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पर्यटन विभाग की नजर से दूर बरेली का इतिहास
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Tue, 27 Sep 2016 01:44 AM IST
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पहाड़ का प्रवेश द्वार बरेली ऐतिहासिक धरोहरों से स्थानों का भरा है। अगर, सरकार ने ध्यान दिया होता तो आज बरेली महाभारत काल, जैन काल, बौद्ध काल, मुगल शासन काल और रुहेला शासक काल को सममृतियों को संझोए एक खास पर्यटन स्थल होता। पर्यटन विभाग की नजर में पांच स्थल ऐसे हैं जिन्हें पर्यटन का दर्जा मिला है। पर इनकी मरम्मत और रखरखाव के लिए कोई इंतजाम न होने से इनके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।
महाभारत काल के उत्तरी पांचाल राज्य की राजधानी अहिक्षत्र में थी। द्रुपद का किला आज भी उस समय की कला का का एक उदाहरण है। माना जाता है कि द्रोपदी का जन्म यहीं हुआ था। यहां से 18 किलोमीटर दूर रामपुर रोड पर लीलौर झील भी इस काल की है। पांडव 13 वर्ष अज्ञातवास के अंतिम समय में इसी झील के किनारे रहे और यज्ञ प्रश्न का प्रसंग भी इसी झील पर माना जाता है। इसे पर्यटन का दर्जा दिलाने के लिए समाज सेवी जेसी पालीवाल और साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने वर्षों तक प्रयास किए। तब जाकर 2015 में इसकी खुदाई कराई गई। एक वर्ष में इस झील में पानी आ चुका है। इसे अच्छा पर्यटन स्थल बनाने के लिए अब समाजसेवी यहां गेस्टहाउस बनवाने और नाव का इंतजाम कराने की मांग कर रहे हैं।
जैन धर्मावंलियों के लिए रामनगर अहम स्थान रखता है। यहां स्थिति दूसरे स्थलों से कहीं बेहतर है। पर्यटन विभाग ने नहीं बल्कि जैन धर्म के लोगों आर्थिक योगदान देकर इस स्थल को सवांरा है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने अहिक्षत्र में तीन वर्ष तक तपस्या की। बौद्ध मतावलंबी भीम की गधा को बौधस्तूप मानते हैं। यहां पर्यटन सुविधाएं इतनी लचर हैं कि वर्ष 2007 में एक इंटरनेशनल थियेटर फेस्ट में भाग लेने बरेली आए चीन के रंगकर्मी जब बौधस्तूप घूमने गए, तो कच्चे रास्ते पर बस न चलने के कारण पूरा रास्ता उन्हें पैदल पूरा करना पड़ा। इसके बाद चीनी दूतावास की ओर से भारत सरकार को यहां पर्यटन विकास के लिए पत्र लिखा गया। इसके बाद यहां एक थीम पार्क का निर्माण हुआ।
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बरेली में गदर की चिंगारी जलाने वाले और रूहेलखंड के निर्माण में बड़ा योगदान करने वाले खान बहादुर खान की बची स्मृतियों को विभाग ने कभी अहमियत नहीं दी। भूड़ स्थित नवाब साहब का ढेरा आज लगभग खत्म हो चुका है। इसे पर्यटन स्थल में शामिल कराने की लड़ाई चल रही है। यहां खान बहादुर रहा करते थे। रुहेला खान बहादुर खान ने बरेली में दस महीने तक शासन किया, अंग्रेजों ने इनपर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर सरेआम फांसी दी। इनकी कब्र जिला जेल में बनाई गई, इस कब्र को जेल परिसर से बाहर बनाने के लिए कई वर्षों तक प्रयास करने पड़े।
इन स्थानों को पर्यटन स्थल बनाने के लिए उठती रही हैं मांग
कैंट स्थित फ्री-विल बेप्टिस चर्च अंग्रेजों के समय का सबसे पुराना चर्च है। इसी तरह गवर्नमेंट इंटर कालेज की जर्जर हो चुकी इमारत को पर्यटन मेें शामिल कराने के लिए मांगे उठती रही हैं। साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी काफी समय से स्वतंत्रता सेनानी प्रताप बारहट का स्मृति पटल लगवाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इससे पहले कमिश्नरी में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति पटल लगवाने की लड़ाई लड़ी गई, पर्यटन विभाग और सरकार की हामी में लंबा समय लगा। यह पटल खान बहादुर खान के 257 सेनानियों के लिए है जिन्हें 30 मई 1857 को एक साथ फंसी पर लटका दिया गया था।
