Migratory Birds: शहरीकरण और प्रदूषण की वजह से प्रवासी पक्षियों ने मुंह मोड़ा, गौरैया भी बना रही दूरी
दो-तीन दशक पहले तक बरेली जिले में सर्दियों के सीजन में विदेशी प्रवासी पक्षियों की 15 से ज्यादा प्रजातियां जिले के वेटलैंडों पर आती थीं। अब दो-तीन प्रजातियों के ही पक्षी दिखते हैं।
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शहरीकरण और प्रदूषण का असर मानव स्वास्थ्य के साथ जल, जंगल और जमीन पर भी दिख रहा है। इससे पशु-पक्षियों के लिए भी प्रतिकूल हालात पैदा हो रहे हैं। बरेली जिले में जंगलों का रकबा न के बराबर है। ज्यादातर वेटलैंड अस्तित्व खो चुके हैं। इस कारण सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों ने मुंह मोड़ लिया है।
हालात ये हैं कि घरों में रहना पसंद करने वाली छोटी चिड़िया गौरैया ने भी दूरी बना ली है। ईगल गिद्ध की प्रजाति लगभग विलुप्त हो चुकी है। हालांकि, राज्यपक्षी सारस का कुनबा कुछ बढ़ रहा है। हर वर्ष पक्षियों को संरक्षित करने के लिए राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है, लेकिन इस दिशा में ठोस काम नजर नहीं आते। पक्षियों को लेकर आम लोग भी जागरूक नहीं है। शहरीकरण और प्रदूषण के अलावा लोगों में जागरूकता का अभाव भी मानव और पक्षियों के बीच बढ़ रही दूरी का कारण है।
प्रवासी पक्षियों की 15 में से बचीं सिर्फ तीन प्रजातियां
दो-तीन दशक पहले तक जिले में सर्दियों के सीजन में विदेशी प्रवासी पक्षियों की 15 से ज्यादा प्रजातियां जिले के वेटलैंडों पर आती थीं। अब दो-तीन प्रजातियों के ही पक्षी दिखते हैं। हालांकि, ग्राम विकास और पंचायतीराज विभाग जिले में झीलों को विकसित कर रहे हैं। लीलौर झील को लेकर काफी काम हुआ है। लेकिन मुंह मोड़ चुके प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट अब वेटलैंडों पर सुनाई नहीं देती। रामगंगा के किनारे वेटलैंड भी प्रदूषित हो गए हैं। इसके अलावा यहां मानव का दखल बढ़ गया है। अब यहां भी प्रवासी पक्षी नहीं आते।
चुनिंदा इलाकों में ही दिखती है गौरैया
घरों में हमारे साथ रहने वाली गौरैया ने भी अब दूसरी बना दी है। गौरैया अब कुछ चुनिंदा इलाकों में ही नजर आती है। शहरीकरण में बस्तियां गौरैया के रहने के मुफीद नहीं है। घरों में अब अनाज भी छतों पर नहीं सुखाया जाता। ऐसे में गौरैया को भोजन और सुरक्षित स्थान नहीं मिल रहा। हालांकि, करीब पांच साल पहले गौरैया संरक्षण के लिए अभियान शुरू किए जाने के बाद इसके कुछ सार्थक परिणाम भी दिख रहे हैं। वन विभाग के साथ कई स्वयंसेवी और पशु-पक्षी प्रेमी संस्थाएं भी गौरैया संरक्षण की दिशा में काम कर रही हैं।
राज्य पक्षी सारस का बढ़ रहा कुनबा
राज्य पक्षी सारस का कुनबा जरूर बढ़ रहा है। 26 और 27 जून 2023 को जिले की छह रेंज में कराई गई सारस की गणना के दौरान जिले में जिले में 275 वयस्क और 48 अवयस्क सारस मिले थे। इस दौरान इनकी संख्या 16 ज्यादा दर्ज की गई थी। दिसंबर में कराई गई गणना के दौरान जिले में 342 सारस मिले हैं। इनमें 284 व्यस्क और 58 अवयस्क सारस शामिल हैं। सारसों की गणना में शिक्षण संस्थाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं, प्रबुद्ध नागरिकों और वन्य जीव प्रेमियों का सहयोग भी लिया गया।
लगभग विलुप्त हुई ईगल गिद्ध की प्रजाति
जिले में ईगल प्रजाति का गिद्ध लगभग विलुप्त हो गया है। आखिरी बार 2021 में रबर फैक्टरी में ईगल प्रजाति का गिद्ध देखा गया था। इसके बाद पक्षियों की गणना में यह कभी नहीं दिखा। हालांकि, सफेद गिद्ध की प्रजाति अभी भी बहुतायत में है। रामगंगा इलाके में यह ज्यादा संख्या में पाए जाते हैं। पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि ईगल गिद्ध की संख्या अन्य जिलों में भी कम हुई है।
डॉ. काजल दास गुप्ता
प्रदूषण का पक्षियों पर बुरा असर
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. काजल दास गुप्ता ने बताया कि शहरीकरण, प्रदूषण, औद्योगिकीकरण का पक्षियों पर बुरा असर पड़ा है। यह हमसे दूरी बनाने लगे हैं। जल प्रदूषण और वेटलैंड दूषित होने के कारण सर्दियों में अब प्रवासी पक्षी भी नहीं आते। पक्षियों को दो वर्गों में रखा जाता है। एक रेजीडेंस पक्षी जो हमारे बीच ही रहते हैं और दूसरे प्रवासी पक्षी जो समय-समय पर आते हैं। सुरक्षित माहौल, आसानी से भोजन की कमी, शोर-शराबा इनको हमसे दूर कर रहे हैं।
पक्षी प्रेमी अनिल साहनी ने कहा कि जागरूकता के साथ पक्षियों के लिए उपयुक्त माहौल बनाना हम सभी की जिम्मेदारी है। पक्षी हमारे ईको सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अगर हम इनके संरक्षण को कुछ नहीं कर सकते तो इनको परेशान भी न करें। रात की पार्टियां, ध्वनि प्रदूषण, तेज रोशनी से भी पक्षियों के प्रजनन पर असर पड़ता है। हमें कोई काम ऐसे नहीं करने चाहिए जिससे पक्षियों की जीवन प्रक्रिया प्रभावित हो। अगर पक्षी रहेंगे तब ही हमारा ईको सिस्टम सुरक्षित रहेगा।
सामाजिक वानिकी के एसडीओ कमल कुमार ने बताया कि सारस की संख्या बढ़ी है। आने वाले दिनों में अन्य प्रजातियों की संख्या भी बढ़ेगी। जिले में वन भूमि कम है। पक्षियों के संरक्षण को जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। वेटलैंड की संख्या घटने के कारण अब प्रवासी पक्षी कम संख्या में आते हैं।