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सिस्टम बेहाल- विकास के लिए तो किया नहीं बड़ा काम प्रदूषण में ही बरेली का करवा दिया नाम
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ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट शहरवासियों के लिए अलार्म, आने वाले सालों में हालात काबू से बाहर होने का अंदेशा
ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद अब आप इस बात पर ताज्जुब करते रहिए कि आपके बरेली का नाम अगर विकास और औद्योगिकीकरण के नजरिये से ढूंढा जाए तो शायद देश के सैकड़ों शहरों की गिनती के बाद भी नहीं मिलेगा, प्रदूषण के लिहाज से वह देश के टॉप टेन शहरों में शामिल हो गया है। बहरहाल अगर आप समझें तो यह एक अलार्म भी है जो साफ-साफ जता रहा है कि अगर सरकारी सिस्टम के और ज्यादा भरोसे रहे तो वह इस शहर में आपका जीना मुहाल कर देगा। सियासत में आपकी नुमाइंदगी करने वाले लोग भी आपको गुमराह करने के अलावा कुछ नहीं करेंगे। डॉक्टरों के मुताबिक अगर आप एहसास करें तो ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट यह भी बता रही है कि शहर इस हद तक प्रदूषित हो चुका कि आपकी जिंदगी के साल कम होने लगे हैं और उसे जीना मुश्किल हो गया है। सरकारी योजनाओं के बजाय उनके बजट पर निगाह रखने वाला सिस्टम आगे और आपका क्या हाल करेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि आप अभी से जागरूक न हुए आपका यह शहर जिसकी आबोहवा ने कुछ साल पहले तक सेहतयाब रखा था, वह आपकी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा जहर बन जाएगी जिससे दिल्ली की तरह मुक्ति पाना आसान नहीं रहेगा।
इस नरक के जिम्मेदार
नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, बीडीए, जिला प्रशासन
एनजीटी के निर्देश पर सॉलिड वेस्ट प्लांट बंद करने के लिए और काम नहीं हुआ
बरेली। दो साल पहले बरेली को वायु प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बरेली क्षेत्रीय केंद्र से बाकायदा एक शोध कराकर प्रदूषण कम करने के लिए गाइड लाइन जारी की गई थी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2018 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार बरेली शहर में बढ़ती गाड़ियां, टूटी सड़कें और उनकी डस्ट, तेजी से हो रहा भवनों का निर्माण, उन्हें तोड़ने की प्रक्रिया, कूड़ा और फार्मिंग वेस्ट को जलाना वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणोें में गिनाए गए थे। सरकार की गाइड लाइन के मुताबिक कई विभागों को बरेली में प्रदूषण स्तर कम करने के लिए काम करना था, इसके लिए बजट भी जारी किया गया। अफसरों ने सारा बजट खा लिया और शहरवासियों को प्रदूषण में रहने के लिए छोड़ दिया। बरेली कॉलेज के बॉटनी डिपार्टमेंट के प्रो. डीके सक्सेना के अनुसार प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण इस शहर में एनजीटी के नियमों का पालन न किया जाना भी है। पिछले तीन चार सालों से शहर में कई बड़े फ्लाईओवर बन रहे हैं जिनका निर्माण एक तो खुले में हो रहा है और समय पर पूरा करने पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से निर्माण के दौरान लगातार धूल हवा में बनी रहती है। जाम मेें फंसकर गाड़ियां भी वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं। इससे प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। बता दें कि एनजीटी के आदेश पर शहर में एक ही बड़ा काम हुआ, वह था रजऊ परसपुर में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को बंद करना। इसकी वजह से पूरा शहर भीषण गंदगी से जूझ रहा है।
