वाले खतरनाक रोगों से मनुष्य की रक्षा करते हुए पर्यावरण को भी शुद्ध करता है। यही नहीं गिद्ध की धार्मिक महत्ता भी है। गिद्धों का संरक्षण कर स्वच्छ भारत मिशन को भी सफल बनाया जा सकता है। उन्होंने वनकर्मियों से गिद्घों के संरक्षण के इस कार्यक्रम में सहयोग की अपील की करते हुए कहा कि खीरी जिला गिद्घों के संरक्षण के लिए मुफीद साबित हो सकता है। इसके अलावा जीव विज्ञानी अक्षय वाघमारे ने देश में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रजाति के बारे में विस्तार से बताया। इस मौके पर वन क्षेत्राधिकारी मैलानी केपी सिंह, सेंक्चुरी आरपी सिंह, डिप्टी रेंजर पतिराज सिंह, उदय राज कुशवाहा, अनिल कुमार, वन दरोगा गणेश शंकर शुक्ला, मोहन राम, शशि भूषण सिंह, अवधेश कुमार सहित अन्य स्टाफ मौजूद रहा।
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