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Bareilly News: दुर्लभ रोगों की दस्तक, जागरूकता से बचाव मुमकिन
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बरेली। दुर्लभ बीमारियां भले ही कम लोगों को प्रभावित करती हों, लेकिन इनके प्रति सतर्कता और जागरूकता बेहद जरूरी है। बरेली में भी बीते वर्षों में दुर्लभ रोग ब्लैक फंगस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की चपेट में लोग मिले। विशेषज्ञ के मुताबिक दुर्लभ रोगों की समय पर पहचान चुनौती है।
पिछले दो वर्ष में निजी अस्पतालों में हार्लेक्विन इच्थियोसिस दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी से पीड़ित दो शिशु का जन्म भी चर्चा में था। ये बीमारी त्वचा को कठोर और फटी हुई बना देती है। हालांकि, छह से आठ घंटे तक इलाज के बाद नवजात को बचाया नहीं जा सका। इससे पूर्व मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से जूझ रहे एक 22 वर्षीय व्यक्ति की मौत भी हुई थी। गुलियन बेरे सिंड्रोम से जूझ रहे एक बच्चे की भी मौत बीते साल हुई थी। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. राहुल बाजपेई के मुताबिक दुर्लभ रोगों की पहचान में देरी बड़ी चुनौती है। सही जांच, परामर्श के अभाव में मरीज भटकते हैं।
बताया जाता है कि भारत सरकार की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत चयनित रोगों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई जरूरतमंद इसका लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे रोग से पीड़ितों को इलाज समेत अपनों का साथ जरूरी होता है।
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थैलेसीमिया और हीमोफीलिया भी दुर्लभ रोग
जिले में थैलेसीमिया से करीब ढाई सौ और हीमोफीलिया के करीब तीन सौ सक्रिय मरीज हैं। चिकित्सा क्षेत्र में इस रोग को भी दुर्लभ रोग माना जाता है। डॉ. बाजपेई के मुताबिक ज्यादातर मामलों में ऐसे रोग की वजह आनुवांशिक गड़बड़ी, रक्त संबंधी विवाह, गर्भावस्था में संक्रमण या पोषण की कमी, प्रतिरक्षा तंत्र की असामानता होती है। बचाव के लिए जेनेटिक काउंसलिंग, नियमित जांच, टीकाकरण से बचाव मुमकिन है।
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पिछले दो वर्ष में निजी अस्पतालों में हार्लेक्विन इच्थियोसिस दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी से पीड़ित दो शिशु का जन्म भी चर्चा में था। ये बीमारी त्वचा को कठोर और फटी हुई बना देती है। हालांकि, छह से आठ घंटे तक इलाज के बाद नवजात को बचाया नहीं जा सका। इससे पूर्व मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से जूझ रहे एक 22 वर्षीय व्यक्ति की मौत भी हुई थी। गुलियन बेरे सिंड्रोम से जूझ रहे एक बच्चे की भी मौत बीते साल हुई थी। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. राहुल बाजपेई के मुताबिक दुर्लभ रोगों की पहचान में देरी बड़ी चुनौती है। सही जांच, परामर्श के अभाव में मरीज भटकते हैं।
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बताया जाता है कि भारत सरकार की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत चयनित रोगों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई जरूरतमंद इसका लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे रोग से पीड़ितों को इलाज समेत अपनों का साथ जरूरी होता है।
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थैलेसीमिया और हीमोफीलिया भी दुर्लभ रोग
जिले में थैलेसीमिया से करीब ढाई सौ और हीमोफीलिया के करीब तीन सौ सक्रिय मरीज हैं। चिकित्सा क्षेत्र में इस रोग को भी दुर्लभ रोग माना जाता है। डॉ. बाजपेई के मुताबिक ज्यादातर मामलों में ऐसे रोग की वजह आनुवांशिक गड़बड़ी, रक्त संबंधी विवाह, गर्भावस्था में संक्रमण या पोषण की कमी, प्रतिरक्षा तंत्र की असामानता होती है। बचाव के लिए जेनेटिक काउंसलिंग, नियमित जांच, टीकाकरण से बचाव मुमकिन है।