{"_id":"5d6447a28ebc3e0142325675","slug":"crime-bareilly-news-bly3737001195","type":"story","status":"publish","title_hn":"जब खनन की लागे लगन तो इंस्पेक्टर का धाराएं समझने में कैसे लगे मन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जब खनन की लागे लगन तो इंस्पेक्टर का धाराएं समझने में कैसे लगे मन
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरेली। एडीजे शकील अहमद खां की अदालत में सोमवार को कुछ अजब तरह का मामला पेश हुआ। हैरान जज साहब मुल्जिम के वकील पर यह कहते हुए बिगड़ रहे थे कि आखिर उसने ऐसा क्या अपराध किया है जिसमें उसे अग्रिम जमानत चाहिए। गफलत के शिकार वकील सिर्फ यही कह पा रहे मुल्जिम को जमानत न मिली तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल देगी। जज साहब की हैरानी की वजह यह थी कि मुल्जिम के खिलाफ थाने की पुलिस ने सीआरपीसी की उन धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली गई थी जिसमें सजा का कोई प्रावधान ही नहीं है। लंबी मगजपच्ची के बाद अंतत: निष्कर्ष यह निकला कि पुलिस को कानून की जानकारी न होने की वजह से यह घपला हुआ है। अदालत ने इसके बाद बहेड़ी इंस्पेक्टर को तलब कर लिया है।
बहेड़ी में रहने वाले मोहम्मद निजाम की ओर से सीआरपीसी की धारा 41 और 102 में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की गई थी। निजाम के खिलाफ इन धाराओं में बहेड़ी पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। अदालत में जब एडीजे शकील अहमद खां के समक्ष जमानत अर्जी पर सुनवाई शुरू हुई तो वह ताज्जुब में पड़ गए। दरअसल कानूनी तौर पर एफआईआर सिर्फ उन्हीं धाराओं में दर्ज की जा सकती है जिनमें सजा का प्रावधान हो जबकि पुलिस ने निजाम के खिलाफ जो धाराएं लगाई थीं, उनमें सजा का कोई प्रावधान ही नहीं है। पहले तो लगा कि लिखापढ़ी में कोई चूक हुई है, लेकिन वकील से सवाल-जवाब के बाद अदालत ने माना कि पुलिस को सीआरपीसी के प्रावधानों की जानकारी ही नहीं है।
अदालत ने इसके बाद अपने आदेश में कहा कि प्रथमदृष्टया साफ है कि एफआईआर गलत लिखी गई है। इससे यह भी साफ है कि बहेड़ी थानाध्यक्ष को कानून की कोई जानकारी नहीं है। अदालत ने थानाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश देते हुए कहा कि वह आकर बताएं कि किन परिस्थितियों में ऐसी धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई जिसमें सजा का प्रावधान ही नहीं है। अदालत ने कहा है कि थानाध्यक्ष के हाजिर न होने या संतोषजनक उत्तर न देने पर माना जाएगा कि उन्हें कुछ नहीं कहना है और ऐसी स्थिति में उनके खिलाफ पुलिस अधिनियम और आईपीसी की सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 28 अगस्त की तारीख तय की है। बता दें कि बहेड़ी पुलिस पर अवैध खनन के आरोप लगते रहे हैं। पहले इंस्पेक्टर धनंजय सिंह और फिर राजेश कुमार के खनन के मामले में लाइन हाजिर होने के बाद पुलिस पहले ही बदनामी झेल रही थी, अब नई मुसीबत उसके गले पड़ गई है।
विज्ञापन
बहेड़ी इंस्पेक्टर के संदर्भ में कोर्ट ने जिस मामले में टिप्पणी की है, उसे मामले में दिखवाया जाएगा कि किस स्तर पर चूक हुई है। इसके बाद गलती करने वाले के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का भी फैसला लिया जाएगा। - शैलेश कुमार पांडेय, एसएसपी
यह है सीआरपीसी की धारा 41 और 102
सीआरपीसी की धारा 41 पुलिस अधिकारी को किसी व्यक्ति की मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट के बगैर गिरफ्तारी करने का अधिकार देती है। इसी तरह धारा 102 में पुलिस अधिकारी को संदेह के आधार पर किसी अचल संपत्ति को जब्त करने का अधिकार दिया गया है। यानी ये धाराएं पुलिस को सिर्फ शक्तियां प्रदान करती हैं। उनके तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।
एडीजी को लिखा- पुलिस को ट्रेनिंग दिलवाएं
अदालत ने अपने आदेश की प्रति एडीजी बरेली जोन को भी भेजी है जिसमें उन्हें इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पुलिस के कर्मचारियों को ट्रेनिंग दिलाने के लिए कहा गया है। एडीजी को लिखे पत्र में अदालत ने इस मामले में बहेड़ी के थानाध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने और इस संबंध में अदालत को भी अवगत कराने को कहा है।
पुलिस तो पुलिस वकील साहब भी..
