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लॉकडाउन में मशरूम उगाया... बन गए प्रगतिशील किसान
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बरेली। लॉकडाउन में बेरोजगार हुए तमाम लोग अब तक उबर नहीं पाए हैं लेकिन एक युवा ने इसी आपदा में नए अवसर खोज लिए। मशरूम की खेती की शुरुआत ने उसकी किस्मत पलट दी। हाल ही में उत्तर प्रदेश कृषि विभाग ने उसे प्रगतिशील किसान का प्रशस्ति पत्र दिया है। खुद आत्मनिर्भर होने के बाद वह प्रशिक्षण देकर 118 और युवाओं को आत्मनिर्भर बना चुका है।
मथुरापुर ट्यूलिया के रहने वाले राजकुमार शर्मा निजी स्कूल में शिक्षक थे। कोरोना के चलते लॉकडाउन लगा तो सभी स्कूल बंद हो गए। नौकरी जाने के साथ उनकी आय का जरिया बंद हो गया। कोरोना में लॉकडाउन कब तक रहेगा, इसका कोई अंदाजा नहीं था। दिन गुजरते जा रहे थे और इसके साथ उनकी हताशा बढ़ रही थी। इसी दौरान प्रयागराज में रहने वाले उनके एक मित्र ने उन्हें ओएस्टर मशरूम की खेती का विकल्प सुझाया।
पहले तो राजकुमार इसके लिए राजी नहीं हुए लेकिन चूंकि कोई और कारोबार शुरू करने लायक पूंजी नहीं थी लिहाजा मजबूरी में शुरुआत कर दी। उनके मित्र ने कोलकाता की एक फर्म के ट्रेनर को बरेली भेजकर जगह-जगह प्रशिक्षण शिविर लगवाए। उन्होंने भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर घर के ही एक दस फुट लंबे और दस फुट चौड़े कमरे में ओएस्टर मशरूम के सौ बैग लगाए।
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इसमें लागत सिर्फ छह हजार रुपये पड़ी मगर डेढ़ क्विंटल मशरूम का उत्पादन हुआ जिसे बेचने के बाद उन्होंने 40 हजार रुपये का मुनाफा कमाया। राजकुमार ने बताया कि वह इंग्लिश से पीजी थे और सरकारी नौकरी के लिए कई फार्म भरे थे लेकिन सफलता नहीं मिली थी। इससे हुई निराशा को मशरूम के मुनाफे ने दूर कर दिया।
ओएस्टर के साथ शुरू की बटन मशरूम की खेती
राजकुमार के मुताबिक पहली बार अर्जित आय को उन्होंने खर्च करने के बजाय कुछ और रकम लगाकर 12 सौ बैग लगाए। इससे 20 क्विंटल उत्पादन के बाद पांच लाख से ज्यादा आय हुई। उन्होंने बताया कि ओएस्टर मशरूम पूरी तरह ऑर्गेनिक और बेहद स्वास्थ्यवर्धक है मगर बाजार में इसकी मांग बटन मशरूम से कम है। लिहाजा उन्होंने बटन मशरूम की भी खेती शुरू की और उसमें भी सफलता मिली। करीब छह माह के सीजन के दौरान मशरूम की खेती से करीब छह लाख रुपये से ज्यादा आय हो जाती है। लॉकडाउन खत्म होने के बाद उन्होंने दोबारा स्कूल ज्वाइन कर शिक्षण कार्य भी शुरू कर दिया है।
खेती करने के लिए कृषि भूमि की जरूरत नहीं
ओएस्टर मशरूम की खेती में जमीन की कोई जरूरत नहीं होती। इसमें हैंगिंग विधि से बैग लगाए जाते हैं। एक कमरे में करीब सौ बैग लग जाते हैं। लागत पांच से छह हजार रुपये पड़ती है। सबसे पहले भूसा को भिगोया जाता है फिर उसे स्टेबलाइज कर सुखाकर बीज डालकर बैग लगाए जाते हैं। वातावरण का तापमाप 30 डिग्री होने तक उत्पादन होता है। इससे अधिक तापमान पर फसल बर्बाद हो जाती है। अक्तूबर से फरवरी तक सीजन होता है। अगर तापमान बनाए रखने के लिए कूलर लगाने की सुविधा है तो यह अप्रैल तक चल जाता है। ठंडे स्थानों पर तापमान अनुकूल होने से मशरूम सदाबहार खेती कही जाती है।
कैदियों-महिलाओं को भी सिखाई मशरूम की खेती
मशरूम की खेती में सफलता मिलने के बाद राजकुमार ने आईवीआरआई कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क किया। कृषि विज्ञान केंद्र और स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से गांव-गांव शिविर लगाकर किसानों को खड़ी खेती के अलावा सीजन के दौरान अतिरिक्त आय के लिए मशरूम की खेती के लिए प्रेरित किया। जेल के कैदियों को भी मशरूम की खेती सिखाई। कारागार परिसर में ही खेती करने का तरीका बताया। बिथरी चैनपुर में स्वयं सहायता समूल की महिलाओं को भी यह गुर सिखाने के साथ ओएस्टर मशरूम को सुखाकर अचार बनाने की कला सिखाई।
