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अगर ट्रेनिंग फिट तो ‘शक्तिहीन’ क्यों हुईं सिपाही
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Sat, 02 Jul 2016 01:29 AM IST
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परेड के बाद सेल्फी लेतीं सिपाही
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जब ट्रेनिंग में ये हाल है तो 15 से 18 घंटे की ड्यूटी में क्या होगा। पासिंग आउट परेड के दौरान कई महिला सिपाहियों का बीच में ही गश खाकर गिरना पुलिस के आला अफसरों को भी चिंता में डाल रहा है। सपा सरकार ने 40 हजार से ज्यादा सिपाहियों की भर्ती तो कर ली लेकिन इनकी ट्रेनिंग के लिए न तो नए सेंटर बनाए और न ही स्टाफ बढ़ाया। पुलिस लाइन के आरआई का तो कहना है कि रात में व्हाट्सएप और फेसबुक पर चैटिंग की वजह से कांस्टेबलों की नींद पूरी नहीं हुई और जब ट्रेनिंग में कड़ी मेहनत पड़ी तो गश खाकर गिरीं। डाक्टर इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि नींद से गश खाने का कोई मतलब नहीं। ट्रेनिंग के जरिए जो स्टेमिना उनके अंदर भरनी चाहिए थी वह शायद नहीं हो सकी है जिसकी वजह से कुछ कांस्टेबल गिर गईं।
कांस्टेबल की नई भर्ती में महिला सिपाहियों की ट्रेनिंग अवधि 12 महीने से घटाकर नौ महीने कर दी गई है। पुलिस लाइन की पासिंग आउट परेड में शामिल 390 महिला सिपाही 28 दिसंबर 2015 को ट्रेनिंग पर आई थीं। पुलिस लाइन में इनको बाह्य और आंतरिक दो तरह की ट्रेनिंग दी गई। बाह्य ट्रेनिंग में सिपाहियों को शस्त्र सहित और शस्त्र रहित फूट ड्रिल, फील्ड क्राफ्ट (जंगल में आतंकवादियों से मुठभेड़ करना) के अलावा रोजाना ढाई किलोमीटर दौड़ने की ट्रेनिंग दी गई। आंतरिक ट्रेनिंग में सामान्य ज्ञान, लॉ एंड आर्डर, रेग्यूलेशन, आईपीसी, सीआरपीसी समेत विभिन्न तरह के एक्ट का ज्ञान कराया गया। आरआई ओमपाल सिंह के मुताबिक महिला सिपाहियों की पासिंग आउट परेड सुबह छह बजे से शुरू हो गई। दो दिन पहले ही इनके अभिभावकों ने आकर डेरा डाल दिया। अधिकांश लड़कियां (महिला कांस्टेबल) रात भर अपने पैरेंट्स से बात करती रहीं। बाकी टाइम मिला, उसमें भी मोबाइल के व्हाट्सएप, फेस बुक और ट्विीटर पर चैटिंग। रात में चार घंटे भी नहीं सोईं और परेड में शामिल हो गईं। आरआई के मुताबिक ज्यादा संघर्ष और मेहनत करके आई लड़कियों में स्टेमिना भी ज्यादा होता है। वह धूप और गर्मी में तीन घंटे खड़े रहना बर्दाश्त कर लेती हैं लेकिन कम स्टेमिना वाली लड़कियां बेहोश हो जाती हैं। सवाल यही है कि अगर फील्ड ट्रेनिंग ठीक से हुई तो स्टेमिना क्यों कम रह गई और सामान्य महिलाओं की तरह कांस्टेबल भी गिरेंगी तो फिर ट्रेंड क्या हुईं।
ये थी खाने की डाइट
आरआई की मानें तो ट्रेनिंग के दौरान महिला सिपाहियों को सुबह नाश्ते में दलिया दिया जाता था। दोपहर में दाल, सब्जी रोटी, चावल और शाम को सब्जी रोटी और सलाद मिलता था। सप्ताह में एक दिन स्पेशल भोजन खीर पूड़ी, रायता, पापड़ आदि के अलावा रोजाना सीजनल फ्रूट भी दिए जाते थे।
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‘पासिंग आउट परेड में लगातार एक ही पोजीशन में खड़े रहने से दिमाग शून्य हो जाता है। फिर इतनी धूप और गर्मी पड़ रही थी। बेहोशी की वजह भी ज्यादा देर तक एक पोजीशन में खड़े होना है लेकिन ये ट्रेनिंग का एक पार्ट है।’ आकाश तोमर, एएसपी
महिला सिपाही देर से सोईं या फिर मोबाइल में रातभर चैटिंग से गश खाकर गिरने का मतलब नहीं। महिला और पुरुष के हार्मोंस में अंतर है। इसकी वजह से उनमें ब्लड प्रेशर का लो होना उमस के मौसम में सामान्य बात है। साथ ही पासिंग आउट परेड में काफी देर तक खड़ा रहना होता है ऐसे में पैरों में खून की दौड़ान कम होती है जिससे चक्कर आ जाते हैं। अगर स्टेमिना ठीक होती तो वे संभाल लेतीं जैसे दूसरी कांस्टेबल ने संभाला।
