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ठहर सी गई है हवा, दम घुटने लगा
बरेली, ब्यूरो
Updated Tue, 08 Nov 2016 01:39 AM IST
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हालात दिल्ली जितने तो खराब नहीं लेकिन अच्छे भी नहीं हैं। बरेली को अपनी गिरफ्त में ले चुका स्मॉग ठहरी सी हवा भी यहीं ठिठका पड़ा है। एख तेंज सा झौंका आए तो दम साधा जाए। तमाम तरह के धूल कण समेटे स्मॉग की वजह से शहर की हवा आम दिनों की अपेक्षा ढाई से तीन गुना अधिक प्रदूषित हो गई है। सांस के रोगी और बच्चों पर ये भारी पड़ रहा है।
जब दिल्ली में दिवाली के बाद स्मॉग छाया और प्रदूषण का स्तर बढ़ गया तो बरेली में भी पांच नवंबर को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोग से एयर मॉनीटरिंग प्रोग्राम के तहत हवा की जांच की गई। सिविल लाइंस, स्टेशन रोड और आईवीआरआई में हाई वाल्यूम सैंपलर मशीन से दोपहर 2 से रात 10 और रात 10 से सुबह 6 बजे तक जांच की गई। 24 घंटे बाद जो नतीजे आए वह चौंकाने वाले रहे। मशीन में जो सफेद रंग का ऑन ग्लास वूल फिल्टर पेपर लगाया गया था वह आम दिनाें के मुकाबले ढाई से तीन गुना अधिक काला हो गया। इसमें आरएसपीएम, एसपीएम और पीएम 10 से 2.5 साइज के माइक्रॉन पाए गए। इसमें एसओ2 और एनओ2 जैसी खतरनाक गैसें भी हैं।
इस बार इतना क्यों है स्मॉग
बरेली कालेज में राष्ट्रीय एयर मॉनीटरिंग प्रोग्राम के संयोजक डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि इस बार दिवाली पर बिल्कुल हवा नहीं चली। हवा की रफ्तार इस समय 4 से 5 किलोमीटर प्रतिघंटा है जो लगभग स्थिर मानी जाएगी। दिन में तापमान बढ़ने और नमी कम होने के चलते धूल के कण ऊपर उठते हैं। इसमें दिन भर चलने वाले वाहनाें के आरएसपीएम और एसपीएम मिल जाते हैं। ये सब हवा न चलने से एक जगह रुके हैं। जैसे ही शाम हुई तापमान घटा और ओस गिरी तो धीरे- धीरे ओस में यह एसपीएम मिलकर नीचे बैठ जाते हैं। यह स्मॉग होता है जो रात भर नीचे रहने के बाद सुबह फिर उठते हैं और धरती से मात्र कुछ मीटर पर ही ठहरते हैं। अगर हवा का बहाव 10 किमी प्रतिघंटा भी होता तो स्मॉग बनने की संभावना कम होती।
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साधारण मास्क नहीं चलेगा
सुबह और शाम बच्चे, बुजुर्ग या फिर सांस के रोगियों को मास्क की जरूरत पड़ेगी। साधारण मास्क से रोकथाम नहीं होगी। 2.5 माइक्रॉन के पार्टिकल को रोकने में सक्षम विशेष मास्क का प्रयोग करें। यह एच1 एन1 मास्क कहलाते हैं जो स्वाइन फ्लू जैसे वायरस से बचने को पहनते हैं। थोक एवं फुटकर दवा विक्रेता व कैमिस्ट एसोसिएशन के दुर्गेश खटवानी बताते हैं कि दिवाली के बाद से मास्क का प्रयोग बढ़ा है। स्कूलों में मंगाए जा रहे हैं। करीब छह गुना मांग बढ़ी है। एक माह में अगर पहले सौ मास्क बेच रहे थे तो अब यह तीन सौ तक पहुंच गया है। विशेष मास्क की कीमत 150 रुपये है।
पटाखे अब नहीं
डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि दिवाली, छठ और अन्य उत्सव पर पटाखे जलाने का रिवाज छोड़ना होगा। अमेरिका, चीन, आयरलैंड और फ्रांस में भी पटाखाें का उत्सव होता है लेकिन वहां घर- घर आतिशबाजी नहीं होती। स्मॉग बढ़ने के बाद ऐसे देशों में इलेक्ट्रॉनिक ड्रोन आतिशबाजी और नदी के किनारे केवल प्रशासन द्वारा ही आतिशबाजी की अनुमति है। इसे सभी घर बैठे देख सकते हैं।
फेफड़े खराब कर देगा स्मॉग
फिजीशियन डॉ. सुदीप सरन का कहना है कि स्मॉग में घुलेमिले एसपीएम खतरनाक है। यह सांस की नलियों में सिकुड़न और फे फड़ों तक पहुंचकर उन्हें क्षति पहुंचाता है। यह इतने महीन होते हैं कि मुंह और नाक के रास्ते से आसानी से फेफड़े तक पहुंच जाते हैं।
ऐसे कर सकते हैं कम
- जहां कंस्ट्रक्शन चल रहा है वहां पानी का छिड़काव हो
- जनरेटर बहुत जरूरी होने पर ही चलाएं
- अपने आसपास की गंदगी या घासफूस को जलाएँ नहीं,
