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लाखों का कारोबार कर रहे हैं भगवान के दर्जी

Wed, 24 Aug 2016 01:09 AM IST
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली। Updated Wed, 24 Aug 2016 01:09 AM IST
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Millions of businesses are God's tailor
दजीऱ्र्जी
धोपेश्वरनाथ मंदिर हो या फिर बांके बिहारी मंदिर। यहां भगवान की प्रतिमाओं को वस्त्र पहनाना होता है तो लोग सीधे मॉडल टाउन भागते हैं। हरिमंदिर के बगल में भगवान के कपड़े सिलने वाले श्याम सुंदर सहगल के पास शहर के 400 मंदिराें के प्रतिमाआें के नाप हैं। इनको अगर भगवान का दर्जी कहा जाए तो कोई गलत नहीं।  इन्हें सिर्फ मंदिर का नाम बताना है, कपड़े तैयार मिलेंगे। 
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दुकान पर श्यामसुंदर सहगल के अलावा चार अन्य कारीगर जी जान से जुटे हुए हैं। पूरी दुकान रंग- बिरंगे चमकीले कपड़े और सितारों से चमक रही है। इनको जन्माष्टमी से पहले 150 से अधिक  आर्डर पूरे करने हैं। श्याम सुंदर के पास एक कापी में सभी मंदिरों के भगवान की प्रतिमाओं के नाप नोट हैं। किसी को भी भगवान को वस्त्र भेंट करने हैं तो मंदिर और भगवान का नाम लिखवा देते हैं।  30 साल से यह काम कर रहे श्याम बताते हैं कि उन्होंने वृंदावन में यह सीखा था। पहले लेडीज वर्क करते थे, लेकिन बाद में इसी में रम गए।  पूरी दुकान रंग- बिरंगे चमकीले कपड़े और सितारों से चमक रही है। इनको जन्माष्टमी से पहले 150 से अधिक   उनके पास अलखनाथ, धोपेश्वरनाथ, 84 घंटा मंदिर, आनंद आश्रम, हरिमंदिर, साहूकारा नौ दुर्गा मंदिर सहित कई बड़े मंदिरों की प्रतिमाओं का पूरा ब्यौरा है। इनके पास अलखनाथ, धोपेश्वरनाथ, 84 घंटा मंदिर, आनंद आश्रम, हरिमंदिर, साहूकारा नौ दुर्गा मंदिर सहित कई बड़े मंदिरों की प्रतिमाओं का पूरा ब्यौरा है। इनके पास आर्डर रामपुर, रानीखेत, अल्मोड़ा, बदायूं व मध्यप्रदेश से भी आते हैं। अब दिवाली तक इनके पास समय नहीं। 
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जन्माष्टमी पर ही कमा लेते हैं लाखों
श्याम सुंदर के पास इस वक्त करीब 150 वस्त्रों के आर्डर हैं जिनकी सिलाई के साथ कपड़ा वह पंद्रह सौ से तीन हजार रुपये में देते हैं। पांच लाख रुपये तक के भगवाने के वस्त्र वह तैयार करते हैं। इनमें खर्च निकाल कर कुछ दिनों में ही दो से ढाई लाख रुपये बच ही जाते हैं।  
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- पांच सालों में आई तेजी
श्याम सुंदर बताते हैं कि पिछले पांच सालों में इनके काम में तेजी आई है। पहले मात्र दस से बीस आर्डर आते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। नाप लिखी डायरी को दस साल हो गए। जिन मंदिरों में नाप नहीं है उनके जाकर ले आते हैं। गर्मियों में सिल्क जरी के कपड़े प्रतिमाओं के लिए सिलते हैं। जबकि जाड़ों में यह मखमली कपड़ों के सिलते हैं। 
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