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डॉक्टर अंकल! आप इतने बदमिजाज और गुस्सैल क्यों हैं
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बरेली। जिला अस्पताल में आम मरीजों के साथ बदसलूकी की घटनाएं तो आम हैं ही, लेकिन हद यह है कि डॉक्टर और स्टाफ यहां ब्लड ट्रांसफ्यूजन यानी खून चढ़वाने के लिए आने वाले थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को भी नहीं बख्श रहे हैं। इन बच्चों को न सिर्फ घंटों लाइन में खड़ा रखा जा रहा है बल्कि मिन्नत करने पर दुत्कारा भी जा रहा है। मंगलवार को भी उनके साथ ऐसा ही सलूक हुआ तो आहत हुए कई बच्चे अपने अभिभावकों के साथ सीएमएस और सीएमओ के पास पहुंच गए। इसके बाद सीएमएस ने निर्देश दिया कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को लाइन में नहीं खड़ा किया जाएगा और प्राथमिकता के आधार पर देखा जाएगा।
जिला अस्पताल में मंडल के चारों जिलों से डेढ़ सौ से ज्यादा थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे ब्लड ट्रांसफ्यूजन के लिए आते हैं। औसतन ऐसे पांच-छह बच्चे रोज यहां खून चढ़वाने पहुंचते हैं। इन बच्चों का कहना है कि खून चढ़ाने के लिए उन्हें हर बार तीन से चार घंटे तक इधर-उधर दौड़ाया जाता है। जब वह डॉक्टर अंकल से थोड़ा जल्दी करने को कहते हैं तो उन्हें अक्सर झिड़क कर भगा तक दिया जाता है। जिला अस्पताल पहुंचे कई बच्चों के साथ मंगलवार को भी ऐसा ही हुआ तो उन्होंने अपने अभिभावकों से शिकायत की। इसके बाद पीड़ित बच्चे और उनके अभिभावक थैलेसीमिया चिल्ड्रेन वेलफेयर सोसायटी के मुकेश अग्रवाल के साथ पहले सीएमओ डॉ. विनीत शुक्ल और फिर सीएमएस डॉ. टीएस आर्या से मिले।
सीएमओ और सीएमएस के सामने बच्चों और उनके अभिभावकों ने डॉक्टरों की शिकायत की। मोहम्मद आसिफ ने बताया कि उनके बेटे इसरार को डॉ. अजय मोहन ने झिड़क कर भगा दिया। अबरार खां, मनीष, शकील अहमद, नरेश पाल, प्रशांत शर्मा, जाहिद हुसैन, राम किशोर, मधना वती, एजाज अहमद, दिनेश कुमार, निर्मल कुमार, अरविंद कुमार आदि ने भी कहा कि इमरजेंसी के डॉ. अजय मोहन और डॉ. सियाराम सागर बच्चों को सबसे ज्यादा परेशान करते हैं। कई बार उनकी फाइलें तक उठाकर फेंक देते हैं। दवा भी समय से नहीं देते। फाइल बनाते समय बच्चों को आम मरीजों के साथ लाइन में खड़ा कर दिया जाता है जहां दो-तीन घंटे के बाद ही उनका नंबर आता है।
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दवाएं भी आधी-अधूरी ही दे रहे हैं
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के अभिभावकों ने बताया कि जिला अस्पताल से उन्हें ब्लड भी नहीं मिलता है। आईएमए उन्हें निशुल्क ब्लड देता है जिसे चढ़वाने के लिए वे जिला अस्पताल आते हैं। आयरन चिलेशन की दवाएं जिला अस्पताल में एनआरएचएम के फंड से मिलती है। यह फंड छह महीने पहले ही जिला अस्पताल को मिल चुका है। इसके बाद भी आधी-अधूरी दवाएं ही बच्चों को दी जा रही हैं। छह महीने से आधी दवाएं मिल ही नहीं रही हैं।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे और उनके अभिभावकों ने जिला अस्पताल में होने वाली कुछ दिक्कतों के बारे में शिकायत की है। इमरजेंसी से लेकर ओपीडी के डॉक्टरों तक को निर्देश दे दिए गए हैं कि जैसे ही थैलेसीमिया का कोई मरीज पहुंचे, उसे प्राथमिकता के आधार पर देखा जाए। उसकी तुरंत फाइल तैयार की जाए। उसे लाइन में न लगाया जाए। डॉ. टीएस आर्या, सीएमएस
