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तीन बच्चों की कुंवारी मां... युगांडा तक फैला है देवांशी की ममता का आंचल

Sun, 08 May 2022 11:22 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2022 11:22 PM IST
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mother's day special
मदर्स डे की स्टोरी में - गोद ली हूई बेटी वनवयी के साथ देवांशी यादव
बरेली। देवांशी... अपने नाम के अनुरूप 30 साल की ऐसी कुंवारी मां हैं जिन्होंने रुढ़िवादी सोच को पीछे छोड़कर तीन अनाथ बच्चियों की जिंदगी में खुशियों के रंग भरने का फैसला किया और उस पर आज तक अडिग भी हैं। देवांशी की ममता का आंचल युगांडा तक फैला हुआ है जिसकी छांव में दो बच्चियां अपनी जिंदगी में धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ा रही हैं। साढ़े तीन साल की वानमयी बरेली में उनके साथ रहती है। बकौल देवांशी, वानमयी के मुंह से मम्मा सुनना उन्हें संसार का सबसे बड़ा सुख लगता है।
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एमिटी यूनिवर्सिटी की पढ़ी-लिखी देवांशी की मां संजू यादव एडीजी ऑफिस में बतौर ओएसडी तैनात हैं। पिता रामाश्रय यादव सीओ थे जो 1992 में बाजपुर में आतंकियों से मोर्चा लेते हुए शहीद हो गए थे। मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मिलने के बाद संजू यादव ने देवांशी को हर खुशी ही नहीं दी, संस्कार भी कूट-कूट कर भरे। पढ़ाई पूरी करने के बाद देवांशी बरेली आकर मां और नानी के साथ रहने लगीं। घर में अलग-अलग पीढ़ी तीन महिलाओं के बीच सन्नाटा रहना वैसे ही लाजमी था, उस पर मां दिन भर ड्यूटी पर रहती थीं। इसी बीच तीन साल पहले देवांशी ने शोलों पर चलने जैसा फैसला लिया।
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सबसे पहले देवांशी ने अपनी मां को बताया कि वह किसी अनाथ बच्ची को गोद लेना चाहती है। यह सुनकर संजू यादव अवाक रह गईं मगर देवांशी ने उन्हें राजी कर लिया। नानी को मनाना ज्यादा कठिन साबित हुआ। जमाना क्या कहेगा, कुंवारी लड़की मां बन रही है, कौन तुमसे शादी करेगा, जैसे तमाम सवालों की बूढ़ी नानी ने बौछार लगा दी लेकिन आखिरकार देवांशी के तर्कों के आगे हथियार डाल दिए। इसके बाद देवांशी ने बच्ची को गोद देने वाली संस्था कारा में रजिस्ट्रेशन कराया। मई 2019 में उन्होंने छह माह की अनाथ बच्ची को गोद लिया और उसका नाम रखा वानमयी।
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वानमयी अब साढ़े तीन साल की हो चुकी है और पूरे घर की जान है। नानी का पिछले साल देहांत हो गया। अब घर में देवांशी, वानमयी और उनकी मां संजू रहते हैं। संजू जब थकहारकर आफिस से घर लौटती हैं तो सबसे पहली वानमयी को देखना चाहती हैं। देवांशी का तो सारा संसार वानमयी के इर्द-गिर्द है ही। हाल ही में उन्होंने अफ्रीकन देश युगांडा की दो बच्चियों की भी परवरिश की जिम्मेदारी ली है। संवाद
युगांडा पर रिसर्च करते-करते ली सरीन और फेथ की परवरिश की जिम्मेदारी
देवांशी ने युगांडा के अनाथालय की दो और बच्चियों दस साल की सरीन और तीन साल की फेथ की भी परवरिश की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली है। सरीन का उन्होंने इसी साल अनाथालय से निकालकर युगांडा के ही एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिला कराया है। उसकी एक साल की फीस भी भेज दी है। देवांशी ने बताया कि वह युगांडा पर रिसर्च कर रही थीं। युगांडा काफी गरीब देश है, कुपोषण से वहां हर साल काफी तमाम बच्चों की मौत हो जाती है। एक संस्था के जरिये उन्हें वहां अनाथालय में रह रही दो बच्चियों के बारे में पता चला था।
दसवीं में पढ़ती थीं, तब हुआ था एसिड अटैक
देवांशी की 10वीं तक की पढ़ाई बरेली के सेंट मारिया स्कूल में हुई। इस बीच एक ऐसा हादसा उनके साथ हुआ जिसकी कड़वी यादें उनके मन में आज भी बसी हैं। बकौल देवांशी, 2008 जब वह दसवीं में पढ़ रही थीं. उनके साथ कोचिंग में पढ़ने वाला एक लड़का अक्सर उनका पीछा करता था। एक दिन उसने रास्ता रोककर बात करने की कोशिश की। देवांशी के इनकार के बाद उसने दो लड़कों से उन पर सिविल लाइंस हनुमान मंदिर के पास एसिड अटैक करा दिया। इसमें उनकी बायीं आंख बच गई। आसपास का हिस्सा झुलस गया। कई साल इलाज कराना पड़ा। यह घटना वह कभी नहीं भूल सकतीं। पिता का साया बचपन में ही उठ जाने से जिंदगी में काफी संघर्ष करना पड़ा।

शहीद पिता के नाम पर समाजसेवा भी
देवांशी अपने शहीद पिता के नाम पर रामाश्रय वेलफेयर सोसइटी के नाम से एनजीओ भी चलाती हैं और गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं। एनजीओ से करीब 600 बच्चे जुड़े हैं। इसके अलावा स्टेशन पर जाकर भी वह गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं। उन्हें कॉपी किताब, राशन, दवाई व इलाज भी उपलब्ध कराती हैं। 2018 में उन्होंने यह एनजीओ शुरू किया। घर पर काम करने आने वाली महिलाओं को भी पढ़ाती हैं।
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