फ्लाईओवरों के पास सर्वाधिक वायु प्रदूषण
प्रो. डीके सक्सेना के मुताबिक शहर के आईवीआरआई, सेटेलाइट, लाल फाटक और चौपुला में बन रहे फ्लाईओवरों को एनजीटी के कायदों के मुताबिक ढककर नहीं बनाया जा रहा। न यहां आसपास पानी का छिड़काव किया जा रहा है। इसकी वजह से इन इलाकों में लगातार 380 से 400 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर तक प्रदूषण का स्तर रिकार्ड किया जा रहा है। बाकी शहर जहां सड़कें टूटी हैं और जाम की समस्या रहती है, वहां भी 290 से 300 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर तक प्रदूषण रिकार्ड किया गया है।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश भी प्रदूषण में घुल गए
बरेली में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पांच सितंबर 2016 को शहरी विकास के प्रमुख सचिव को इसकी रोकथाम के लिए कई निर्देश दिए गए थे। इनमें सबसे खास उद्योगों और वायु प्रदूषण के दूसरे स्रोतों पर निगरानी का निर्देश था और उनको नोटिस दिए जाने थे लेकिन बरेली में ऐसी एक भी कार्रवाई नहीं हुई। सारा काम कागजों में निपटा दिया गया।
धोखेबाज सिस्टम.. कागजों में 2013 से 2018 तक प्रदूषण स्तर स्थिर
केंद्र श्रेणी 2013 2014 2015 2016 2017 2018
आईवीआरआई व्यावसायिक 217.4 224.8 207.1 205.5 188 195
सिविल लाइंस व्यावसायिक 260 268 270 246 225.7 259.24
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के आंकड़े माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर में
शहर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए फौरी तौर पर करने होंगे ये उपाय
- बरेली में जल्द से जल्द पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इलेक्ट्रिक बस सेवा शुरू की जाए।
- मल्टीलेवल पार्किंग के इंतजाम के साथ पेरीफेरल सड़कों का निर्माण कराया जाए।
- शहर में लोगों को साइकिल चलाने के लिए जागरूक किया जाए।
- गाड़ियों में बीएस-6 आधारित इंजन का प्रयोग हो।
- सिटी और अर्बन ट्रांसपोर्ट में बायो एथेनाल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल
- ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ अभियान चलाया जाए।
- सड़कों को बेहतर करने और इन्हें चौड़ा करने का काम तेज हो।
- बैटरी चालित वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- ओवरलोडेड ट्रकों और हैवी व्हीकल्स के शहर के बीच से होकर जाने पर लगे रोक
- इंटेलीजेंट ट्रैफिक सिस्टम, रेड लाइट का निर्माण जो बरेली में दस सालों से नहीं ऑपरेट हो पा रहा है।
- पौधरोपण और ग्रीन बेल्ट एरिया को बढ़ावा देने के साथ चौराहों पर फव्वारों का निर्माण।
- शहर में कूड़ा कलेक्शन और निस्तारण के ठोस इंतजाम, गड्ढों से भी मुक्ति दिलाई जानी चाहिए।
पर्यावरणविद प्रो. डीके सक्सेना और रुहेलखंड विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. करुणा के सुझाव
ईंट भट्टों से निकलने वाले धुएं का यह भी किया जा सकता है इस्तेमाल
प्रो. डीके सक्सेना के अनुसार ईंट भट्ठों से निकलने वाले धुएं का सदुपयोग भी किया जा सकता है। इसे सक्शन सिस्टम के जरिये खींचकर अगर तालाब में डाल दिया जाए तो तालाब के पानी में नाइट्रोजन और कार्बन की मात्रा बढ़ जाएगी। ब्लूग्रीन एल्गा नाम की काई तालाब में डालने से वह तीन से चार दिन में पूरी तरह पानी में घुली नाइट्रोजन और कार्बन को सोख लेती है और उसकी मात्रा दुगनी से ज्यादा हो जाती है। इस काई को सुखाकर इसके पाउडर से प्रोटीन कैप्सूल बनाए जा सकते हैं और उसे कंपनियों को बेचा भी जा सकता है। प्रोटीन ज्यादा होने से इसका खाद और मुर्गियों के लिए दाना बनाने में भी प्रयोग किया जा सकता है। इफ्को इस विधि को पहले से इस्तेमाल कर रहा है।