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जिला अस्पताल में मंडल के चारों जिलों से डेढ़ सौ से ज्यादा थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे ब्लड ट्रांसफ्यूजन के लिए आते हैं। औसतन ऐसे पांच-छह बच्चे रोज यहां खून चढ़वाने पहुंचते हैं। इन बच्चों का कहना है कि खून चढ़ाने के लिए उन्हें हर बार तीन से चार घंटे तक इधर-उधर दौड़ाया जाता है। जब वह डॉक्टर अंकल से थोड़ा जल्दी करने को कहते हैं तो उन्हें अक्सर झिड़क कर भगा तक दिया जाता है। जिला अस्पताल पहुंचे कई बच्चों के साथ मंगलवार को भी ऐसा ही हुआ तो उन्होंने अपने अभिभावकों से शिकायत की। इसके बाद पीड़ित बच्चे और उनके अभिभावक थैलेसीमिया चिल्ड्रेन वेलफेयर सोसायटी के मुकेश अग्रवाल के साथ पहले सीएमओ डॉ. विनीत शुक्ल और फिर सीएमएस डॉ. टीएस आर्या से मिले।
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सीएमओ और सीएमएस के सामने बच्चों और उनके अभिभावकों ने डॉक्टरों की शिकायत की। मोहम्मद आसिफ ने बताया कि उनके बेटे इसरार को डॉ. अजय मोहन ने झिड़क कर भगा दिया। अबरार खां, मनीष, शकील अहमद, नरेश पाल, प्रशांत शर्मा, जाहिद हुसैन, राम किशोर, मधना वती, एजाज अहमद, दिनेश कुमार, निर्मल कुमार, अरविंद कुमार आदि ने भी कहा कि इमरजेंसी के डॉ. अजय मोहन और डॉ. सियाराम सागर बच्चों को सबसे ज्यादा परेशान करते हैं। कई बार उनकी फाइलें तक उठाकर फेंक देते हैं। दवा भी समय से नहीं देते। फाइल बनाते समय बच्चों को आम मरीजों के साथ लाइन में खड़ा कर दिया जाता है जहां दो-तीन घंटे के बाद ही उनका नंबर आता है।
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दवाएं भी आधी-अधूरी ही दे रहे हैं
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के अभिभावकों ने बताया कि जिला अस्पताल से उन्हें ब्लड भी नहीं मिलता है। आईएमए उन्हें निशुल्क ब्लड देता है जिसे चढ़वाने के लिए वे जिला अस्पताल आते हैं। आयरन चिलेशन की दवाएं जिला अस्पताल में एनआरएचएम के फंड से मिलती है। यह फंड छह महीने पहले ही जिला अस्पताल को मिल चुका है। इसके बाद भी आधी-अधूरी दवाएं ही बच्चों को दी जा रही हैं। छह महीने से आधी दवाएं मिल ही नहीं रही हैं।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे और उनके अभिभावकों ने जिला अस्पताल में होने वाली कुछ दिक्कतों के बारे में शिकायत की है। इमरजेंसी से लेकर ओपीडी के डॉक्टरों तक को निर्देश दे दिए गए हैं कि जैसे ही थैलेसीमिया का कोई मरीज पहुंचे, उसे प्राथमिकता के आधार पर देखा जाए। उसकी तुरंत फाइल तैयार की जाए। उसे लाइन में न लगाया जाए। डॉ. टीएस आर्या, सीएमएस