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सालों की कोशिशों के बाद आखिर हत्थे चढ़ ही गया खतरनाक माओवादी
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बरेली। प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के उत्तराखंड जोनल कमेट सचिव खीम सिंह बोरा की गिरफ्तारी को एटीएस की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। एसटीएफ के मुताबिक खीम सिंह इतना शातिर है कि न तो वह मोबाइल फोन रखता है न कहीं भी एक-दो दिन से ज्यादा ठहरता है। पुलिस इसी वजह से दो सालों तक तमाम कोशिशों के बावजूद उसके बारे में कोई सुराग नहीं हासिल कर सकी थी। हाल ही में लखनऊ एटीएस ने नक्सली गतिविधियों से जुड़े मनीष श्रीवास्तव को पकड़ा था। मनीष से मिले इनपुट ने ही खीम सिंह को एटीएस के चक्रव्यूह में फंसा दिया।
खीम सिंह ने 2005 में ही अपना परिवार छोड़ दिया था और पूरी तरह माओवादी गतिविधियों में सक्रिय हो गया था। पुलिस और खुफिया एजेंसियों के पास उसके साल दो साल में अपने परिवार से मिलने आने का इनपुट था। इसी आधार पर अक्सर उसके परिवार के ठिकानों पर दबिश दी जाती थीं, लेकिन वह कभी हाथ नहीं आया। बस-टेंपो में सफर करने वाला खीम सिंह किसी को अपना परिचय भी नहीं देता था। उसकी तमाम एहतियात के बावजूद कुछ समय पहले पकड़े गए नक्सली मनीष श्रीवास्तव ने एटीएस को यह इनपुट दिया कि वह अपने संगठन के धनबाद में होने जा रहे सम्मेलन में भाग लेने जरूर जाएगा। इसी इनपुट के आधार पर एटीएस ने खीम सिंह को पकड़ने के लिए जाल बिछाया था और उम्मीद के मुताबिक खीम सिंह इस जाल में फंस भी गया।
उत्तराखंड सरकार ने घोषित किया था 50 हजार का इनाम
55 वर्षीय खीम सिंह पर उत्तराखंड में अपने संगठन के विस्तार की जिम्मेदारी थी, कई सालों से वह इसी कवायद में लगा हुआ था। उसकी गतिविधियां जानकारी में आने के बाद उत्तराखंड सरकार ने उस पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया था। हालांकि खीम सिंह अपने मिशन में ज्यादा कामयाब नहीं हो पाया। बुधवार को उसकी गिरफ्तारी के बाद उसके मिशन पर भी फिलहाल फुल स्टॉप लग गया।
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एटीएस के सूत्रों के मुताबिक खीम सिंह छात्र जीवन से ही माओवादी गतिविधियों में सक्रिय हो गया था। फरवरी 2016 में उसका नाम तब सुर्खियों में आया जब उसने एसडीएम नैनीताल की सरकारी गाड़ी को फूंकने की कोशिश की थी। इसके बाद खीम सिंह ने सोमेश्वर की विधायक के घर के बाहर पटाखे छोड़कर भी दहशत फैलाई। इससे पहले 2012 और 2016 में उत्तराखंड विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का एलान करते हुए उसने तमाम स्थानों पर पैंफलेट चिपकाए थे। खीम सिंह के खिलाफ रुद्रपुर, नैनीताल, अल्मोड़ा के थानों में कई केस दर्ज हैं।
संगठन कमजोर हुआ तो उत्तराखंड से भागा
खीम सिंह उत्तराखंड में संगठन का सर्वोच्च पद संभाल रहा था। उसने उत्तराखंड में माओवादियों की भर्ती के लिए कई अभियान चलाए पर हाल फिलहाल वहां पर संगठन काफी कमजोर हो गया था। इसके बाद खीम सिंह उत्तराखंड से भागकर झारखंड के सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। वह संगठन की केंद्रीय कार्यसमिति में शामिल होने में प्रयासरत था।
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खीम सिंह ने 2005 में ही अपना परिवार छोड़ दिया था और पूरी तरह माओवादी गतिविधियों में सक्रिय हो गया था। पुलिस और खुफिया एजेंसियों के पास उसके साल दो साल में अपने परिवार से मिलने आने का इनपुट था। इसी आधार पर अक्सर उसके परिवार के ठिकानों पर दबिश दी जाती थीं, लेकिन वह कभी हाथ नहीं आया। बस-टेंपो में सफर करने वाला खीम सिंह किसी को अपना परिचय भी नहीं देता था। उसकी तमाम एहतियात के बावजूद कुछ समय पहले पकड़े गए नक्सली मनीष श्रीवास्तव ने एटीएस को यह इनपुट दिया कि वह अपने संगठन के धनबाद में होने जा रहे सम्मेलन में भाग लेने जरूर जाएगा। इसी इनपुट के आधार पर एटीएस ने खीम सिंह को पकड़ने के लिए जाल बिछाया था और उम्मीद के मुताबिक खीम सिंह इस जाल में फंस भी गया।
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उत्तराखंड सरकार ने घोषित किया था 50 हजार का इनाम
55 वर्षीय खीम सिंह पर उत्तराखंड में अपने संगठन के विस्तार की जिम्मेदारी थी, कई सालों से वह इसी कवायद में लगा हुआ था। उसकी गतिविधियां जानकारी में आने के बाद उत्तराखंड सरकार ने उस पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया था। हालांकि खीम सिंह अपने मिशन में ज्यादा कामयाब नहीं हो पाया। बुधवार को उसकी गिरफ्तारी के बाद उसके मिशन पर भी फिलहाल फुल स्टॉप लग गया।
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एटीएस के सूत्रों के मुताबिक खीम सिंह छात्र जीवन से ही माओवादी गतिविधियों में सक्रिय हो गया था। फरवरी 2016 में उसका नाम तब सुर्खियों में आया जब उसने एसडीएम नैनीताल की सरकारी गाड़ी को फूंकने की कोशिश की थी। इसके बाद खीम सिंह ने सोमेश्वर की विधायक के घर के बाहर पटाखे छोड़कर भी दहशत फैलाई। इससे पहले 2012 और 2016 में उत्तराखंड विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का एलान करते हुए उसने तमाम स्थानों पर पैंफलेट चिपकाए थे। खीम सिंह के खिलाफ रुद्रपुर, नैनीताल, अल्मोड़ा के थानों में कई केस दर्ज हैं।
संगठन कमजोर हुआ तो उत्तराखंड से भागा
खीम सिंह उत्तराखंड में संगठन का सर्वोच्च पद संभाल रहा था। उसने उत्तराखंड में माओवादियों की भर्ती के लिए कई अभियान चलाए पर हाल फिलहाल वहां पर संगठन काफी कमजोर हो गया था। इसके बाद खीम सिंह उत्तराखंड से भागकर झारखंड के सम्मेलन में भाग लेने जा रहा था। वह संगठन की केंद्रीय कार्यसमिति में शामिल होने में प्रयासरत था।