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सूतक लगने के साथ बंद हुए मंदिरों के कपाट, घरों के दरवाजे पर जलाए गए घी के चिराग

Mon, 22 Jun 2020 02:02 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jun 2020 02:02 AM IST
सार

आसमान का नजारा बदला और मौसम भी। सूरज के प्रचंड ताप को चंद्रमा की शीतल छाया ने धरती तक आने से रोका तो तापमान एकाएक कई डिग्री नीचे आ गिरा। धरती पर गिरने वाले सूर्य के चमकदार प्रकाश पर काली छाया में तब्दील होते देखना नई पीढ़ी के लिए यह रोमांचित करने वाला तजुर्बा था जिसने उनकी उत्सुकता को इतना बढ़ाया कि विज्ञानियों और ज्योतिषाचार्यों की मनाही के बावजूद वे खुद को सूर्य ग्रहण देखने से नहीं रोक पाए। तमाम लोगों ने यह उत्सुकता सुरक्षा के जरूरी साधनों के जरिये सूर्य ग्रहण देखकर पूरी की तो तमाम लोगों ने इसके बगैर ही इस दुर्लभ खगोलीय घटना का नजारा किया।
 

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Closets of temples closed with sutak, lamps of ghee burned on the doors of houses
बरेली में सूर्य ग्रहण देखते लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

विस्तार

बरेली। शनिवार रात सूतक लगने से पहले ही मंदिरों के कपाट बंद कर दिए गए। रविवार को दोपहर बाद ग्रहण के मोक्ष के बाद शाम को मंदिरों में साफ-सफाई की गई और उसके बाद कपाट खोले गए। ग्रहण के दौरान देव प्रतिमाएं भी कपड़े से ढकी रहीं। घर के बाहर लोगों ने घी के दीपक जलाए ताकि ग्रहण की नकारात्मक ऊर्जा अंदर प्रवेश न कर सके।
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सूर्यग्रहण के कारण रविवार सुबह रोज की तरह मंदिरों के कपाट नहीं खुले। दोपहर ढाई बजे के बाद मंदिरों में धुलाई करने के बाद भगवान को भी स्नान कराया गया और फिर नए कपड़े पहनाकर शृंगार किया गया। शाम पांच बजे मंदिर खोल दिए गए। हालांकि फिर भी भक्तों की भीड़ कम ही रही। घरों में सूर्य ग्रहण के बाद लोगों ने स्नान करके दान करने के बाद भोजन ग्रहण किया। ग्रहण के दौरान शहर के बांके बिहारी मंदिर, हरि मंदिर, वनखंडी नाथ, धोपेश्वरनाथ, अलखनाथ, नौ देवी, चौरासी घंटा, त्रिवटीनाथ मंदिर आदि सभी मंदिरों के कपाट बंद रहे।
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40 प्रतिशत कम हुआ उजाला

सूर्य ग्रहण सुबह 10.23 से शुरू हुआ। लोग उम्मीद कर रहे थे कि दोपहर 12 बजे अंधेरा छा जाएगा और दिन में तारे दिखेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। साठ प्रतिशत उजाला रहा जबकि लखनऊ, देहरादून, दिल्ली आदि शहरों में अंधेरा छा जाने की खबरें आईं। ग्रहण के दौरान आसमान पर बादल नहीं थे लिहाजा सूर्य में आए परिवर्तन साफ दिखाई दिए।
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ग्रहण से पहले हुआ खाना-पीना, शहर दिखा सुनसान

सुबह सवा नौ बजे से पहले ही ज्यादातर घरों में खाना बनाकर खा लिया गया। छोटे बच्चों को ग्रहण खत्म होने तक घर से बाहर नहीं जाने दिया गया। जरूरी काम होने पर ही लोग घरों से निकले। गर्भवती महिलाओं को सूतक काल से ही घर में रहने के निर्देश थे। कुछ घरों में भजन कीर्तन भी चलते रहे। शहर में ज्यादातर सड़कों पर भी सन्नाटा छाया रहा। श्यामगंज, कुतुबखाना, कोहाड़ापीर, सिविल लाइंस जैसे इलाकों में आम दिनों की तुलना में काफी कम लोग सड़कों पर नजर आए।

सोलर चश्मे से देखा कंकणाकृति सूर्यग्रहण

जिला विज्ञान क्लब की ओर से प्रेमनगर कार्यालय पर बच्चों को सोलर चश्मों के जरिए सूर्य ग्रहण का नजारा दिखाया गया। बच्चों को बताया गया कि अमावस्या के दिन आकाश में पृथ्वी और सूर्य के मध्य चंद्रमा आ जाने से ग्रहण की घटना होती है। चंद्रमा सूर्य को आंशिक, पूर्ण या वलय के रूप में ढंक लेता है। दोपहर 12 बजे के बाद सूर्य द्वितीया की चंद्रमा की तरह हो गया जिसे सीडीओ चंद्र मोहन गर्ग, डीआईओएस डॉ. अमरकांत सिंह समेत तमाम बच्चों ने भी सोलर चश्मों से देखा।

बच्चों को वैज्ञानिक नजरिया पैदा करने की जरूरत

जिला विज्ञान समन्वयक डॉ. रवि प्रकाश शर्मा के मुताबिक खगोलीय और प्राकृतिक घटनाओं के रहस्य को जानने के लिए वैज्ञानिक जागरूकता की जरूरत है। सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है जिसके संबंध में तमाम भ्रांतियां फैली हुई है। बचपन से ही बच्चे ये कहानियां सुनते हैं बड़े होने पर भी उनके मन से वही बातें स्थापित रहती हैं। इसलिए बच्चों को वैज्ञानिक नजरिये से अध्यात्म से जुड़े पहलू बताने चाहिए।

ग्रहण के दौरान हावी रहती है नकारात्मक ऊर्जा

ज्योतिषाचार्य डॉ. सौरभ शंखधार के मुताबिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहण अशुभ घटना है क्योंकि इस दौरान नकारात्मक ऊर्जा हावी रहती है। इस दौरान निकली किरणों का असर सीधे शरीर पर पड़ता है और कार्य व्यवहार में भी तमाम अवरोध आने की आशंका रहती है। इसीलिए ग्रहण के दौरान खाना न खाने, अनैतिक कर्म न करने और जीवों को कष्ट न देने को कहा जाता है।
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