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भारतीय महिलाएं हर कहीं तो रामलीला में क्यों नहीं..
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बरेली। पैमिला लट्स्पाईक ने अमेरिका से भारत आकर भगवान राम को जितना जाना, शायद आम हिंदुस्तानी भी उतना नहीं जानते होंगे। करीब 23 सालों से राधेश्याम रामायण पर शोध करते हुए पैमिला मर्यादा पुरुषोत्तम के जीवन चरित्र के हर पहलू का अध्ययन कर चुकी हैं। शोध लगभग पूरा हो चुका है लेकिन सुभाषनगर की रामलीला से लगाव उन्हें इस बार फिर अमेरिका से भारत खींच लाया मगर इस बार वह कुछ नए सवालों के साथ भारत पहुंचीं। प्रमुख सवाल यह था कि कितने ही युग बदल जाने के बाद भी ‘सीता परित्याग’ भारत की रामलीलाओं में महिलाओं की भागेदारी के निषेध के तौर पर अब तक जीवंत क्यों है।
दो दिन बरेली में रहकर सुभाषनगर की रामलीला देखने के बाद अमेरिका लौटने से पहले पैमिला लट्स्पाईक ने अमर उजाला को बातचीत का निमंत्रण दिया। जंक्शन के पास रेलवे के होटल में बातचीत के दौरान पैमिला ने बताया कि उन्होंने रामलीलाओं पर राजनीतिक प्रभाव, कलाकारों की आर्थिक स्थिति, वर्ग भेद, तकनीक और महिलाओं की हिस्सेदारी जैसे विभिन्न पहलुओं पर शोध किया है। वर्ग भेद और महिलाओं की हिस्सेदारी पर अब भी काम कर रही हैं। उनके लिए यह अहम सवाल है कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ अब हर क्षेत्र में महिलाओं को मौका मिल रहा है लेकिन रामलीला में अब भी उनकी कोई भूमिका नहीं है। पैमिला ने कहा कि हो सकता है कि ऐसा महिलाओं के खुद दिलचस्पी न लेने की वजह से हो लेकिन वह इसे तथ्यात्मक तौर पर जानना चाहती हैं। इसी तरह वर्ग भेद भी रामलीला की एक सच्चाई है। 23 साल तक शोध के दौरान उन्होंने महसूस किया कि हर जातीय समाज की अलग रामलीला है और उसमें दूसरे वर्गों की सहभागिता नहीं रहती। वह इस पर शोध करना चाहती हैं।
भारत अच्छा, भारत के लोग भी अच्छे
पैमिला 1993 में बनारस विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य की पढ़ाई करने आईं और चार साल बाद बनारस में ही उन्होंने अपने अमेरिकन सहपाठी डियालन सुगियामा से शादी कर ली थी। उन्होंने 1996 में राधेश्याम रामायण पर शोध शुरू किया और अब अमेरिका में हिंदी साहित्य और वाल्मीकि रामायण पढ़ा रही हैं। रामायण और उनके पात्रों को नजदीक से समझने के लिए सुभाषनगर रामलीला में वह केवट की पत्नी की भूमिका निभा चुकी हैं। अमर उजाला से बातचीत में पैमिला ने कहा कि उन्हें भारत और भारत के लोग अच्छे लगते हैं। अमेरिका लौटने से पहले उन्होंने भारतीय व्यंजनों का भी लुत्फ लिया।
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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित हुई एपिक नेशन
राधेश्याम रामायण पर शोध के साथ रामलीला के विभिन्न पहलुओं पर पैमिला लट्स्पाईक के कई लेख अमेरिका के कई जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं। एपिक नेशन नाम से उनकी एक पुस्तक भी 2010 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित हुई है। पैमिला का शोध अब भी जारी है और जल्द ही उनकी एक और पुस्तक अमेरिका में प्रकाशित होनी है।
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दो दिन बरेली में रहकर सुभाषनगर की रामलीला देखने के बाद अमेरिका लौटने से पहले पैमिला लट्स्पाईक ने अमर उजाला को बातचीत का निमंत्रण दिया। जंक्शन के पास रेलवे के होटल में बातचीत के दौरान पैमिला ने बताया कि उन्होंने रामलीलाओं पर राजनीतिक प्रभाव, कलाकारों की आर्थिक स्थिति, वर्ग भेद, तकनीक और महिलाओं की हिस्सेदारी जैसे विभिन्न पहलुओं पर शोध किया है। वर्ग भेद और महिलाओं की हिस्सेदारी पर अब भी काम कर रही हैं। उनके लिए यह अहम सवाल है कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ अब हर क्षेत्र में महिलाओं को मौका मिल रहा है लेकिन रामलीला में अब भी उनकी कोई भूमिका नहीं है। पैमिला ने कहा कि हो सकता है कि ऐसा महिलाओं के खुद दिलचस्पी न लेने की वजह से हो लेकिन वह इसे तथ्यात्मक तौर पर जानना चाहती हैं। इसी तरह वर्ग भेद भी रामलीला की एक सच्चाई है। 23 साल तक शोध के दौरान उन्होंने महसूस किया कि हर जातीय समाज की अलग रामलीला है और उसमें दूसरे वर्गों की सहभागिता नहीं रहती। वह इस पर शोध करना चाहती हैं।
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भारत अच्छा, भारत के लोग भी अच्छे
पैमिला 1993 में बनारस विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य की पढ़ाई करने आईं और चार साल बाद बनारस में ही उन्होंने अपने अमेरिकन सहपाठी डियालन सुगियामा से शादी कर ली थी। उन्होंने 1996 में राधेश्याम रामायण पर शोध शुरू किया और अब अमेरिका में हिंदी साहित्य और वाल्मीकि रामायण पढ़ा रही हैं। रामायण और उनके पात्रों को नजदीक से समझने के लिए सुभाषनगर रामलीला में वह केवट की पत्नी की भूमिका निभा चुकी हैं। अमर उजाला से बातचीत में पैमिला ने कहा कि उन्हें भारत और भारत के लोग अच्छे लगते हैं। अमेरिका लौटने से पहले उन्होंने भारतीय व्यंजनों का भी लुत्फ लिया।
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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित हुई एपिक नेशन
राधेश्याम रामायण पर शोध के साथ रामलीला के विभिन्न पहलुओं पर पैमिला लट्स्पाईक के कई लेख अमेरिका के कई जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं। एपिक नेशन नाम से उनकी एक पुस्तक भी 2010 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित हुई है। पैमिला का शोध अब भी जारी है और जल्द ही उनकी एक और पुस्तक अमेरिका में प्रकाशित होनी है।