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गन्ने की रिजेक्टेड प्रजाति बो रहे किसान

बरेली Updated Fri, 03 Apr 2015 01:26 AM IST
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जागरूकता के अभाव में बरेली मंडल के किसान गन्ने की वह प्रजाति बो रहे हैं, जिसे चालू सत्र के लिए ‘रिजेक्टेड’ घोषित किया जा चुका है। नई प्रजातियों को दरकिनार कर किसान बरसों पुरानी इस प्रजाति पर भरोसा कर रहे हैं। भविष्य में उन्हें इसका कम दाम मिलेगा। मिलें भी इस गन्ने की खरीद में आनाकानी करेंगी।
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  कोयंबटूर और शाहजहांपुर गन्ना शोध परिषद की सह संस्था सेवरही (कुशीनगर) संस्थान ने पंद्रह साल पहले कोसे-92423 प्रजाति विकसित की थी। इस सामान्य प्रजाति से प्रति क्विंटल नौ किलो तक शुगर रिकवरी मिली। किसानों की पसंद रही इस प्रजाति को वक्त के साथ रेड रॉट रोग ने घेर लिया। गन्ने में लगने वाले लाल रंग के फंगस से इसकी काफी दुर्दशा हुई। मिल प्रबंधनों की नाराजगी के बाद समीक्षा में शोध संस्थान और शासन ने भी इस प्रजाति को अस्वीकृत करने का निर्णय ले लिया। हालांकि, इसकी व्यापक जानकारी अभी किसानों तक नहीं पहुंची है और वे इसे अब भी बो रहे हैं।


मंडल में प्रजाति का ब्योरा
बरेली मंडल में गुजरे सत्र में 238118 हेक्टेयर में गन्ने की फसल थी। इस प्रजाति का गन्ना बरेली जिले में 14 फीसदी, शाहजहांपुर में छह फीसदी, पीलीभीत में सर्वाधिक 18 फीसदी और बदायूं में एक फीसदी था। इस बार कुल गन्ना क्षेत्रफल और बढ़ सकता है। इस प्रजाति का गन्ना बहुतायत में बोने की सूचना मिल रही है। बहेड़ी क्षेत्र के कुल गन्ना क्षेत्रफल में करीब चालीस फीसदी यही प्रजाति इस बार भी बोई जा रही है।

नई प्रजातियां अपनाने से गुरेज
परंपरागत खेती की धुन में रमे किसान उन नई प्रजातियों को दरकिनार कर रहे हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और शुगर रिकवरी ज्यादा है। अगैती खेती के लिए सीओ-0238 और 0239, सीओ-118, सीओएस-8272 और 8452, सीओपी-3220 श्रेष्ठ प्रजातियां हैं। इनकी रिकवरी दस किलो प्रति क्विंटल तक है। सामान्य में सीओएसई-1434, सीओएस-8279, सीओपी-97222 और सीओएस-5011 शामिल हैं।

वर्जन
चार साल तक चरणबद्ध योजना बनाकर किसी प्रजाति को रिजेक्ट किया जाता है। सीओएसई-92423 का यह अंतिम वर्ष था। हमने किसानों को इस प्रजाति का बीज नहीं दिया है। वे अपने पास से बो रहे हैं तो नुकसान उठाएंगे। रेडरॉट पर अंकुश को ट्राइकोडर्मा का उपयोग करना चाहिए।
- डॉ. बीएल शर्मा, निदेशक गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर


किसानों को जागरूक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। वे रिजेक्टेड प्रजाति का गन्ना देंगे तो मिलें दस रुपये कम भुगतान देंगी। बीमारियों की रोकथाम में भी ज्यादा खर्च होगा। - डॉ. दिनेश्वर मिश्र, उप गन्ना आयुक्त

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