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ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद अब आप इस बात पर ताज्जुब करते रहिए कि आपके बरेली का नाम अगर विकास और औद्योगिकीकरण के नजरिये से ढूंढा जाए तो शायद देश के सैकड़ों शहरों की गिनती के बाद भी नहीं मिलेगा, प्रदूषण के लिहाज से वह देश के टॉप टेन शहरों में शामिल हो गया है। बहरहाल अगर आप समझें तो यह एक अलार्म भी है जो साफ-साफ जता रहा है कि अगर सरकारी सिस्टम के और ज्यादा भरोसे रहे तो वह इस शहर में आपका जीना मुहाल कर देगा। सियासत में आपकी नुमाइंदगी करने वाले लोग भी आपको गुमराह करने के अलावा कुछ नहीं करेंगे। डॉक्टरों के मुताबिक अगर आप एहसास करें तो ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट यह भी बता रही है कि शहर इस हद तक प्रदूषित हो चुका कि आपकी जिंदगी के साल कम होने लगे हैं और उसे जीना मुश्किल हो गया है। सरकारी योजनाओं के बजाय उनके बजट पर निगाह रखने वाला सिस्टम आगे और आपका क्या हाल करेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि आप अभी से जागरूक न हुए आपका यह शहर जिसकी आबोहवा ने कुछ साल पहले तक सेहतयाब रखा था, वह आपकी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा जहर बन जाएगी जिससे दिल्ली की तरह मुक्ति पाना आसान नहीं रहेगा।
इस नरक के जिम्मेदार
नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, बीडीए, जिला प्रशासन
एनजीटी के निर्देश पर सॉलिड वेस्ट प्लांट बंद करने के लिए और काम नहीं हुआ
बरेली। दो साल पहले बरेली को वायु प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बरेली क्षेत्रीय केंद्र से बाकायदा एक शोध कराकर प्रदूषण कम करने के लिए गाइड लाइन जारी की गई थी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2018 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार बरेली शहर में बढ़ती गाड़ियां, टूटी सड़कें और उनकी डस्ट, तेजी से हो रहा भवनों का निर्माण, उन्हें तोड़ने की प्रक्रिया, कूड़ा और फार्मिंग वेस्ट को जलाना वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणोें में गिनाए गए थे। सरकार की गाइड लाइन के मुताबिक कई विभागों को बरेली में प्रदूषण स्तर कम करने के लिए काम करना था, इसके लिए बजट भी जारी किया गया। अफसरों ने सारा बजट खा लिया और शहरवासियों को प्रदूषण में रहने के लिए छोड़ दिया। बरेली कॉलेज के बॉटनी डिपार्टमेंट के प्रो. डीके सक्सेना के अनुसार प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण इस शहर में एनजीटी के नियमों का पालन न किया जाना भी है। पिछले तीन चार सालों से शहर में कई बड़े फ्लाईओवर बन रहे हैं जिनका निर्माण एक तो खुले में हो रहा है और समय पर पूरा करने पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से निर्माण के दौरान लगातार धूल हवा में बनी रहती है। जाम मेें फंसकर गाड़ियां भी वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं। इससे प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। बता दें कि एनजीटी के आदेश पर शहर में एक ही बड़ा काम हुआ, वह था रजऊ परसपुर में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को बंद करना। इसकी वजह से पूरा शहर भीषण गंदगी से जूझ रहा है।
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फ्लाईओवरों के पास सर्वाधिक वायु प्रदूषण
