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चेताने पर भी नहीं जागे नहीं अफसर
बरेली।
Updated Thu, 30 Nov 2017 02:31 AM IST
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अभी से यह नहीं कहा जा सकता कि नगर निगम चुनाव का क्या परिणाम होगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जो भी नतीजा होगा, उस पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों का असर जरूर दिखाई देगा। बुधवार को मतदान के दौरान जिस तरह मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाें की वजह से हजारों लोग मतदान करने से वंचित रह गए, अगर प्रशासन ने अमर उजाला की खबरों पर समय रहते कार्रवाई की होती तो वैसा नहीं होता। प्रशासन मामले की गंभीरता समझा तो लेकिन तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि खानापूरी कर चुनाव कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। ऐसे में वोटर लिस्टों की उन्हीं गड़बड़ियों को दुरुस्त किया गया जो अफसरों की गर्दन फंसा सकती हैं। इसके लिए बेरहमी से वोटरों के नाम मतदाता सूचियों से काटकर साफ कर दिए गए।
दरअसल, नगर निकाय चुनाव के लिए हुए पुनरीक्षण के दौरान बीएलओ (बूथ लेवल अफसरों) ने जमकर मनमानी की थी। नगर निगम की राजनीति से जुड़े लोगों ने बीएलओ का जमकर इस्तेमाल किया, मगर अफसर सोते रहे। नतीजा यह हुआ कि मतदाता सूचियां फाइनल होने से पहले ही तमाम शिकायतें आने लगीं। यहां तक कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई तो शांति विहार, बड़ी विहार आदि कई इलाकों में वोटों की संख्या उनकी कुल आबादी से भी काफी ऊपर पहुंच गई। लोगों की शिकायतें भी प्रशासन के अफसरों ने नहीं सुनीं। अमर उजाला 28 अक्तूबर को ‘वाह रे सिस्टम! जितनी आबादी, उससे ज्यादा वोटर’ शीर्षक से खबर छापी, तब कहीं प्रशासन ने इस मामले का संज्ञान लिया। हालांकि फिर भी कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय अफसरों ने जनगणना के आंकड़ों को ही गलत बता दिया।
बाद में प्रशासन को जब यह महसूस हुआ कि आबादी से ज्यादा वोटों पर उनकी गर्दन फंस सकती है तो बीएलओ को एक बार फिर मतदाता सूचियों को ‘दुरुस्त’ करने पर लगाया गया। बीएलओ ने पहले जिस अंधाधुंध ढंग से वोटों की संख्या बढ़ा दी थी, उसी अंधाधुंध ढंग से वोटों की संख्या आबादी से कम करने के लिए इस बार वोट काट डाले। तमाम वोटों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि कई तो पूरी की पूरी कॉलोनियां साफ हो गईं। तमाम परिवारों का एक भी वोट वोटर लिस्ट में नहीं बचा। अमर उजाला ने इसके बाद भी लगातार खबरें छापीं, लेकिन चुनाव प्रक्रिया में उलझे प्रशासन के लिए इसके बाद कुछ करने का समय ही नहीं बचा। आखिरकार मतदान के दिन वोटर लिस्ट के सारे घपले सामने आ गए और हजारों लोग मतदान करने से वंचित रह गए।
दरअसल, नगर निकाय चुनाव के लिए हुए पुनरीक्षण के दौरान बीएलओ (बूथ लेवल अफसरों) ने जमकर मनमानी की थी। नगर निगम की राजनीति से जुड़े लोगों ने बीएलओ का जमकर इस्तेमाल किया, मगर अफसर सोते रहे। नतीजा यह हुआ कि मतदाता सूचियां फाइनल होने से पहले ही तमाम शिकायतें आने लगीं। यहां तक कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई तो शांति विहार, बड़ी विहार आदि कई इलाकों में वोटों की संख्या उनकी कुल आबादी से भी काफी ऊपर पहुंच गई। लोगों की शिकायतें भी प्रशासन के अफसरों ने नहीं सुनीं। अमर उजाला 28 अक्तूबर को ‘वाह रे सिस्टम! जितनी आबादी, उससे ज्यादा वोटर’ शीर्षक से खबर छापी, तब कहीं प्रशासन ने इस मामले का संज्ञान लिया। हालांकि फिर भी कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय अफसरों ने जनगणना के आंकड़ों को ही गलत बता दिया।
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बाद में प्रशासन को जब यह महसूस हुआ कि आबादी से ज्यादा वोटों पर उनकी गर्दन फंस सकती है तो बीएलओ को एक बार फिर मतदाता सूचियों को ‘दुरुस्त’ करने पर लगाया गया। बीएलओ ने पहले जिस अंधाधुंध ढंग से वोटों की संख्या बढ़ा दी थी, उसी अंधाधुंध ढंग से वोटों की संख्या आबादी से कम करने के लिए इस बार वोट काट डाले। तमाम वोटों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि कई तो पूरी की पूरी कॉलोनियां साफ हो गईं। तमाम परिवारों का एक भी वोट वोटर लिस्ट में नहीं बचा। अमर उजाला ने इसके बाद भी लगातार खबरें छापीं, लेकिन चुनाव प्रक्रिया में उलझे प्रशासन के लिए इसके बाद कुछ करने का समय ही नहीं बचा। आखिरकार मतदान के दिन वोटर लिस्ट के सारे घपले सामने आ गए और हजारों लोग मतदान करने से वंचित रह गए।
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