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मथुरापुर ट्यूलिया के रहने वाले राजकुमार शर्मा निजी स्कूल में शिक्षक थे। कोरोना के चलते लॉकडाउन लगा तो सभी स्कूल बंद हो गए। नौकरी जाने के साथ उनकी आय का जरिया बंद हो गया। कोरोना में लॉकडाउन कब तक रहेगा, इसका कोई अंदाजा नहीं था। दिन गुजरते जा रहे थे और इसके साथ उनकी हताशा बढ़ रही थी। इसी दौरान प्रयागराज में रहने वाले उनके एक मित्र ने उन्हें ओएस्टर मशरूम की खेती का विकल्प सुझाया।
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पहले तो राजकुमार इसके लिए राजी नहीं हुए लेकिन चूंकि कोई और कारोबार शुरू करने लायक पूंजी नहीं थी लिहाजा मजबूरी में शुरुआत कर दी। उनके मित्र ने कोलकाता की एक फर्म के ट्रेनर को बरेली भेजकर जगह-जगह प्रशिक्षण शिविर लगवाए। उन्होंने भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर घर के ही एक दस फुट लंबे और दस फुट चौड़े कमरे में ओएस्टर मशरूम के सौ बैग लगाए।
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इसमें लागत सिर्फ छह हजार रुपये पड़ी मगर डेढ़ क्विंटल मशरूम का उत्पादन हुआ जिसे बेचने के बाद उन्होंने 40 हजार रुपये का मुनाफा कमाया। राजकुमार ने बताया कि वह इंग्लिश से पीजी थे और सरकारी नौकरी के लिए कई फार्म भरे थे लेकिन सफलता नहीं मिली थी। इससे हुई निराशा को मशरूम के मुनाफे ने दूर कर दिया।
ओएस्टर के साथ शुरू की बटन मशरूम की खेती
राजकुमार के मुताबिक पहली बार अर्जित आय को उन्होंने खर्च करने के बजाय कुछ और रकम लगाकर 12 सौ बैग लगाए। इससे 20 क्विंटल उत्पादन के बाद पांच लाख से ज्यादा आय हुई। उन्होंने बताया कि ओएस्टर मशरूम पूरी तरह ऑर्गेनिक और बेहद स्वास्थ्यवर्धक है मगर बाजार में इसकी मांग बटन मशरूम से कम है। लिहाजा उन्होंने बटन मशरूम की भी खेती शुरू की और उसमें भी सफलता मिली। करीब छह माह के सीजन के दौरान मशरूम की खेती से करीब छह लाख रुपये से ज्यादा आय हो जाती है। लॉकडाउन खत्म होने के बाद उन्होंने दोबारा स्कूल ज्वाइन कर शिक्षण कार्य भी शुरू कर दिया है।
खेती करने के लिए कृषि भूमि की जरूरत नहीं
ओएस्टर मशरूम की खेती में जमीन की कोई जरूरत नहीं होती। इसमें हैंगिंग विधि से बैग लगाए जाते हैं। एक कमरे में करीब सौ बैग लग जाते हैं। लागत पांच से छह हजार रुपये पड़ती है। सबसे पहले भूसा को भिगोया जाता है फिर उसे स्टेबलाइज कर सुखाकर बीज डालकर बैग लगाए जाते हैं। वातावरण का तापमाप 30 डिग्री होने तक उत्पादन होता है। इससे अधिक तापमान पर फसल बर्बाद हो जाती है। अक्तूबर से फरवरी तक सीजन होता है। अगर तापमान बनाए रखने के लिए कूलर लगाने की सुविधा है तो यह अप्रैल तक चल जाता है। ठंडे स्थानों पर तापमान अनुकूल होने से मशरूम सदाबहार खेती कही जाती है।
कैदियों-महिलाओं को भी सिखाई मशरूम की खेती
मशरूम की खेती में सफलता मिलने के बाद राजकुमार ने आईवीआरआई कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क किया। कृषि विज्ञान केंद्र और स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से गांव-गांव शिविर लगाकर किसानों को खड़ी खेती के अलावा सीजन के दौरान अतिरिक्त आय के लिए मशरूम की खेती के लिए प्रेरित किया। जेल के कैदियों को भी मशरूम की खेती सिखाई। कारागार परिसर में ही खेती करने का तरीका बताया। बिथरी चैनपुर में स्वयं सहायता समूल की महिलाओं को भी यह गुर सिखाने के साथ ओएस्टर मशरूम को सुखाकर अचार बनाने की कला सिखाई।