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अब प्लास्टिक के गमलों में आंगन के बाग
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
Updated Tue, 27 Feb 2018 07:25 PM IST
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अगर आपने घर-आंगन में बागवानी शुरू की है तो गमले खरीदने की समस्या जरूर सामनेे आ रही होगी। कुछ समय पहले तक हम सभी पौधे लगाने के लिए मिट्टी के गमले प्रयोग करते थे, लेकिन अब मिट्टी के गमले महंगे हो गए हैं। वजन ज्यादा होने के कारण इन्हें ढोना भी मुश्किल होता है। लिहाजा अब प्लास्टिक के गमलों में घरेलू बगीचे सजने लगे हैं।
मिट्टी के बर्तन और गमले बनाने के लिए तालाबों की मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। अब तालाब रहे नहीं, सो मिट्टी की किल्लत ने कुम्हारों से पुश्तैनी धंधा छुड़वा दिया। यही वजह है कि मिट्टी के बर्तनों का चलन भी अब समाप्त होता जा रहा है। पूजा पाठ के अलावा मिट्टी के बर्तनों का उपयोग घरों में कम ही होता है। अब मिट्टी के गमलों का वजूद भी सीमित होता जा रहा है और इनका स्थान प्लास्टिक के गमले ले रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीदार सिंह बताते हैं कि मिट्टी के गमलों का अलग स्थान है। मिट्टी के गमले पौधों को जीवन देते हैं। जहां तक प्लास्टिक के गमलों का सवाल है, यदि धूप मिलती रहे तो पौधों को कोई खतरा नहीं है। नर्सरी कारोबारी बाबू राम बताते हैं कि कम पके मिट्टी के गमले में नोनी लग जाती है जो पौधों को मार देती है। गमले की कोई उम्र नहीं हैं, इसलिए प्लास्टिक के गमले तेजी से प्रचलन में आ रहे हैं। प्लास्टिक के गमले मनपसंद रंगों में मिल जाते हैं और उनकी ज्यादा देखभाल की जरूरत भी नहीं होती है।
10 से लेकर हजार रुपये तक के गमले
प्लास्टिक आइटम कारोबारी राजीव खंडेलवाल ने बताया कि विभिन्न रंगों और डिजाइन के प्लास्टिक गमले 10 रुपयेे से लेकर एक हजार रुपये तक में मिल रहे हैं। इंजीनियर वैभव शर्मा बताते हैं कि गमला ही नहीं तमाम कृषि यंत्र भी प्लास्टिक के आ रहे हैं। प्लास्टिक गमलों का इस्तेमाल आसान है। किचन गार्डन कल्चर के कारण प्लास्टिक के गमलों का प्रयोग बढ़ा है। लोग अपनी जरूरत के हिसाब से सब्जियां तक उगाने लगे हैं। तमाम हर्बल, सजावटी और फूलों के पौधे भी किचन गार्डन का हिस्सा बन रहे हैैं।
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इसलिए बढ़ा प्रयोग
वजन कम होने से छतों पर पहुंचाना आसान।
एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में टूटने का खतरा नहीं।
इनसे मिट्टी नहीं झड़ती, इससे सफाई की टेंशन नहीं।
टूटने के बाद कबाड़ के रूप में बिक जाते हैं।
मन पसंद रंग, साइज और डिजाइन में उपलब्धता।
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मिट्टी के बर्तन और गमले बनाने के लिए तालाबों की मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। अब तालाब रहे नहीं, सो मिट्टी की किल्लत ने कुम्हारों से पुश्तैनी धंधा छुड़वा दिया। यही वजह है कि मिट्टी के बर्तनों का चलन भी अब समाप्त होता जा रहा है। पूजा पाठ के अलावा मिट्टी के बर्तनों का उपयोग घरों में कम ही होता है। अब मिट्टी के गमलों का वजूद भी सीमित होता जा रहा है और इनका स्थान प्लास्टिक के गमले ले रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीदार सिंह बताते हैं कि मिट्टी के गमलों का अलग स्थान है। मिट्टी के गमले पौधों को जीवन देते हैं। जहां तक प्लास्टिक के गमलों का सवाल है, यदि धूप मिलती रहे तो पौधों को कोई खतरा नहीं है। नर्सरी कारोबारी बाबू राम बताते हैं कि कम पके मिट्टी के गमले में नोनी लग जाती है जो पौधों को मार देती है। गमले की कोई उम्र नहीं हैं, इसलिए प्लास्टिक के गमले तेजी से प्रचलन में आ रहे हैं। प्लास्टिक के गमले मनपसंद रंगों में मिल जाते हैं और उनकी ज्यादा देखभाल की जरूरत भी नहीं होती है।
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10 से लेकर हजार रुपये तक के गमले
प्लास्टिक आइटम कारोबारी राजीव खंडेलवाल ने बताया कि विभिन्न रंगों और डिजाइन के प्लास्टिक गमले 10 रुपयेे से लेकर एक हजार रुपये तक में मिल रहे हैं। इंजीनियर वैभव शर्मा बताते हैं कि गमला ही नहीं तमाम कृषि यंत्र भी प्लास्टिक के आ रहे हैं। प्लास्टिक गमलों का इस्तेमाल आसान है। किचन गार्डन कल्चर के कारण प्लास्टिक के गमलों का प्रयोग बढ़ा है। लोग अपनी जरूरत के हिसाब से सब्जियां तक उगाने लगे हैं। तमाम हर्बल, सजावटी और फूलों के पौधे भी किचन गार्डन का हिस्सा बन रहे हैैं।
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इसलिए बढ़ा प्रयोग
वजन कम होने से छतों पर पहुंचाना आसान।
एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में टूटने का खतरा नहीं।
इनसे मिट्टी नहीं झड़ती, इससे सफाई की टेंशन नहीं।
टूटने के बाद कबाड़ के रूप में बिक जाते हैं।
मन पसंद रंग, साइज और डिजाइन में उपलब्धता।