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मोदी जी! जीत गरीबों के सहारे तो फिर सस्ते मकान किससे मांगे बेचारे 

Wed, 16 May 2018 06:16 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली Updated Wed, 16 May 2018 06:16 PM IST
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modi govt fails to provide houses to all poor
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश के 22 करोड़ गरीबों की जिंदगी में सुधार हुआ है, यह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के उस भाषण का अंश है जो उन्होंने कर्नाटक में पार्टी की जीत के बाद पीएम मोदी की मौजूदगी में दिया। हमसे कोई पूछे तो सच यह है कि हम इस दावे से जरा भी सहमत नहीं हैं। पीएम के ही नाम पर चल रही आवास योजना का बुरा हाल है। गरीबों को सस्ते मकान दिलाने का भरपूर प्रचार तो हो रहा है, लेकिन असलियत यह है कि इस योजना के लिए सरकार के बनाए नियम न बिल्डर मान रहे हैं, न प्राधिकरण। योजना के नियमों के मुताबिक अधिकांश बिल्डर अपने प्रोजेक्ट में 20 फीसदी मकान आर्थिक रूप से कमजोर और अल्प आय वर्ग के लिए नहीं बनाते, क्योंकि उनको डर रहता है कि अगर वह अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट में ईडब्ल्यूएस या एलआईजी बनाएंगे तो उनके मकान या फ्लैट बिकेंगे नहीं। सरकार ने ही उन्हें इस नियम से बच निकलने का विकल्प दे रखा है, लिहाजा ईडब्ल्यूईएस और एलआईजी मकान बनाने के बजाय वे शेल्टर फीस अदा करने का विकल्प अपनाते हैं। बीडीए की मकान बनाने की क्षमता सीमित है। इसलिए पीएम आवास योजना में भी मकान जरूरत के हिसाब से पर्याप्त संख्या में नहीं बन पा रहे हैं। 
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सस्ते मकान न बनाने पर अनेजा ग्रुप पर भारी जुर्माना 

बरेली। एड्रेस लॉ प्रोजेक्ट में गरीबों के लिए ईडब्ल्यूएस और एलआईजी न बनाने पर बरेली विकास प्राधिकरण ने अनेजा ग्रुप पर करीब सवा दो करोड़ से अधिक का जुर्माना (शेल्टर फीस) चुकाने के निर्देश दिए हैं। इसमें से अनेजा ग्रुप की ओर से बीडीए को 1.17 करोड़ रुपये चुका दिए गए हैं। शेल्टर फीस की बाकी धनराशि अगली किस्त में चुकाई जाएगी। 
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सिविल लाइंस के पाश इलाके में अनेजा ग्रुप ने अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट में करीब 200 फ्लैट बनाए हैं। यह प्रोजेक्ट नोटबंदी से पहले प्रारंभ हुआ था। नोटबंदी और रेरा के बाद रियल एस्टेट में मंदी आ गई। इसमें फ्लैट की बिक्री रुक गई। प्राधिकरण के नियमानुसार फर्म को अपने प्रोजेक्ट में 200 में से 10 फीसदी फ्लैट अल्प आय वर्ग और इतने ही निमन्न आर्य वर्ग के लिए  बनाने थे। इसी शर्त पर बीडीए ने प्रोजेक्ट का ले आउट स्वीकृत किया था। ग्रुप की ओर से गरीबों के लिए सस्ते मकान न बनाकर बीडीए को 40 फ्लैट की लागत की शेल्टर फीस 2.25 करोड़ रुपये से ज्यादा देनी पड़ेगी। ग्रुप ने इसमें से 1.17 करोड़ रुपये शेल्टर फीस बीडीए को अदा कर दी है। बाकी रकम अगली किस्त में चुकाने का आश्वासन दिया गया है। 
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प्राइवेट हाउसिंग प्रोजेक्ट में 20 फीसदी सस्ते मकान बनाने का नियम है। इसी शर्त पर प्रोजेक्ट का ले आउट प्राधिकरण से स्वीकृत होता है। अगर हम अपने प्रोजेक्ट में सस्ते मकान बनाते तो वह संख्या में कम बनते। इसलिए हमने बीडीए को शेल्टर फीस दे दी ताकि प्राधिकरण ज्यादा ईडब्ल्यूएस और एलआईजी मकान बनाकर अधिक लोगों को सरकार की योजना का फायदा दे सके। -  अमरपाल सिंह रोम्पी, अनेजा ग्रुप 

बीडीए और बिल्डरों के बीच फंसे गरीब
पीएम आवास योजना में डूडा ने प्रथम चरण में चयरित 656 गरीब पात्रों की सूची बीडीए को भेजी है। अब बीडीए के पास देने के लिए इतनी संख्या में मकान नहीं हैं। रामगंगा नगर आवासीय योजना में बीडीए के 110 ईडब्ल्यूएस मकान बने खड़े हैं। उनका अभी आवंटन होना बाकी है। 144 ईडब्ल्यूएस मकानों के टेंडर किए गए हैं। बाकी गरीबों को इंतजार करना पड़ेगा। यह तो पहली सूची की हालत है। 50 हजार गरीबों को मकान देने की नौबत आ जाए तो सरकारी बीडीए के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। बीडीए के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह गरीबों और निमभन आय वर्ग के परिवारों को छह माह या एक साल के अंदर इतनी संख्या में ईडब्ल्यूएस या एलआईजी मकान बनाकर दे सके। दूसरी ओर शहर में लगभग 40 (संख्या कुछ कम या ज्यादा हो सकती है) प्राइवेट डेवलपर्स अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट में मकान या फ्लैट बना रहे हैं। उनमें से अधिकांश ने अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट में गरीबों के लिए सस्ते मकान न बनाकर प्राधिकरण को शेल्टर फीस चुका दी। अब गरीबों के सामने सवाल है कि वे अपने लिए सस्ता मकान किससे मांगे। 


सस्ते मकान से बचने पर देनी होती है शेल्टर फीस
किसी भी बिल्डर को अपने 10 हेक्टेयर से कम प्रोजेक्ट में 20 फीसदी सस्ते मकान न बनाने पर प्राधिकरण को शेल्टर फीस देनी पड़ती है। बिल्डर अगर चाहे तो उसके पास दो विकल्प हैं। पहला यह कि वह अपनी ही कालोनी में 20 फीसदी सस्ते मकान बनाए और उनको सरकार के निर्धारित रेट (ईडब्ल्यूएस- 5.40 लाख और एलआईजी-9.0 लाख) पर डीएम की मौजूदगी में गरीबों और तीन लाख से कम आय वर्ग वाले परिवारों (निमभन आर्य वर्ग) को आवंटित करे। बिल्डर के सामने दूसरा विकल्प यह है कि वह अपने प्रोजेक्ट की लागत का 20 फीसदी पैसा प्राधिकरण को चुका दे। प्राधिकरण इस धनराशि को अलग बैंक खाते में जमा कराकर सस्ते मकान बनाए।  
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