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नागरिकता पाने की उम्मीद लिए दुनिया को अलविदा कह गईं शहीदन

Tue, 31 Dec 2019 01:31 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 31 Dec 2019 01:31 AM IST
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दिल में रह गई खानेकाबा और नबी के रोजे के दीदार की तमन्ना
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बरेली। इज्जतनगर के कंजादासपुर निवासी मुस्जाब खां की पत्नी शहीदन अपने पिता के साथ बंटवारे में पाकिस्तान चली गईं थीं। वहां से लौटने के बाद शहीदन को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकी। वह हज, खानेकाबा और नबी के रोजे के दीदार की तमन्ना दिल में लिए ही दुनिया से रुखसत हो गईं।
शहीदन के पाकिस्तान जाने और भारत आने की कहानी कुछ इस तरह है। उनकी पैदाइश 1939 में पंजाब के जालंधर में हुई थी। पिता दलशेर खां बुलंदशहर के रहने वाले थे। रेलवे में नौकरी करते हुए उनका स्थानांतरण जालंधर हो गया। सन 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो दलशेर खां हालात को देखकर लाहौर जाने वाली ट्रेन में बैठकर पाकिस्तान चले गए। सन 1954 में जब भारत और पाकिस्तान का समझौता हुआ तो वह अपनी बेटी शहीदन को लेकर भारत आ गए। यहां बेटी की शादी कंजादासपुर के एक किसान परिवार में मुस्जाब खां से हुई। शहीदन के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। सबकी शादी हो चुकी है। लेकिन शहीदन की किस्मत कुछ ऐसे थी कि भारत में जन्म लेने के बावजूद वह भारत की नागरिकता हासिल नहीं कर सकीं। बेटों ने कई बार मां को नागरिकता दिलाने के लिए आवेदन किया लेकिन असफल रहे। शहीदन के बेटे हशमत खां ने मां की पूरी कहानी बयान करते हुए बताया कि हर मुसलमान की तरह वह भी हज और मक्का मदीना का दीदार करना चाहती थीं लेकिन उनकी ख्वाहिश अधूरी रह गई।
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छह बार आवेदन के बावजूद नहीं मिली नागरिकता
शहीदन के बेटे हशमत खां ने बताया कि उन्होंने 1990, 1992 और 1993 में नागरिकता के लिए आवेदन किया था। 2005 में गृहमंत्रालय में ऑनलाइन आवेदन किया। फिर 2013 में सीधे गृहमंत्रालय में आवेदन किया। इसके बाद 2015 में जब आवेदन किया तो डीएम ने बुलवाया। वहां एक फार्म भरवाया गया, मगर कोई नतीजा नहीं निकला।
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