{"_id":"690e438ee838a286990cb14b","slug":"durga-found-employment-in-the-thread-of-millat-barabanki-news-c-315-slko1012-151333-2025-11-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Barabanki News: मिल्लत के धागे में दुर्गा ने खोज लिया रोजगार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Barabanki News: मिल्लत के धागे में दुर्गा ने खोज लिया रोजगार
Sat, 08 Nov 2025 12:37 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Sat, 08 Nov 2025 12:37 AM IST
विज्ञापन
कोटवाधाम। सतनामी संप्रदाय के आदि प्रवर्तक समर्थ स्वामी जगजीवन साहब की तपोस्थली श्रीकोटवाधाम तीर्थ के मिल्लत के धागे की अपनी अलग पहचान है। यह धागा लोगों को जोड़े रखने और बुराइयों को त्यागने का बल प्रदान करता है। मिल्लत के धागे को बेचकर सैकड़ों लोगों की जीविका चलती है। इनमें एक नाम है जैदपुर कस्बे की मूल निवासी दुर्गा देवी का।
दुर्गा जगजीवन साहब की भक्त हैं। मेले में जमीन पर तिरपाल बिछाकर सतनामी धागा बनाती और बेचती हैं। धागे के प्रति इनका उत्साह देखते ही बनता है। किसी श्रद्धालु के पास यदि धागा खरीदने के लिए पैसा न हो तो भी वह उसे धागा देने से मना नहीं करतीं।
दुर्गा का कहना है कि जगजीवन साहब के इस धागे की शक्ति अलौकिक है। धागा बांधकर नशा न करने का संकल्प लेने वाले लाखों श्रद्धालु आते हैं। कोई नशा छोड़ देता है तो कोई धागा पहनकर शुद्ध शाकाहारी हो जाता है। एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष की भावना नहीं रहती। सभी को मिलजुलकर रहने की सीख भी यह धागा देता है। दुर्गा का कहना है कि ऐसे धागे की आस्था से वह स्वयं बंध चुकी हैं। धागा बेचकर परिवार का खर्च आसानी से चल जाता है। तीन बच्चों की पढ़ाई भी हो रही है। (संवाद)
विज्ञापन
विज्ञापन
दुर्गा जगजीवन साहब की भक्त हैं। मेले में जमीन पर तिरपाल बिछाकर सतनामी धागा बनाती और बेचती हैं। धागे के प्रति इनका उत्साह देखते ही बनता है। किसी श्रद्धालु के पास यदि धागा खरीदने के लिए पैसा न हो तो भी वह उसे धागा देने से मना नहीं करतीं।
विज्ञापन
दुर्गा का कहना है कि जगजीवन साहब के इस धागे की शक्ति अलौकिक है। धागा बांधकर नशा न करने का संकल्प लेने वाले लाखों श्रद्धालु आते हैं। कोई नशा छोड़ देता है तो कोई धागा पहनकर शुद्ध शाकाहारी हो जाता है। एक-दूसरे के प्रति राग-द्वेष की भावना नहीं रहती। सभी को मिलजुलकर रहने की सीख भी यह धागा देता है। दुर्गा का कहना है कि ऐसे धागे की आस्था से वह स्वयं बंध चुकी हैं। धागा बेचकर परिवार का खर्च आसानी से चल जाता है। तीन बच्चों की पढ़ाई भी हो रही है। (संवाद)
विज्ञापन