Kargil Vijay Diwas: पत्तियों से भूख मिटाकर जांबाजों ने दुश्मनों को चटाई धूल, कारगिल चौक है शौर्य का प्रतीक
Kargil Vijay Diwas 2024: पाकिस्तान के खिलाफ चले ऑपरेशन विजय में बलिदान होने वाले सैकड़ों जवानों में कई बरेली के थे। जाट रेजिमेंट सेंटर के जवानों की इसमें अतुलनीय भूमिका रही।
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विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर भारतीय सेना के जांबाजों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को धूल चटाई। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन को शिकस्त देने के लिए बर्फ से ढके पहाड़ों को कदम दर कदम रौंदते हुए शिखर पर तिरंगा फहराया था। विजय दिवस के गवाह रहे रणबांकुरों ने युद्ध की संघर्ष गाथा को बेझिझक साझा किया।
सेना से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 1999 में तीन महीने तक कारगिल की पहाड़ियों पर दुश्मन देश पाकिस्तान के खिलाफ चले ऑपरेशन विजय में बलिदान होने वाले सैकड़ों जवानों में कई बरेली के थे।
जाट रेजिमेंट सेंटर के जवानों की इसमें अतुलनीय भूमिका रही। जवानों के पास खाद्य सामग्री कम थी। वह कब खत्म हो जाएं और ऊंचाई पर कुछ खाने को मिले या न मिले, इसे देखते हुए जवानों को पहाड़ पर पेड़, पौधों की पत्तियां खाने का भी प्रशिक्षण मिला था। खुद को लंबे समय तक जिंदा रहने के लिए यह प्रशिक्षण सफल रहा।
छुट्टियां हो गई थीं रद्द, अचानक आया बुलावा
वर्ष 1999, मई का आखिरी सप्ताह, जाट रेजिमेंट सेंटर में अलर्ट अलार्म बजा। छुट्टी पर गए जवान वापस बुलाए गए। 17वीं जाट रेजिमेंट के जांबाज वहां पहुंचे। द्रास सेक्टर से जिस पोस्ट पर दुश्मन कब्जा करने की फिराक में था, उसे उसके चंगुल से मुक्त कराने का मकसद लिए परेशानियों से बेपरवाह जवान प्राणों की बाजी लगाकर जवान आगे बढ़ते गए।
16,250 फुट की ऊंचाई पर बैठे दुश्मन गोलियां भी बरसा रहे थे। युद्ध में कैप्टन अनुज नैय्यर शहीद हुए थे, जिन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। साथ ही, जाट रेजिमेंट सेंटर को पराक्रम और शूरवीरता के लिए कारगिल थियेटर ऑनर और साइटेशन यूनिट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
17वीं जाट रेजिमेंट ने पिंपल कॉम्पलेक्स को कराया कब्जामुक्त
17वीं जाट रेजिमेंट का लक्ष्य पिंपल कॉम्प्लेक्स को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराना था। साथ ही, टाइगर हिल की ओर बढ़ रही बटालियन को बैकअप देना था। नौ हजार फुट की ऊंचाई पार करने के बाद हमारे जवान दुश्मन के करीब पहुंच रहे थे। छह जुलाई 1999 की रात नौ बजे सेना पहाड़ी पर पहुंच चुकी थी। दोनों तरफ से पांच घंटे तक जवाबी हमला जारी रहा। भारतीय सेना और जाट सेंटर के जांबाजों के आगे दुश्मनों ने घुटने टेक दिए।
पाकिस्तानी मशीनगन पर जमाया था कब्जा
संग्रहालय में पाकिस्तानी सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र समेत सैनिकों द्वारा कब्जा की गई पाकिस्तानी मशीनगन भी रखी हुई है। इसे वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के बाद जाट रेजिमेंट सेंटर लाया गया था। युद्ध स्मारक में पाकिस्तानी फोर्स के नार्दर्न लाइट इन्फैंट्री के जवान की ड्रेस भी रखी है। पाक फील्ड टेलीफोन भी रखा हुआ है।
... फिर बलिदान होने की आई खबर
हरिओम पाल सिंह छुट्टियां बिताने घर आए हुए थे। अचानक कंपनी कमांडर की तरफ से फरमान आते ही वह 26 जून 1999 को ड्यूटी पर रवाना हो गए। एक जुलाई को वह वीरगति को प्राप्त हुए। दो जुलाई को उनकी शहादत की खबर पहुंची, तो पूरा परिवार टूट गया। स्पेशल सर्विस मेडल उन्हें मरणोपरांत मिला। उन्होंने तीन युद्ध ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन मेघदूत और अंतिम युद्ध ऑपरेशन विजय लड़ा था।
दुश्मन के जबड़े से छीन लाए जीत
जिला सैनिक कल्याण अधिकारी रहे लेफ्टिनेंट कर्नल एलएन त्रिवेदी कारगिल युद्ध में 15 फील्ड रेजिमेंट के साथ बटालिक सेक्टर में तैनात थे। उन्होंने बताया कि दुर्गम पर्वतीय युद्ध क्षेत्र में तोपखाने के प्रयोग का यह पहला उदाहरण था, जिसमें दुश्मनों को शिकस्त मिली। कारगिल युद्ध इतिहास के उन युद्ध में से एक है जिसमें प्रत्यक्ष रूप से सारे कारक और परिस्थितियां शत्रु सेना के पक्ष में थीं, लेकिन भारत मां के सपूतों ने अदम्य साहस, रण कौशल, दृढ़ इच्छाशक्ति से विजय हासिल की।