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महाभारत काल के उत्तरी पांचाल राज्य की राजधानी अहिक्षत्र में थी। द्रुपद का किला आज भी उस समय की कला का का एक उदाहरण है। माना जाता है कि द्रोपदी का जन्म यहीं हुआ था। यहां से 18 किलोमीटर दूर रामपुर रोड पर लीलौर झील भी इस काल की है। पांडव 13 वर्ष अज्ञातवास के अंतिम समय में इसी झील के किनारे रहे और यज्ञ प्रश्न का प्रसंग भी इसी झील पर माना जाता है। इसे पर्यटन का दर्जा दिलाने के लिए समाज सेवी जेसी पालीवाल और साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने वर्षों तक प्रयास किए। तब जाकर 2015 में इसकी खुदाई कराई गई। एक वर्ष में इस झील में पानी आ चुका है। इसे अच्छा पर्यटन स्थल बनाने के लिए अब समाजसेवी यहां गेस्टहाउस बनवाने और नाव का इंतजाम कराने की मांग कर रहे हैं।
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जैन धर्मावंलियों के लिए रामनगर अहम स्थान रखता है। यहां स्थिति दूसरे स्थलों से कहीं बेहतर है। पर्यटन विभाग ने नहीं बल्कि जैन धर्म के लोगों आर्थिक योगदान देकर इस स्थल को सवांरा है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने अहिक्षत्र में तीन वर्ष तक तपस्या की। बौद्ध मतावलंबी भीम की गधा को बौधस्तूप मानते हैं। यहां पर्यटन सुविधाएं इतनी लचर हैं कि वर्ष 2007 में एक इंटरनेशनल थियेटर फेस्ट में भाग लेने बरेली आए चीन के रंगकर्मी जब बौधस्तूप घूमने गए, तो कच्चे रास्ते पर बस न चलने के कारण पूरा रास्ता उन्हें पैदल पूरा करना पड़ा। इसके बाद चीनी दूतावास की ओर से भारत सरकार को यहां पर्यटन विकास के लिए पत्र लिखा गया। इसके बाद यहां एक थीम पार्क का निर्माण हुआ।
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बरेली में गदर की चिंगारी जलाने वाले और रूहेलखंड के निर्माण में बड़ा योगदान करने वाले खान बहादुर खान की बची स्मृतियों को विभाग ने कभी अहमियत नहीं दी। भूड़ स्थित नवाब साहब का ढेरा आज लगभग खत्म हो चुका है। इसे पर्यटन स्थल में शामिल कराने की लड़ाई चल रही है। यहां खान बहादुर रहा करते थे। रुहेला खान बहादुर खान ने बरेली में दस महीने तक शासन किया, अंग्रेजों ने इनपर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर सरेआम फांसी दी। इनकी कब्र जिला जेल में बनाई गई, इस कब्र को जेल परिसर से बाहर बनाने के लिए कई वर्षों तक प्रयास करने पड़े।
इन स्थानों को पर्यटन स्थल बनाने के लिए उठती रही हैं मांग
कैंट स्थित फ्री-विल बेप्टिस चर्च अंग्रेजों के समय का सबसे पुराना चर्च है। इसी तरह गवर्नमेंट इंटर कालेज की जर्जर हो चुकी इमारत को पर्यटन मेें शामिल कराने के लिए मांगे उठती रही हैं। साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी काफी समय से स्वतंत्रता सेनानी प्रताप बारहट का स्मृति पटल लगवाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इससे पहले कमिश्नरी में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति पटल लगवाने की लड़ाई लड़ी गई, पर्यटन विभाग और सरकार की हामी में लंबा समय लगा। यह पटल खान बहादुर खान के 257 सेनानियों के लिए है जिन्हें 30 मई 1857 को एक साथ फंसी पर लटका दिया गया था।