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कहीं भूखे ही न चली जाए जान.. दिन-रात यही दुआ खत्म हो लॉकडाउन
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अपनी व्यथा सुनाता एक गरीब परिवार।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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अंदरूनी इलाकों में रहने वालों तक नहीं पहुंच रहे समाजसेवी, राशन कार्ड न होने की वजह से नहीं मिल पा रहा सरकारी राशन भी
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पड़ोसियों के रहमोकरम पर निर्भर रह गई तमाम गरीब परिवारों की जिंदगी
बरेली। लॉकडाउन में तमाम फरियादें अनसुनी ही रह जा रही हैं। अंदरूनी इलाकों में रहने वाली हजारों लोगों की आबादी के लिए भूख जिंदगी और मौत का सवाल बन गई है। राशनकार्ड न होने की वजह से न सरकारी राशन उन्हें मिल पा रहा है न संकरी गलियों में उनके दरवाजों तक न समाजसेवियों की मदद पहुंच रही है। तमाम ऐसे परिवारों की जिंदगी पड़ोसियों के रहमोकरम पर निर्भर रह गई है तो कई को एक टाइम की रोटी भी मुश्किल से मिल पा रही है।
कोरोना संक्रमण रोकने के लिए 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और फिर अगले दिन 21 दिनों का पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा होते ही इन परिवारों की जिंदगी तमाम दायरों में कैद हो गई। रोज मेहनत कर परिवारों के लिए रोटी का बंदोबस्त करने वाले दिहाड़ी मजदूरों और ठेले-फड़ लगाने वालों के लिए दोनों टाइम के खाने का इंतजाम करना मुश्किल हो गया। शासन ने गरीब परिवारों को एक-एक हजार रुपये और मुफ्त राशन देने की घोषणा की रजिस्ट्रेशन या राशन कार्ड न होने की वजह से सैकड़ों परिवारों को इन दोनों घोषणाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। घनी आबादी वाले अंदरूनी इलाकों में रहने वाले इन परिवारों तक समाजसेवियों की मदद भी नहीं पहुंच पा रही है।
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बदायूं रोड पर गंगानगर कॉलोनी में रहने वाले भगवान दास ने बताया कि वह ठेला लगाते हैं लेकिन लॉकडाउन में काम बंद हो गया। अब पांच बच्चों और पत्नी के साथ सात लोगों के परिवार को पालने के लिए राशन का इंतजाम करना मुश्किल हो गया है। कुछ दिन तो जमा पूंजी से काम चल गया लेकिन अब आसपड़ोस के लोगों से राशन मांगना पड़ रहा है। घर भी गली में इतना अंदर है कि वहां कोई समाजसेवी भी नहीं पहुंचता। भगवान दास के पड़ोस में रहने वाली आशा ने बताया कि उनके पति राकेश मजदूरी करते हैं। उन्हें अब काम नहीं मिल रहा। इतने दिनों में जमापूंजी भी खत्म हो गई है। कुछ रहमदिल पड़ोसियों की मदद से ही जिंदगी चल रही है।
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दीपक बदायूं रोड पर पंक्चर बनाने दुकान चलाते हैं, इस साल इंटरमीडिएट की परीक्षा भी दी है। पिता की मौत हो चुकी है। दीपक की मेहनत-मशक्कत से ही उनकी मां समेत पांच लोगों के परिवार चलता था लेकिन अब दो वक्त के खाने का बंदोबस्त करना भी मुश्किल पड़ रहा है। मिनी बाईपास पर मठलक्ष्मीपुर में भी ऐसे कई परिवार हैं जिन तक न सरकारी मदद पहुंच रही है न समाजसेवियों की। भूपराम और वीरपाल दिव्यांग हैं। लॉकडाउन में छोटा मोटा काम भी नहीं कर पा रहे। कई परिवारों का कहना है कि उन्होंने कुछ लोगों से मदद भी मांगी लेकिन कोई मदद करने नहीं पहुंचा।
