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जंगल बन गए पालतू पशुओं के चरागह
Updated Mon, 12 Jun 2017 06:16 PM IST
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बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। एक तरफ जंगल में अतिक्रमण, दूसरी तरफ जंगल में घुसपैठ से बाघों और अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास विकृत हो रहा है। वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन में बढ़ते दखल से इनके स्वभाव में भी बदलाव आ रहा है। गर्मियों के मौसम में मैदान में जब घास सूख जाती है, तो चरवाहे हजारों की संख्या में मवेशियों को लेकर जंगल में डेरा डाल देते हैं। स्थानीय भाषा में इसे डेरे को गौढ़ी कहते हैं। दक्षिण खीरी वन प्रभाग के भीरा रेंज में इस समय आधा दर्जन से अधिक गौढ़ियां लगी हुई है।
भीरा रेंज जंगल से सटे करीब पांच किलोमीटर अंदर जाकर चरवाहे ऐसे स्थान का चयन करते हैं, जहां मवेशियों के लिए छाया के साथ-साथ घास के मैदान भी फैले होते हैं। चरवाहे बाकायदा मचान बनाकर तीन-चार महीने तक जंगल में ही रहकर अपने जानवरों की रखवाली करते हैं, और वहीं से बाकायदा डेरी का संचालन भी करते हैं। जंगल में ही खाना बनाना, दूध निकालने और गर्म करने, क्रीम निकालने और घी बनाने का काम भी होता है। जबकि जंगल के अंदर मवेशियों का चराना और आग जलाना पूरी तरह वर्जित है। इसके बावजूद वन कर्मचारियों की सांठगांठ से यह सब कुछ चल रहा है।
जंगल के अंदर अवांछित गतिविधियों की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी है, लेकिन यह छोटे कर्मचारियों के दबाव में इसे अनदेखा कर जाते हैं। नतीजतन जंगली जानवरों को यह जगह छोड़कर दूसरी जगह या जंगल से बाहर जाना पड़ता है। जंगलों में बढ़ती इंसानी दखलंदाजी के चलते बाघ और अन्य हिंसक वन्यजीव अपनी जान पर खतरा समझकर जंगल से सटे बाहरी किनारों पर किसानों की गन्ने फसल में अपना डेरा जमा कर बैठ जाते हैं। जहां फसलों की रखवाली करने जाने वाले किसानों पर बाघ हमला कर उन्हें अपना निवाला बना रहे हैं।
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वनकर्मियों को होता है यह फायदा
जंगल के अंदर गौढ़ी स्थापित करने वाले चरवाहों से वनकर्मी बंधी रकम तो लेते ही है, साथ ही इन मवेशियों के गोबर को किसानों के हाथ बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इसके अलावा दूध, दही, खोया, घी यह छोटे कर्मचारियों से लेकर बड़े अफसरों तक पहुंचता है।
वर्जन- भीरा रेंज जंगल के अंदर पशुओं की गौढ़ी लगने की जानकारी नहीं है। मामला संज्ञान में आया है। जंगल के अंदर अभियान चलाकर गौढ़ियों की पहचान के बाद दोषी वन कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी।
राकेश बाबू वर्मा, क्षेत्रीय वनाधिकारी, भीरा रेंज, दक्षिण खीरी वन प्रभाग।
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भीरा रेंज जंगल से सटे करीब पांच किलोमीटर अंदर जाकर चरवाहे ऐसे स्थान का चयन करते हैं, जहां मवेशियों के लिए छाया के साथ-साथ घास के मैदान भी फैले होते हैं। चरवाहे बाकायदा मचान बनाकर तीन-चार महीने तक जंगल में ही रहकर अपने जानवरों की रखवाली करते हैं, और वहीं से बाकायदा डेरी का संचालन भी करते हैं। जंगल में ही खाना बनाना, दूध निकालने और गर्म करने, क्रीम निकालने और घी बनाने का काम भी होता है। जबकि जंगल के अंदर मवेशियों का चराना और आग जलाना पूरी तरह वर्जित है। इसके बावजूद वन कर्मचारियों की सांठगांठ से यह सब कुछ चल रहा है।
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जंगल के अंदर अवांछित गतिविधियों की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी है, लेकिन यह छोटे कर्मचारियों के दबाव में इसे अनदेखा कर जाते हैं। नतीजतन जंगली जानवरों को यह जगह छोड़कर दूसरी जगह या जंगल से बाहर जाना पड़ता है। जंगलों में बढ़ती इंसानी दखलंदाजी के चलते बाघ और अन्य हिंसक वन्यजीव अपनी जान पर खतरा समझकर जंगल से सटे बाहरी किनारों पर किसानों की गन्ने फसल में अपना डेरा जमा कर बैठ जाते हैं। जहां फसलों की रखवाली करने जाने वाले किसानों पर बाघ हमला कर उन्हें अपना निवाला बना रहे हैं।
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वनकर्मियों को होता है यह फायदा
जंगल के अंदर गौढ़ी स्थापित करने वाले चरवाहों से वनकर्मी बंधी रकम तो लेते ही है, साथ ही इन मवेशियों के गोबर को किसानों के हाथ बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इसके अलावा दूध, दही, खोया, घी यह छोटे कर्मचारियों से लेकर बड़े अफसरों तक पहुंचता है।
वर्जन- भीरा रेंज जंगल के अंदर पशुओं की गौढ़ी लगने की जानकारी नहीं है। मामला संज्ञान में आया है। जंगल के अंदर अभियान चलाकर गौढ़ियों की पहचान के बाद दोषी वन कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी।
राकेश बाबू वर्मा, क्षेत्रीय वनाधिकारी, भीरा रेंज, दक्षिण खीरी वन प्रभाग।