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नहर के सहारे लहलहाती सपा वोटरों की फसल

Fri, 22 Sep 2017 01:21 AM IST
बरेली
बरेली Updated Fri, 22 Sep 2017 01:21 AM IST
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सपा शासन में पार्टी के एक बड़े नेता की पैरवी पर लाई गई बदायूं सिंचाई परियोजना के पीछे दरअसल नहर के सहारे वोटों की फसल काटने की योजना थी। बरेली की सदर के अलावा आंवला और दातागंज तहसील के इलाके में मुख्य नहर के साथ दो बड़ी ब्रांच नहरें निकालकर सपा नेता ने अपने समर्थकों को न सिर्फ सरकार से मोटा मुआवजा दिलाने का तानाबाना बुना था, बल्कि नहरों के नाम पर किसान के सामने खुद को उनके मसीहा के तौर पर पेश करने की भी योजना थी, लेकिन यह विशाल प्रोजेक्ट समय से पूरा न होने के कारण दोनों मोर्चों पर कामयाबी नहीं मिल पाई। हालांकि इस परियोजना में बड़े किसान फिर भी अपनी बंजर और कम उपजाऊ जमीन अधिग्रहीत कराकर मोटा मुआवजा झटकने में कामयाब हो गए जबकि छोटे किसान तबाह हो गए। चार-छह बीघा के छोटे-मोटे रकबे के मालिक इन किसानों अपनी जमीन अधिग्रहण में गवांने के बाद अब जीवनयापन के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है। 
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बरेली की सदर, आंवला और बदायूं की दातागंज तहसील के क्षेत्र में सिंचाई के लिए नहरें नहीं हैं। तीनों तहसीलों के दो सौ से ज्यादा गांवों के किसान खरीफ और रबी की फसलों की सिंचाई के लिए पंप सेट, नलकूप जैसे निजी संसाधन या मानसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं। किसानों की इसी दिक्कत के बहाने मुलायम सरकार में सपा नेताओं ने बरेली और बदायूं में नहर निकालने की पैरवी की थी। बदायूं के एक बड़े सपा नेता ने अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए इस काम में प्रमुख भूमिका अदा की और अखिलेश सरकार में अपने कद का इस्तेमाल कर ‘बदायूं सिंचाई परियोजना’ मंजूर करा दी।
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परियोजना मंजूर तो हो गई लेकिन समय से पूरी नहीं हो पाई। इस बीच पांच साल में जमीनों के सर्किल रेट बढ़ने से किसानों का मुआवजा भी बढ़ता चला गया। बाढ़ खंड का बरेली से आंवला के कुछ गांवों से होते हुए दातागंज तक नहर निकालने का बजट पूर्व स्वीकृत बजट से चार गुना पहुंच गया। बढ़े सर्किल रेट के कारण बड़े किसानों को मोटा मुआवजा मिला और छोटे किसान अपनी जमीन गवांकर तबाह हो गए। अब इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले इंजीनियर नए सिरे से बजट मंजूर कराकर ऊपरी कमाई का इंतजाम करने में लगे हैं। 
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जमीन न देने पर अड़े किसान 
बदायूं सिंचाई परियोजना में तमाम गांवों की जमीन पहले ही अधिग्रहीत हो चुकी है। आंवला क्षेत्र में आने वाले गांवों के किसानों को सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा भी बंट चुका है। मगर, रफियाबाद, कैमुआ, मजनूपुर समेत तमाम गांवों के किसान नहर के लिए अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं। हालांकि प्रतापपुर कोहनी के किसानों ने बदायूं सिंचाई परियोजना के लिए अपनी जमीन सरकारी नियमों से तय मुआवजे पर देने के लिए अपनी सहमति दे दी है, मगर बदायूं रोड पर पहले से मकान और दुकानें बनी खड़ी हैं। किसान यहां अपनी जमीन देने को तैयार नहीं है। इसलिए परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही। 

