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आजादी के दीवाने की एक प्रतिमा तक नहीं
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
Updated Sat, 13 Aug 2016 11:47 PM IST
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स्वतंत्रता संग्राम में थी पं. चन्द्रभूषण शुक्ल का घर
- फोटो : अमर उजाला
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भारत मां को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करने वाले वीर सपूत कोअपनी ही धरती पर भुला दिया गया है। भले ही जिले में आज कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हमारे बीच नहीं है पर 15 अगस्त का पर्व आते आते एक बार फिर आजादी की लड़ाई में यहां के मतवालाें की भूमिका की तस्वीर लोगाें के जेहन में आ जाती है।
स्वतंत्रता आंदोलन के स्थानीय नायकाें का मनोबल बढ़ाने के लिए यहां पर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आकर आजादी के मतवालाें को जो संदेश दिया था, उससे नरम और गरम दोनों पक्षाें ने आजादी में अहम भूमिका निभाई।
गुलामी की जंजीराें से देश को आजाद कराने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन हो या रेलवे स्टेशन उड़ाना, लखनऊ में बैंक डकैती हो या दिल्ली में गिरफ्तारी सभी जगह अपने जोश और जज्बे के आगे अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले पंडित चन्द्रभूषण शुक्ल अपनी ही जमीन पर भुला दिए गए। इस जांबाज की न तो कहीं मूर्ति लगी है, और न ही उनकी वीरता का कहीं उल्लेख है।
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जिले के मोहम्मदपुर खाला के पंडित गुरुनरायन शुक्ल के घर 31 मई 1914 को जन्मे पंडित चंद्रभूषण शुक्ल का देश की आजादी में गौरवशाली इतिहास रहा है। उसकी गाथा परिवारीजन और कुछ पुराने साहित्यकारों की जुबान पर तो है पर सरकारी दस्तावेजाें में नहीं।
बताते हैं कि बिंदौरा और पैतेपुर में रेलवे स्टेशन जलाने की अगुवाई करना हो या लखनऊ में दो बैंक डकैती कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। 1940-41 में जेल गए सजा हुई और जुर्माना अदा किया। भारत छोड़ो आंदोलन में भी पंडित चन्द्रभूषण शुक्ल की दिल्ली में गिरफ्तारी हुई। आजादी का यह दीवाना अपने परिवार के साथ 1948 में शहर के छाया चौराहा के पास मकान बनाकर रहने लगे।
तृभूमि प्रिंटिंग प्रेस व अखबार निकाला 25 वर्षों तक अखबार निकालते रहे। जिला कांग्रेस के अध्यक्ष जिला परिषद के अध्यक्ष जैसे महत्तवपूर्ण पदों पर विराजमान रहे। 20 अप्रैल 1983 को पंडित चन्द्रभूषण ने अंतिम सांस ली। परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए मकान का एक हिस्सा स्कूल के नाम किराए पर देना पड़ा।
छ दिन बाद स्कूल संचालक उसे ही हड़पने की जुगत में लग गया। लंबे संघर्ष के बाद मकान खाली हो सका। कई बार पंडित जी की मूर्ति लगाने की मांग उठी पर अब तक न तो एक सड़क का नाम पड़ा न ही कहीं मूर्ति लगी। रिकॉर्ड खंगाले तो वेबसाइट पर सिर्फ एक पासपोर्ट साइज का फोटो है।
चंद्रभूषण शुक्ल के पौत्र वैभव शुक्ला के अंदर देश सेवा का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ है। वहीं उनकी पौत्री नेहा शुक्ला परिषदीय विद्यालय में शिक्षिका के पद पर तैनात हैं। वैभव बताते हैं कि मम्मी से बाबा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है।
इच्छा है कि डिफेंस में जाऊं और देश सेवा करूं। फिरहाल अभी कंपटीशन की तैयारी चल रही है। बताया कि अब लोगों में देश के प्रति सेवा की भावना कम ही दिखती है। आजादी के दीवानों व उनके परिवार के लिए लोगों के दिल में कोई जगह नहीं दिखाई देती। नवाबगंज तहसील मेें एक प्रमाण पत्र बनवाने के लिए घूस भी देना पड़ा।