एडीजे शकील अहमद खां ने जमानत अर्जी दाखिल करने वाले वकील पर नाराजगी जताई। पूछा कि इस मामले में जमानत अर्जी क्यों दाखिल की गई है तो वह कोई जवाब नहीं दे पाए। अदालत में इस मामले में सुनवाई के बाद वकीलों के बीच यह सवाल भी चर्चा में आया कि धाराओं की जानकारी तो जमानत अर्जी दाखिल करने वाले वकील को भी होनी चाहिए थी। उन्हें अर्जी इस बात की देनी चाहिए थी कि पुलिस ने यह एफआईआर गलत धाराओं में दर्ज की है। अभियोजन की ओर से इस मामले में एडीजीसी भगवान दास मौजूद थे।
विज्ञापन
बहेड़ी में रहने वाले मोहम्मद निजाम की ओर से सीआरपीसी की धारा 41 और 102 में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की गई थी। निजाम के खिलाफ इन धाराओं में बहेड़ी पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। अदालत में जब एडीजे शकील अहमद खां के समक्ष जमानत अर्जी पर सुनवाई शुरू हुई तो वह ताज्जुब में पड़ गए। दरअसल कानूनी तौर पर एफआईआर सिर्फ उन्हीं धाराओं में दर्ज की जा सकती है जिनमें सजा का प्रावधान हो जबकि पुलिस ने निजाम के खिलाफ जो धाराएं लगाई थीं, उनमें सजा का कोई प्रावधान ही नहीं है। पहले तो लगा कि लिखापढ़ी में कोई चूक हुई है, लेकिन वकील से सवाल-जवाब के बाद अदालत ने माना कि पुलिस को सीआरपीसी के प्रावधानों की जानकारी ही नहीं है।
विज्ञापन
अदालत ने इसके बाद अपने आदेश में कहा कि प्रथमदृष्टया साफ है कि एफआईआर गलत लिखी गई है। इससे यह भी साफ है कि बहेड़ी थानाध्यक्ष को कानून की कोई जानकारी नहीं है। अदालत ने थानाध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश देते हुए कहा कि वह आकर बताएं कि किन परिस्थितियों में ऐसी धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई जिसमें सजा का प्रावधान ही नहीं है। अदालत ने कहा है कि थानाध्यक्ष के हाजिर न होने या संतोषजनक उत्तर न देने पर माना जाएगा कि उन्हें कुछ नहीं कहना है और ऐसी स्थिति में उनके खिलाफ पुलिस अधिनियम और आईपीसी की सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कराने की कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 28 अगस्त की तारीख तय की है। बता दें कि बहेड़ी पुलिस पर अवैध खनन के आरोप लगते रहे हैं। पहले इंस्पेक्टर धनंजय सिंह और फिर राजेश कुमार के खनन के मामले में लाइन हाजिर होने के बाद पुलिस पहले ही बदनामी झेल रही थी, अब नई मुसीबत उसके गले पड़ गई है।
विज्ञापन
बहेड़ी इंस्पेक्टर के संदर्भ में कोर्ट ने जिस मामले में टिप्पणी की है, उसे मामले में दिखवाया जाएगा कि किस स्तर पर चूक हुई है। इसके बाद गलती करने वाले के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का भी फैसला लिया जाएगा। - शैलेश कुमार पांडेय, एसएसपी
यह है सीआरपीसी की धारा 41 और 102
सीआरपीसी की धारा 41 पुलिस अधिकारी को किसी व्यक्ति की मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट के बगैर गिरफ्तारी करने का अधिकार देती है। इसी तरह धारा 102 में पुलिस अधिकारी को संदेह के आधार पर किसी अचल संपत्ति को जब्त करने का अधिकार दिया गया है। यानी ये धाराएं पुलिस को सिर्फ शक्तियां प्रदान करती हैं। उनके तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।
एडीजी को लिखा- पुलिस को ट्रेनिंग दिलवाएं
अदालत ने अपने आदेश की प्रति एडीजी बरेली जोन को भी भेजी है जिसमें उन्हें इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पुलिस के कर्मचारियों को ट्रेनिंग दिलाने के लिए कहा गया है। एडीजी को लिखे पत्र में अदालत ने इस मामले में बहेड़ी के थानाध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने और इस संबंध में अदालत को भी अवगत कराने को कहा है।
पुलिस तो पुलिस वकील साहब भी..
एडीजे शकील अहमद खां ने जमानत अर्जी दाखिल करने वाले वकील पर नाराजगी जताई। पूछा कि इस मामले में जमानत अर्जी क्यों दाखिल की गई है तो वह कोई जवाब नहीं दे पाए। अदालत में इस मामले में सुनवाई के बाद वकीलों के बीच यह सवाल भी चर्चा में आया कि धाराओं की जानकारी तो जमानत अर्जी दाखिल करने वाले वकील को भी होनी चाहिए थी। उन्हें अर्जी इस बात की देनी चाहिए थी कि पुलिस ने यह एफआईआर गलत धाराओं में दर्ज की है। अभियोजन की ओर से इस मामले में एडीजीसी भगवान दास मौजूद थे।