राशन की कालाबाजारी की तो खैर नहीं
बरेली। आंवला सांसद धर्मेंन्द्र कश्यप ने राशन कोटेदारों को इस संकट में राशन की कालाबाजारी न करने की चेतावनी दी है। उन्होंने बताया कि समर्थकों से उन्हें शिकायतें मिल रही हैं कि कुछ कोटेदार राशन बांटने में गड़बड़ियां कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राशन वितरण में गड़बड़ी किए जाने पर कोई भी उन्हें या उनके मीडिया प्रभारी राहुल कश्यप को फोन पर सूचना दे सकता है, वे कोटेदार के खिलाफ तुरंत कार्रवाई कराएंगे।
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पड़ोसियों के रहमोकरम पर निर्भर रह गई तमाम गरीब परिवारों की जिंदगी बरेली। लॉकडाउन में तमाम फरियादें अनसुनी ही रह जा रही हैं। अंदरूनी इलाकों में रहने वाली हजारों लोगों की आबादी के लिए भूख जिंदगी और मौत का सवाल बन गई है। राशनकार्ड न होने की वजह से न सरकारी राशन उन्हें मिल पा रहा है न संकरी गलियों में उनके दरवाजों तक न समाजसेवियों की मदद पहुंच रही है। तमाम ऐसे परिवारों की जिंदगी पड़ोसियों के रहमोकरम पर निर्भर रह गई है तो कई को एक टाइम की रोटी भी मुश्किल से मिल पा रही है।
कोरोना संक्रमण रोकने के लिए 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और फिर अगले दिन 21 दिनों का पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा होते ही इन परिवारों की जिंदगी तमाम दायरों में कैद हो गई। रोज मेहनत कर परिवारों के लिए रोटी का बंदोबस्त करने वाले दिहाड़ी मजदूरों और ठेले-फड़ लगाने वालों के लिए दोनों टाइम के खाने का इंतजाम करना मुश्किल हो गया। शासन ने गरीब परिवारों को एक-एक हजार रुपये और मुफ्त राशन देने की घोषणा की रजिस्ट्रेशन या राशन कार्ड न होने की वजह से सैकड़ों परिवारों को इन दोनों घोषणाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। घनी आबादी वाले अंदरूनी इलाकों में रहने वाले इन परिवारों तक समाजसेवियों की मदद भी नहीं पहुंच पा रही है।
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बदायूं रोड पर गंगानगर कॉलोनी में रहने वाले भगवान दास ने बताया कि वह ठेला लगाते हैं लेकिन लॉकडाउन में काम बंद हो गया। अब पांच बच्चों और पत्नी के साथ सात लोगों के परिवार को पालने के लिए राशन का इंतजाम करना मुश्किल हो गया है। कुछ दिन तो जमा पूंजी से काम चल गया लेकिन अब आसपड़ोस के लोगों से राशन मांगना पड़ रहा है। घर भी गली में इतना अंदर है कि वहां कोई समाजसेवी भी नहीं पहुंचता। भगवान दास के पड़ोस में रहने वाली आशा ने बताया कि उनके पति राकेश मजदूरी करते हैं। उन्हें अब काम नहीं मिल रहा। इतने दिनों में जमापूंजी भी खत्म हो गई है। कुछ रहमदिल पड़ोसियों की मदद से ही जिंदगी चल रही है।
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दीपक बदायूं रोड पर पंक्चर बनाने दुकान चलाते हैं, इस साल इंटरमीडिएट की परीक्षा भी दी है। पिता की मौत हो चुकी है। दीपक की मेहनत-मशक्कत से ही उनकी मां समेत पांच लोगों के परिवार चलता था लेकिन अब दो वक्त के खाने का बंदोबस्त करना भी मुश्किल पड़ रहा है। मिनी बाईपास पर मठलक्ष्मीपुर में भी ऐसे कई परिवार हैं जिन तक न सरकारी मदद पहुंच रही है न समाजसेवियों की। भूपराम और वीरपाल दिव्यांग हैं। लॉकडाउन में छोटा मोटा काम भी नहीं कर पा रहे। कई परिवारों का कहना है कि उन्होंने कुछ लोगों से मदद भी मांगी लेकिन कोई मदद करने नहीं पहुंचा।