{"_id":"5bb7a38d867a55353f6e300a","slug":"21538761613-bareilly-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब कबाड़ में नहीं बिकेंगे ट्रेनों के पुराने कोच","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब कबाड़ में नहीं बिकेंगे ट्रेनों के पुराने कोच
राहुल सक्सेना,अमर उजाला,बरेली
Updated Sat, 06 Oct 2018 07:39 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ट्रेनों के 25 साल पुराने कोचों को कबाड़ में बेचने के बजाय अब रेलवे उन्हें ऑटो मोबाइल कंपनियों को अपने उत्पादों को ले जाने के लिए दिया जाएगा। कबाड़ कोच दुरुस्त करने के बाद डिवीजन की मांग के मुताबिक सौंपे जा रहे हैं। वर्तमान में इज्जतनगर वर्कशाप से सिडकुल (उधमसिंह नगर का औद्योगिक क्षेत्र) कोच भेजे जा रहे हैं। वहां से मारुति, टाटा आदि कंपनियां इन कोचों से अपने नए वाहन बिक्री के लिए विभिन्न शहरों में भेजे जा रहे हैं।
रेलवे बोर्ड ने पुराने कोचों को कंडम न करने का फैसला लिया है। अब तक 1993 या उससे पहले के बने रेलवे कोच कबाड़ में बेचे जाते थे, जिससे रेलवे को काफी घाटा होता था। रेलवे बोर्ड ने घाटे से उबरने के लिए कंपनियों से संपर्क किया, इसके बाद अनुबंध पर कोच ऑटोमोबाइल कंपनियों को देना तय हुआ। अब तक कंपनियां ट्रक से अपने उत्पाद सप्लाई करतीं थीं, इसमें समय के साथ-साथ खर्चा भी अधिक आता था और रिस्क भी ज्यादा होता है।
रेल अधिकारियों के मुताबिक, इज्जतनगर रेलवे वर्कशाप में कोचों से बर्थ और टायलेट निकालकर उन्हें लगेज कैरियर का रूप दिया जा रहा है। इसके बाद तैयार कोच संबंधित डिवीजन की डिमांड के अनुसार भेजे जाते हैं। इन दिनों वर्कशाप में सिडकुल में कार, टाटा मैजिक और ट्रैक्टर भेजने के लिए कोच तैयार हो रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि एक कोच को तैयार करने में करीब 15 दिन का समय लगता है। टेक्नीशियन सबसे ज्यादा कोच की ट्राली की मरम्मत पर ध्यान देते हैं।
विज्ञापन
वर्कशाप में कोच तैयार हो रहे हैं, जिन्हें रेलवे के किसी भी डिवीजन को डिमांड के अनुसार भेजा जा सकता है। इससे रेलवे को जबरदस्त आमदनी होने की संभावना है। - राजेंद्र सिंह, पीआरओ, इज्जतनगर डिवीजन
विज्ञापन
रेलवे बोर्ड ने पुराने कोचों को कंडम न करने का फैसला लिया है। अब तक 1993 या उससे पहले के बने रेलवे कोच कबाड़ में बेचे जाते थे, जिससे रेलवे को काफी घाटा होता था। रेलवे बोर्ड ने घाटे से उबरने के लिए कंपनियों से संपर्क किया, इसके बाद अनुबंध पर कोच ऑटोमोबाइल कंपनियों को देना तय हुआ। अब तक कंपनियां ट्रक से अपने उत्पाद सप्लाई करतीं थीं, इसमें समय के साथ-साथ खर्चा भी अधिक आता था और रिस्क भी ज्यादा होता है।
विज्ञापन
रेल अधिकारियों के मुताबिक, इज्जतनगर रेलवे वर्कशाप में कोचों से बर्थ और टायलेट निकालकर उन्हें लगेज कैरियर का रूप दिया जा रहा है। इसके बाद तैयार कोच संबंधित डिवीजन की डिमांड के अनुसार भेजे जाते हैं। इन दिनों वर्कशाप में सिडकुल में कार, टाटा मैजिक और ट्रैक्टर भेजने के लिए कोच तैयार हो रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि एक कोच को तैयार करने में करीब 15 दिन का समय लगता है। टेक्नीशियन सबसे ज्यादा कोच की ट्राली की मरम्मत पर ध्यान देते हैं।
विज्ञापन
वर्कशाप में कोच तैयार हो रहे हैं, जिन्हें रेलवे के किसी भी डिवीजन को डिमांड के अनुसार भेजा जा सकता है। इससे रेलवे को जबरदस्त आमदनी होने की संभावना है। - राजेंद्र सिंह, पीआरओ, इज्जतनगर डिवीजन