स्वर्गीय पं. चन्द्रभूषण शुक्ल की बहू लक्ष्मी शुक्ला एक पुराना फोटो दिखाती हैं पर उनके साथ कौन है यह नहीं बता पाईं। इतना जरूर कहा कि घर के सामने कई बार मूर्ति लगाकर पार्क बनाने की मांग की गई पर कुछ नहीं हुआ। या यूं कहा जाए की जिस आजादी के मतवाले ने बाराबंकी से दिल्ली तक देश को आजाद कराने में अंग्रेजों की चूलें हिला दी हों वह समय के साथ अपनी ही जमीन में गुम हो गया है।
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स्वतंत्रता आंदोलन के स्थानीय नायकाें का मनोबल बढ़ाने के लिए यहां पर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आकर आजादी के मतवालाें को जो संदेश दिया था, उससे नरम और गरम दोनों पक्षाें ने आजादी में अहम भूमिका निभाई।
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गुलामी की जंजीराें से देश को आजाद कराने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन हो या रेलवे स्टेशन उड़ाना, लखनऊ में बैंक डकैती हो या दिल्ली में गिरफ्तारी सभी जगह अपने जोश और जज्बे के आगे अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले पंडित चन्द्रभूषण शुक्ल अपनी ही जमीन पर भुला दिए गए। इस जांबाज की न तो कहीं मूर्ति लगी है, और न ही उनकी वीरता का कहीं उल्लेख है।
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जिले के मोहम्मदपुर खाला के पंडित गुरुनरायन शुक्ल के घर 31 मई 1914 को जन्मे पंडित चंद्रभूषण शुक्ल का देश की आजादी में गौरवशाली इतिहास रहा है। उसकी गाथा परिवारीजन और कुछ पुराने साहित्यकारों की जुबान पर तो है पर सरकारी दस्तावेजाें में नहीं।
बताते हैं कि बिंदौरा और पैतेपुर में रेलवे स्टेशन जलाने की अगुवाई करना हो या लखनऊ में दो बैंक डकैती कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। 1940-41 में जेल गए सजा हुई और जुर्माना अदा किया। भारत छोड़ो आंदोलन में भी पंडित चन्द्रभूषण शुक्ल की दिल्ली में गिरफ्तारी हुई। आजादी का यह दीवाना अपने परिवार के साथ 1948 में शहर के छाया चौराहा के पास मकान बनाकर रहने लगे।
तृभूमि प्रिंटिंग प्रेस व अखबार निकाला 25 वर्षों तक अखबार निकालते रहे। जिला कांग्रेस के अध्यक्ष जिला परिषद के अध्यक्ष जैसे महत्तवपूर्ण पदों पर विराजमान रहे। 20 अप्रैल 1983 को पंडित चन्द्रभूषण ने अंतिम सांस ली। परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए मकान का एक हिस्सा स्कूल के नाम किराए पर देना पड़ा।
छ दिन बाद स्कूल संचालक उसे ही हड़पने की जुगत में लग गया। लंबे संघर्ष के बाद मकान खाली हो सका। कई बार पंडित जी की मूर्ति लगाने की मांग उठी पर अब तक न तो एक सड़क का नाम पड़ा न ही कहीं मूर्ति लगी। रिकॉर्ड खंगाले तो वेबसाइट पर सिर्फ एक पासपोर्ट साइज का फोटो है।
चंद्रभूषण शुक्ल के पौत्र वैभव शुक्ला के अंदर देश सेवा का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ है। वहीं उनकी पौत्री नेहा शुक्ला परिषदीय विद्यालय में शिक्षिका के पद पर तैनात हैं। वैभव बताते हैं कि मम्मी से बाबा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है।
इच्छा है कि डिफेंस में जाऊं और देश सेवा करूं। फिरहाल अभी कंपटीशन की तैयारी चल रही है। बताया कि अब लोगों में देश के प्रति सेवा की भावना कम ही दिखती है। आजादी के दीवानों व उनके परिवार के लिए लोगों के दिल में कोई जगह नहीं दिखाई देती। नवाबगंज तहसील मेें एक प्रमाण पत्र बनवाने के लिए घूस भी देना पड़ा।
स्वर्गीय पं. चन्द्रभूषण शुक्ल की बहू लक्ष्मी शुक्ला एक पुराना फोटो दिखाती हैं पर उनके साथ कौन है यह नहीं बता पाईं। इतना जरूर कहा कि घर के सामने कई बार मूर्ति लगाकर पार्क बनाने की मांग की गई पर कुछ नहीं हुआ। या यूं कहा जाए की जिस आजादी के मतवाले ने बाराबंकी से दिल्ली तक देश को आजाद कराने में अंग्रेजों की चूलें हिला दी हों वह समय के साथ अपनी ही जमीन में गुम हो गया है।