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Bareilly News: काई से बनाया कागज, पैकेजिंग मटेरियल व आभूषण

Sat, 17 Jan 2026 03:23 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 17 Jan 2026 03:23 AM IST
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Paper, packaging material and jewelery made from moss
दो सालों में दिया प्रयोग को अंजाम, हाल ही में एससीआई जरनल में मिली जगह, पर्यावरण के अनुकूल हैं उत्पाद, भविष्य में मेडिकल क्षेत्र में प्रयोग करने की योजना
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बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण देते हुए काई (एल्गाई) से कागज, लिफाफा व लॉकेट बनाए। इस कार्य को करने में करीब दो वर्ष का समय लगा है। काई के उत्पाद बनाने का मुख्य लक्ष्य भविष्य में मेडिकल उत्पादों की पैकेजिंग मटेरियल तैयार करना है, क्योंकि काई के उत्पाद पर्यावारण के अनुकूल है।
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रुविवि के पादप विज्ञान के असिस्टेंट प्रो. ललित पांडेय ने बताया कि पर्यावरण में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड काई बनाती है। इस काई को निकालकर सुखाकर प्रयोग करने के बाद इससे कागज, पैकेंजिंग मटेरियल व ज्वेलरी भी तैयार की। सबसे अच्छी बात ये है कि यदि कागज या पैकेजिंग मटेरियल खराब होगा तो वह स्वत: ही पर्यावरण में घुल जाएगा। काई पूर्ण रूप से सेल्युलोज से बनी होती है। अब इन उत्पादों को मेडिकल उत्पाद जैसे दवाओं की पैकेजिंग, बच्चों के डाइपर बनाने के लिए कर सकते हैं, क्योंकि ये पानी सबसे अधिक सोखते हैं और पर्यावरण को किसी भी सूरत में नुकसान नहीं पहुंचाते। काई की खेती के लिए सबसे अच्छा मौसम नवंबर व दिसंबर रहता है, पहली बार यदि तालाब से काई निकाली जाए तो दोबारा 21 दिन में होती है। इसके बाद दस दिन में काई की खेती होती रहती है। संवाद
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रुविवि के चार तालाबों से काई निकाल बनाए उत्पाद

बॉटनिकल गार्डन में तीन तालाबों व केंद्रीय पुस्तकालय के सामने बने एक फाउंटेन समेत चार जगह से अलग-अलग गुणवत्ता की काई का पल्प निकाला गया, जिसके बाद इसे धूप में सुखाया गया। काई सूखने के बाद छात्रों ने प्याज व लहसुन के रस से उत्पाद बनाए। जो पल्प सूखने के बाद अधिक सख्त था उससे पैकेजिंग मटेरियल बनाया, जो कम सख्त था उससे कागज बना इस पर छात्रों ने लिखकर भी देखा। वहीं जो पल्प कुछ मुलायम रहा उससे गणेश की आकृति का एक लॉकेट बनाने में भी सफलता मिली। हालांकि एक कागज तैयार करने में करीब 180 रुपये का खर्च आया, लेकिन भविष्य में ये खर्च कम होगा।

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इस कार्य में एमएससी के छात्रों ने की सहायता-
डॉ. ललित ने बताया कि इस कार्य को करने में बड़ी भूमिका एमएससी के विद्यार्थियों की रही है, जिन्होंने काई निकालने व इसके प्रयोग में सहायता की। बदायूं की छात्रा रिया सिंह, रिया शर्मा व कृष्ण पाल तीनों छात्रों ने लंबा समय इस कार्य में मेहनत की। हालांकि, अब ये छात्र अब एमएससी पास हो चुके हैं। वहीं, रिया सिंह पीएचडी कर रहीं हैं। इस प्रयोग को एससीआई (साइंस साइटेशन इंडेक्स) जरनल में हाल ही में जगह मिली है।
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