डॉ. अजय मोहन अग्रवाल, फिजीशियन, जिला अस्पताल
कुछ महिला सिपाही ट्रेनिंग में सक्षम नहीं हो पाईं, जिससे फिजिकल स्ट्रेस को झेल पाने में असमर्थ रहीं। रात में देर से सोना और सुबह जल्दी उठना इतना बड़ा कारण नहीं है। ट्रेनिंग में स्टेमिना बढ़ाने पर भी जोर होना चाहिए। हो भी सकता है कि इन्होंने नाश्ता न किया हो जिससे खाली पेट परेड करने से यह गश खाकर गिरी होंगी।
डॉ. सुदीप सरन, जनरल फिजीशियन
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कांस्टेबल की नई भर्ती में महिला सिपाहियों की ट्रेनिंग अवधि 12 महीने से घटाकर नौ महीने कर दी गई है। पुलिस लाइन की पासिंग आउट परेड में शामिल 390 महिला सिपाही 28 दिसंबर 2015 को ट्रेनिंग पर आई थीं। पुलिस लाइन में इनको बाह्य और आंतरिक दो तरह की ट्रेनिंग दी गई। बाह्य ट्रेनिंग में सिपाहियों को शस्त्र सहित और शस्त्र रहित फूट ड्रिल, फील्ड क्राफ्ट (जंगल में आतंकवादियों से मुठभेड़ करना) के अलावा रोजाना ढाई किलोमीटर दौड़ने की ट्रेनिंग दी गई। आंतरिक ट्रेनिंग में सामान्य ज्ञान, लॉ एंड आर्डर, रेग्यूलेशन, आईपीसी, सीआरपीसी समेत विभिन्न तरह के एक्ट का ज्ञान कराया गया। आरआई ओमपाल सिंह के मुताबिक महिला सिपाहियों की पासिंग आउट परेड सुबह छह बजे से शुरू हो गई। दो दिन पहले ही इनके अभिभावकों ने आकर डेरा डाल दिया। अधिकांश लड़कियां (महिला कांस्टेबल) रात भर अपने पैरेंट्स से बात करती रहीं। बाकी टाइम मिला, उसमें भी मोबाइल के व्हाट्सएप, फेस बुक और ट्विीटर पर चैटिंग। रात में चार घंटे भी नहीं सोईं और परेड में शामिल हो गईं। आरआई के मुताबिक ज्यादा संघर्ष और मेहनत करके आई लड़कियों में स्टेमिना भी ज्यादा होता है। वह धूप और गर्मी में तीन घंटे खड़े रहना बर्दाश्त कर लेती हैं लेकिन कम स्टेमिना वाली लड़कियां बेहोश हो जाती हैं। सवाल यही है कि अगर फील्ड ट्रेनिंग ठीक से हुई तो स्टेमिना क्यों कम रह गई और सामान्य महिलाओं की तरह कांस्टेबल भी गिरेंगी तो फिर ट्रेंड क्या हुईं।
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ये थी खाने की डाइट
आरआई की मानें तो ट्रेनिंग के दौरान महिला सिपाहियों को सुबह नाश्ते में दलिया दिया जाता था। दोपहर में दाल, सब्जी रोटी, चावल और शाम को सब्जी रोटी और सलाद मिलता था। सप्ताह में एक दिन स्पेशल भोजन खीर पूड़ी, रायता, पापड़ आदि के अलावा रोजाना सीजनल फ्रूट भी दिए जाते थे।
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‘पासिंग आउट परेड में लगातार एक ही पोजीशन में खड़े रहने से दिमाग शून्य हो जाता है। फिर इतनी धूप और गर्मी पड़ रही थी। बेहोशी की वजह भी ज्यादा देर तक एक पोजीशन में खड़े होना है लेकिन ये ट्रेनिंग का एक पार्ट है।’ आकाश तोमर, एएसपी
महिला सिपाही देर से सोईं या फिर मोबाइल में रातभर चैटिंग से गश खाकर गिरने का मतलब नहीं। महिला और पुरुष के हार्मोंस में अंतर है। इसकी वजह से उनमें ब्लड प्रेशर का लो होना उमस के मौसम में सामान्य बात है। साथ ही पासिंग आउट परेड में काफी देर तक खड़ा रहना होता है ऐसे में पैरों में खून की दौड़ान कम होती है जिससे चक्कर आ जाते हैं। अगर स्टेमिना ठीक होती तो वे संभाल लेतीं जैसे दूसरी कांस्टेबल ने संभाला।
डॉ. अजय मोहन अग्रवाल, फिजीशियन, जिला अस्पताल
कुछ महिला सिपाही ट्रेनिंग में सक्षम नहीं हो पाईं, जिससे फिजिकल स्ट्रेस को झेल पाने में असमर्थ रहीं। रात में देर से सोना और सुबह जल्दी उठना इतना बड़ा कारण नहीं है। ट्रेनिंग में स्टेमिना बढ़ाने पर भी जोर होना चाहिए। हो भी सकता है कि इन्होंने नाश्ता न किया हो जिससे खाली पेट परेड करने से यह गश खाकर गिरी होंगी।
डॉ. सुदीप सरन, जनरल फिजीशियन