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फतवों को भी मिलनी चाहिए मान्यता
Bareilly
Updated Tue, 08 Jul 2014 05:33 AM IST
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बरेली। सुप्रीम कोर्ट की शरीयत के बारे में टिप्पणी पर सुन्नी उलमा का कहना है कि भारतीय संविधान में हर व्यक्ति को अपने मजहब के मुताबिक जिंदगी गुजारने का हक हासिल है। हिंदुस्तान एक जमहूरी मुल्क है जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। यहां किसी को किसी मामले में पाबंद नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि शरीयत को कानूनी हक हासिल नहीं है, यह अपने आप में भारतीय संविधान के विपरीत बात है। मुसलमान इस्लाम के तमाम उसूल और कानून पर अमल करते हैं। शरीयत को नाफिज (क्रियान्वित) करने वाली संस्थाएं दारुल इफ्ता, दारुल कजा या दीगर इस्लामी इदारे जो फतवा जारी करते हैं या मशवरा देते हैं वह अएन कुरान और हदीस के मुताबिक होता है। यह सिर्फ मुस्लिम कौम पर लागू होता है। फाजिल जजों को चाहिए कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ को ध्यान में रख कर पुनर्विचार करें। -मौलाना शहाबउद्दीन रजवी, राष्ट्रीय महासचिव जमात रजा मुस्तफा (संबद्ध सुन्नी मरकज दरगाह आला हजरत) बरेली
हिंदुस्तान चूंकि जमहूरी मुल्क है इसलिए जमहूरियत के पेशेनजर शरीयत के कानून को भी मानना चाहिए। यहां हर मजहब के लोग बसते हैं और हर मजहब के लोगों को अपनी बात कहने का हक भी है। मुसलमान अपने मजहब के एतबार से कुरान और हदीस की रोशनी में शरई कानून नाफिज (क्रियान्वित) करते है। कुरान और हदीस से हटकर कोई बात नहीं कही जा सकती। शरीयत का कानून किसी भी इंसान का जाती फैसला नहीं होता, बल्कि यह अल्लाह और उसके रसूल का कानून होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट से मुतालबा (मांग) है कि शरीयत के कानून को जमहूरी हैसियत से माना जाए। - मुफ्ती खुर्शीद आलम, शहर इमाम शाही जामा मस्जिद बरेली
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सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि शरीयत को कानूनी हक हासिल नहीं है, यह अपने आप में भारतीय संविधान के विपरीत बात है। मुसलमान इस्लाम के तमाम उसूल और कानून पर अमल करते हैं। शरीयत को नाफिज (क्रियान्वित) करने वाली संस्थाएं दारुल इफ्ता, दारुल कजा या दीगर इस्लामी इदारे जो फतवा जारी करते हैं या मशवरा देते हैं वह अएन कुरान और हदीस के मुताबिक होता है। यह सिर्फ मुस्लिम कौम पर लागू होता है। फाजिल जजों को चाहिए कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ को ध्यान में रख कर पुनर्विचार करें। -मौलाना शहाबउद्दीन रजवी, राष्ट्रीय महासचिव जमात रजा मुस्तफा (संबद्ध सुन्नी मरकज दरगाह आला हजरत) बरेली
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हिंदुस्तान चूंकि जमहूरी मुल्क है इसलिए जमहूरियत के पेशेनजर शरीयत के कानून को भी मानना चाहिए। यहां हर मजहब के लोग बसते हैं और हर मजहब के लोगों को अपनी बात कहने का हक भी है। मुसलमान अपने मजहब के एतबार से कुरान और हदीस की रोशनी में शरई कानून नाफिज (क्रियान्वित) करते है। कुरान और हदीस से हटकर कोई बात नहीं कही जा सकती। शरीयत का कानून किसी भी इंसान का जाती फैसला नहीं होता, बल्कि यह अल्लाह और उसके रसूल का कानून होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट से मुतालबा (मांग) है कि शरीयत के कानून को जमहूरी हैसियत से माना जाए। - मुफ्ती खुर्शीद आलम, शहर इमाम शाही जामा मस्जिद बरेली
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