प्रो. डीके सक्सेना के मुताबिक शहर के आईवीआरआई, सेटेलाइट, लाल फाटक और चौपुला में बन रहे फ्लाईओवरों को एनजीटी के कायदों के मुताबिक ढककर नहीं बनाया जा रहा। न यहां आसपास पानी का छिड़काव किया जा रहा है। इसकी वजह से इन इलाकों में लगातार 380 से 400 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर तक प्रदूषण का स्तर रिकार्ड किया जा रहा है। बाकी शहर जहां सड़कें टूटी हैं और जाम की समस्या रहती है, वहां भी 290 से 300 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर तक प्रदूषण रिकार्ड किया गया है।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश भी प्रदूषण में घुल गए
बरेली में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पांच सितंबर 2016 को शहरी विकास के प्रमुख सचिव को इसकी रोकथाम के लिए कई निर्देश दिए गए थे। इनमें सबसे खास उद्योगों और वायु प्रदूषण के दूसरे स्रोतों पर निगरानी का निर्देश था और उनको नोटिस दिए जाने थे लेकिन बरेली में ऐसी एक भी कार्रवाई नहीं हुई। सारा काम कागजों में निपटा दिया गया।
धोखेबाज सिस्टम.. कागजों में 2013 से 2018 तक प्रदूषण स्तर स्थिर
केंद्र श्रेणी 2013 2014 2015 2016 2017 2018
आईवीआरआई व्यावसायिक 217.4 224.8 207.1 205.5 188 195
सिविल लाइंस व्यावसायिक 260 268 270 246 225.7 259.24
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के आंकड़े माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर में
शहर में वायु प्रदूषण रोकने के लिए फौरी तौर पर करने होंगे ये उपाय
- बरेली में जल्द से जल्द पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इलेक्ट्रिक बस सेवा शुरू की जाए।
- मल्टीलेवल पार्किंग के इंतजाम के साथ पेरीफेरल सड़कों का निर्माण कराया जाए।
- शहर में लोगों को साइकिल चलाने के लिए जागरूक किया जाए।
- गाड़ियों में बीएस-6 आधारित इंजन का प्रयोग हो।
- सिटी और अर्बन ट्रांसपोर्ट में बायो एथेनाल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल
- ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ अभियान चलाया जाए।
- सड़कों को बेहतर करने और इन्हें चौड़ा करने का काम तेज हो।
- बैटरी चालित वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- ओवरलोडेड ट्रकों और हैवी व्हीकल्स के शहर के बीच से होकर जाने पर लगे रोक
- इंटेलीजेंट ट्रैफिक सिस्टम, रेड लाइट का निर्माण जो बरेली में दस सालों से नहीं ऑपरेट हो पा रहा है।
- पौधरोपण और ग्रीन बेल्ट एरिया को बढ़ावा देने के साथ चौराहों पर फव्वारों का निर्माण।
- शहर में कूड़ा कलेक्शन और निस्तारण के ठोस इंतजाम, गड्ढों से भी मुक्ति दिलाई जानी चाहिए।
पर्यावरणविद प्रो. डीके सक्सेना और रुहेलखंड विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. करुणा के सुझाव
ईंट भट्टों से निकलने वाले धुएं का यह भी किया जा सकता है इस्तेमाल
प्रो. डीके सक्सेना के अनुसार ईंट भट्ठों से निकलने वाले धुएं का सदुपयोग भी किया जा सकता है। इसे सक्शन सिस्टम के जरिये खींचकर अगर तालाब में डाल दिया जाए तो तालाब के पानी में नाइट्रोजन और कार्बन की मात्रा बढ़ जाएगी। ब्लूग्रीन एल्गा नाम की काई तालाब में डालने से वह तीन से चार दिन में पूरी तरह पानी में घुली नाइट्रोजन और कार्बन को सोख लेती है और उसकी मात्रा दुगनी से ज्यादा हो जाती है। इस काई को सुखाकर इसके पाउडर से प्रोटीन कैप्सूल बनाए जा सकते हैं और उसे कंपनियों को बेचा भी जा सकता है। प्रोटीन ज्यादा होने से इसका खाद और मुर्गियों के लिए दाना बनाने में भी प्रयोग किया जा सकता है। इफ्को इस विधि को पहले से इस्तेमाल कर रहा है।