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चार दशक बाद चुनावी मैदान से बाहर रहेगा बेनी का परिवार

Tue, 31 Jan 2017 11:39 PM IST
केपी तिवारी/बाराबंकी
केपी तिवारी/बाराबंकी Updated Tue, 31 Jan 2017 11:39 PM IST
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Four decades later, Beni family will be out of the fray
बेनी बाबू - फोटो : अमर उजाला
राजनीति के फलक पर चार दशक से अधिक वक्त तक चुनावी मैदान में ताल ठोकने वाले बेनी प्रसाद वर्मा की तूती बोलती रही है। उतार चढ़ाव भरे सियासी जीवन में बेनी बाबू की तुलना मुलायम के बाद की होती थी। 1974 के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव होगा जिसमें बेनी प्रसाद वर्मा या उनके घर का कोई सदस्य चुनाव मैदान में नहीं उतरा है। बेटे को टिकट दिलाने के लिए बेनी बाबू ने सारे दांव चले पर अपने अक्खड़ स्वभाव के चलते पार्टी से बागी भी हुए और दूसरे दलों में फिट भी नहीं हो पाए। 
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खांटी समाजवादी नेता स्व. रामसेवक यादव के साथ राजनीति का ककहरा सीखने वाले बेनी बाबू ने सबसे पहले गन्ना किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए बुढ़वल केन यूनियन से शुरू की। 1974 में पहली बार चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांतिदल से दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। 1977 में मसौली विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेसी दिग्गज नेता मोहसिना किदवई को हराया।
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1980 में मसौली से चुनाव लड़े पर हार का सामना करना पड़ा। 1985 में लोकदल से फिर चुनाव जीते। 1989 और 1991 में बेनी प्रसाद वर्मा जनता दल से विजयी हुए। 1993 में मुलायम के साथ समाजवादी पार्टी में मसौली से शानदार जीत हासिल की। 1974 से शुरू होकर 1993 तक सिर्फ 1980 का चुनाव छोड़कर जीत का झंडा बुलंद करने वाले बेनी बाबू की तूती जिले में ही नहीं प्रदेश व खासकर कुर्मी बेल्ट में बोल रही थी।
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1996 में उन्होंने अपनी मजबूत सीट मसौली से पुत्र राकेश वर्मा को मैदान में उतारा पर वह हार गए। 2002 के चुनाव में पुन: राकेश वर्मा मैदान में उतरे और जीत हासिल की। पर 2007 में टिकट वितरण को लेकर सपा में उनकी ऐसी खटकी कि उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी बना ली और मसौली से राकेश वर्मा को चुनाव मैदान में उतारा पर वह हार गए। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और 2012 में जिले की सभी सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी उतारे।

उनमें से उन्होंने अपने बेटे राकेश वर्मा को दरियाबाद से चुनाव लड़ाया पर उन्हें शिकस्त मिली। इस बीच बेनी बाबू कैसरगंज से दो बार सपा से सांसद बने और कांग्रेस से गाेंडा से जीते। उतार चढ़ाव भरी राजनीति के बीच वह 2016 में फिर सपा में लौट आए। राज्यसभा सदस्य बने। इस दौरान बेटे को अरविंद सिंह गोप के खिलाफ रामनगर से टिकट दिलाना चाहते थे पर सफल नहीं हुए।


राकेश को भाजपा से लड़ाने की पूरी तैयारी की पर ऐन वक्त पर बात बिगड़ गई। मामला कुछ भी हो पर जिले ही नहीं प्रदेश में अपनी अलग पहचान बनाने वाले बेनी बाबू के लिए 2017 का चुनाव ऐसा होगा जिसमें वह दूसरे की हार जीत की गणित भले फिट करें पर सीधे तौर पर यह पहला मौका होगा जब इस परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में नहीं उतरा है।
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