- ट्रक और डीजल वाहन शहर में कम चलें
- इलेक्ट्रिक वाहन और साइकिल का उपयोग
हरी घास अधिक लगाएं ताकि स्मॉग घास में बैठ जाए
- मास्क लगाएं खास कर बुजुर्ग और बच्चे
- पटाखे बच गए हैं तो रहने दें अब जलाएं
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जब दिल्ली में दिवाली के बाद स्मॉग छाया और प्रदूषण का स्तर बढ़ गया तो बरेली में भी पांच नवंबर को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोग से एयर मॉनीटरिंग प्रोग्राम के तहत हवा की जांच की गई। सिविल लाइंस, स्टेशन रोड और आईवीआरआई में हाई वाल्यूम सैंपलर मशीन से दोपहर 2 से रात 10 और रात 10 से सुबह 6 बजे तक जांच की गई। 24 घंटे बाद जो नतीजे आए वह चौंकाने वाले रहे। मशीन में जो सफेद रंग का ऑन ग्लास वूल फिल्टर पेपर लगाया गया था वह आम दिनाें के मुकाबले ढाई से तीन गुना अधिक काला हो गया। इसमें आरएसपीएम, एसपीएम और पीएम 10 से 2.5 साइज के माइक्रॉन पाए गए। इसमें एसओ2 और एनओ2 जैसी खतरनाक गैसें भी हैं।
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इस बार इतना क्यों है स्मॉग
बरेली कालेज में राष्ट्रीय एयर मॉनीटरिंग प्रोग्राम के संयोजक डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि इस बार दिवाली पर बिल्कुल हवा नहीं चली। हवा की रफ्तार इस समय 4 से 5 किलोमीटर प्रतिघंटा है जो लगभग स्थिर मानी जाएगी। दिन में तापमान बढ़ने और नमी कम होने के चलते धूल के कण ऊपर उठते हैं। इसमें दिन भर चलने वाले वाहनाें के आरएसपीएम और एसपीएम मिल जाते हैं। ये सब हवा न चलने से एक जगह रुके हैं। जैसे ही शाम हुई तापमान घटा और ओस गिरी तो धीरे- धीरे ओस में यह एसपीएम मिलकर नीचे बैठ जाते हैं। यह स्मॉग होता है जो रात भर नीचे रहने के बाद सुबह फिर उठते हैं और धरती से मात्र कुछ मीटर पर ही ठहरते हैं। अगर हवा का बहाव 10 किमी प्रतिघंटा भी होता तो स्मॉग बनने की संभावना कम होती।
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साधारण मास्क नहीं चलेगा
सुबह और शाम बच्चे, बुजुर्ग या फिर सांस के रोगियों को मास्क की जरूरत पड़ेगी। साधारण मास्क से रोकथाम नहीं होगी। 2.5 माइक्रॉन के पार्टिकल को रोकने में सक्षम विशेष मास्क का प्रयोग करें। यह एच1 एन1 मास्क कहलाते हैं जो स्वाइन फ्लू जैसे वायरस से बचने को पहनते हैं। थोक एवं फुटकर दवा विक्रेता व कैमिस्ट एसोसिएशन के दुर्गेश खटवानी बताते हैं कि दिवाली के बाद से मास्क का प्रयोग बढ़ा है। स्कूलों में मंगाए जा रहे हैं। करीब छह गुना मांग बढ़ी है। एक माह में अगर पहले सौ मास्क बेच रहे थे तो अब यह तीन सौ तक पहुंच गया है। विशेष मास्क की कीमत 150 रुपये है।
पटाखे अब नहीं
डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि दिवाली, छठ और अन्य उत्सव पर पटाखे जलाने का रिवाज छोड़ना होगा। अमेरिका, चीन, आयरलैंड और फ्रांस में भी पटाखाें का उत्सव होता है लेकिन वहां घर- घर आतिशबाजी नहीं होती। स्मॉग बढ़ने के बाद ऐसे देशों में इलेक्ट्रॉनिक ड्रोन आतिशबाजी और नदी के किनारे केवल प्रशासन द्वारा ही आतिशबाजी की अनुमति है। इसे सभी घर बैठे देख सकते हैं।
फेफड़े खराब कर देगा स्मॉग
फिजीशियन डॉ. सुदीप सरन का कहना है कि स्मॉग में घुलेमिले एसपीएम खतरनाक है। यह सांस की नलियों में सिकुड़न और फे फड़ों तक पहुंचकर उन्हें क्षति पहुंचाता है। यह इतने महीन होते हैं कि मुंह और नाक के रास्ते से आसानी से फेफड़े तक पहुंच जाते हैं।
ऐसे कर सकते हैं कम
- जहां कंस्ट्रक्शन चल रहा है वहां पानी का छिड़काव हो
- जनरेटर बहुत जरूरी होने पर ही चलाएं
- अपने आसपास की गंदगी या घासफूस को जलाएँ नहीं,
- ट्रक और डीजल वाहन शहर में कम चलें
- इलेक्ट्रिक वाहन और साइकिल का उपयोग
हरी घास अधिक लगाएं ताकि स्मॉग घास में बैठ जाए
- मास्क लगाएं खास कर बुजुर्ग और बच्चे
- पटाखे बच गए हैं तो रहने दें अब जलाएं