मुआवजा देने में भी छोटे किसानों की अनदेखी 
 बदायूं सिंचाई परियोजना में बनने वाली मुख्य नहर, उसकी दो ब्रांच और माइनर नहरों के निर्माण के लिए जमीन देकर चार या छह बीघे जोत वाले छोटे किसान तबाह हो चुके हैं। कई किसानों की जितनी जमीन अधिग्रहीत की गई है, उन्हें उससे कम मुआवजा मिला। ऐसे किसान कहीं के नहीं रहे क्योंकि न तो उनके पास खेती लायक जमीन बची है, न ही इतना मुआवजा मिला जिससे वह रोजगार कर लेते। कुछ किसानों ने अपना दर्द इस तरह बयां किया। 

फोटो--
मेरे पास 5 बीघा जमीन थी। सब नहर में चली गई। सर्किल रेट के आधार पर जो मुआवजा मिला, वह खर्च हो चुका है। हमने मुआवजे के पैसे से भैंस खरीदी थी। परिवार का गुजारा उसी से जैसे-तैसे चल रहा है। -पर्वत मौर्य, भमोरा
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मेरी पौने दो बीघा जमीन एक जगह नहर में गई। जो एक या डेढ़ बीघा जमीन बची भी, वह खेती लायक नहीं रही। अब हम क्या करें। पहले नौकरी की थी, उसकी पेंशन मिल रही है। उसी से परिवार का खर्च चला रहे हैं। - रामभरोसे लाल, भमोरा
फोटो--
सात बीघा जमीन में से पांच बीघा नहर में चली गई। पहले हम चार भाई इसी जमीन में खेती करके परिवार का खर्च चलाते थे। यह जमीन जाने के बाद सिर्फ 12.94 लाख रुपये का मुआवजा मिला जो चारों में बंट गया। अब किसी के पास पैसा भी नहीं बचा।  - चंद्रपाल खेडा 
फोटो--
 मेरे पास 12 बीघे जमीन थी। 10 बीघा नहर में चली गई। दो बीघे बची है, वह किसी काम की नहीं रही। हम उसमें खेती भी नहीं कर सकते। हमें सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा मिला। वह मुआवजा खर्च हो चुका है। अब हम मजदूरी करने को मजबूर हैं। - मदनलाल, खेड़ा 
फोटो-
एक जगह हम दो भाइयों की 3.5 बीघा जमीन थी। उसमें से 2.5 बीघा नहर में चली गई। छह बीघा का खेत अलग से था। उसमें भी सवा दो बीघा नहर में चली गई। इस तरह पूरी जमीन खुर्दबुर्द हो गई। न जमीन खेती लायक रही, न पूरा मुआवजा मिला। - जागनलाल, खेड़ा 
फोटो-
मेरे पास पहले ही केवल 1.5 बीघा जमीन थी जो सबकी सब नहर मे ंचली गई। उसी जमीन से परिवार का गुजारा चलता था। कुछ जमीन बंटाई पर लेते थे। अब हम मजदूरी करके परिवार चला रहे हैं। - मुलू कश्यप, खेड़ा 


फोटो--वीरपाल सिंह यादव 
प्रोजेक्ट की लागत बढ़ा रहे हैं इंजीनियर 
 बदायूं सिंचाई परियोजना में नहर बनाने के लिए पहले बदायूं रोड पर चांडपुर नवदिया के लिए सड़क क्रास की गई। फिर दोबारा नहर सड़क क्रास कर पूरब की ओर लाई जा रही है। इसके लिए दो बार पीडब्ल्यूडी से एनओसी लेनी पड़ेगी। सड़क कटिंग पर पुलिया भी बनानी पड़ेगी जिससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़ेगी। इंजीनियर कोई भी प्रोजेक्ट बनाने से पहले अपने खाने कमाने के तरीके निकाल लेते हैं। - वीरपाल सिंह यादव, पूर्व जिलाध्यक्ष समाजवादी पार्टी
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