Bareilly News: बीडीए की आवासीय योजना 21 साल बाद भी वीरान... भूमिहीन हुए किसान; ऐसा है हाल
रामगंगानगर आवासीय योजना के कई सेक्टर अब भी वीरान हैं। उनमें भी तमाम प्लॉट खाली हैं। जहां बसावट हो गई है, वहां पर नागरिक सुविधाओं का अभाव है।
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बरेली में 20-21 साल पहले जिस रामगंगानगर आवासीय योजना के लिए बीडीए (बरेली विकास प्राधिकरण) ने किसानों की जमीनें ली थीं, उस योजना के कई सेक्टर अभी तक वीरान हैं। कोई बसावट नहीं, जहां घर बने और आबादी बसी, वहां नागरिक सुविधाएं नाकाफी हैं। लोग पीने के पानी तक के लिए तरस रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर खेती की जमीन इस आवासीय योजना में जाने के बाद कई किसान भूमिहीन हो गए। उचित मुआवजा नहीं मिला तो वह कोर्ट-कचहरी के धक्के खाने के लिए विवश हैं।
बीडीए बोर्ड के सदस्य राजेश अग्रवाल बताते हैं कि रामगंगानगर आवासीय योजना 21 साल बाद भी साकार नहीं हो पाई है। इसमें 12 सेक्टर हैं, जिसमें केवल सेक्टर एक, तीन, चार और नौ में बसावट हुई है, लेकिन उनमें भी तमाम प्लॉट खाली हैं। शेष अन्य सेक्टर जैसे कि दो, पांच, छह, सात, आठ, 10, 11 व 12 अभी तक वीरान ही पड़े हैं। अग्रवाल ने कहा कि ये आवासीय योजना भले ही परवान नहीं चढ़ी, लेकिन बीडीए ने दूसरी योजना ग्रेटर बरेली के लिए जमीन अधिग्रहण और प्लाटों की बिक्री का काम तेज कर दिया है।
ग्रेटर बरेली आवासीय योजना के लिए भूमि अधिग्रहण में प्रभावित होने वाले किसान बीडीए को अपनी जमीन देने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। इस संबंध में जब बीडीए उपाध्यक्ष मनिकंडन ए से बात करने का प्रयास किया गया, मगर उन्होंने कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया।
बीडीए नहीं मान रहा न्यायालय का फैसला
चंद्रपुर बिचपुरी के फैजउल्ला ने बताया कि वह तीन भाई-बहन में बड़े हैं। उनके पिता के नाम 135 बीघे जमीन थी, जो बीडीए के अधिग्रहण में चली गई। बीडीए ने 165.51 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा दिया तो उनके पिता ने जनवरी 2016 में बीडीए के विरुद्ध विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी की कोर्ट में केस कर दिया था। फिर 2019 में कलक्ट्रेट में लारा कोर्ट स्थापित हुई तो केस यहां ट्रांसफर हो गया था। पिता की मौत के बाद अब फैजउल्ला केस लड़ रहे हैं। जिसमें 2023 में उनके पक्ष में फैसला आया था। अभी तक बीडीए ने उनके ब्याज समेत मुआवजे के 113 करोड़ रुपये नहीं दिए हैं।
15 साल बाद लिया मुआवजा
चंद्रपुर बिचपुरी के ही श्रवण बताते हैं कि उनके पास साढ़े 12 बीघे जमीन थी। इसमें गन्ना, धान और गेहूं की फसलों की अच्छी पैदावार होती थी। उनकी यह खेती बीडीए ने 2005 में ले ली थी। फिर आपत्ति लगाने के साथ ही 15 साल बाद वर्ष 2021 में 51 लाख रुपये बतौर मुआवजा दिया था।
श्रवण का कहना है कि जब बीडीए ने उनकी जमीन का अवार्ड नया अधिनियम आने के बाद किया तो उसी क्रम में मुआवजा राशि भी मिलनी चाहिए। इसकी लड़ाई वह न्यायालय में लड़ रहे हैं। इन्हें भी न्यायिक लड़ाई में सफलता मिल चुकी है, जिसे बीडीए मान नहीं रहा है।
बीडीए ने ली जमीन, भूमिहीन प्रेमपाल कर रहे मजदूरी
बिचपुरी के ही प्रेमपाल ने बताया कि उनके और पत्नी पार्वती के नाम संयुक्त गाटे पर कुल साढ़े 17 बीघे जमीन थी। यह बीडीए के अधिग्रहण में चली गई। उसके बाद से वह भूमिहीन हो गए और अब परिवार चलाने के लिए मजदूरी कर रहे हैं। अधिग्रहण के बाद बीडीए ने 165.51 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से चार चरण में मुआवजा दिया था, जबकि उनकी जमीन 2014 में नया भूमि अध्याप्ति अधिनियम आने के बाद अवार्ड हुई थी, लेकिन बीडीए ने उन्हें पुराने अधिनियम के तहत ही मुआवजा दिया है, जिसके विरोध में वह कोर्ट-कचहरी के धक्के खा रहे हैं।