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Barabanki News: खेतों में उगा काला सोना, 4,980 किसान होंगे मालामाल

Fri, 12 Dec 2025 12:27 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी Updated Fri, 12 Dec 2025 12:27 AM IST
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Black gold grows in the fields, 4,980 farmers will become rich
बाराबंकी। बाराबंकी जिले के खेत एक बार फिर काले सोने (अफीम) की खेती से चमक उठे हैं। सरकार द्वारा जारी नई लाइसेंस सूची से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश में अफीम उत्पादन की सबसे बड़ी धुरी अब भी बाराबंकी ही है।इस वर्ष प्रदेश के कुल छह जिलों के 4,980 किसानों को अफीम की खेती की अनुमति मिली है, जिनमें से 4,812 किसान बाराबंकी जिले के हैं। इनमें से 758 किसान चीरा लगाकर अफीम का दूध (लेटेक्स) निकालेंगे। जबकि 4,422 किसान केवल डोडा (फसल का ऊपरी हिस्सा) विभाग को जमा करेंगे। डोडा आधारित लाइसेंस धारकों को कॉन्संट्रेटेड पॉपी स्ट्रॉ (सीपीएस) श्रेणी में रखा जाता है। अफीम निकालने वाले किसानों की तुलना में सीपीएस लाइसेंस धारकों की संख्या काफी अधिक है। यह संकेत देता है कि सरकार नियंत्रित ढंग से उत्पादन बढ़ाना चाहती है, साथ ही चीरा लगाने की पारंपरिक प्रक्रिया से जुड़े जोखिमों को कम रखना चाहती है।
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बोआई पूरी, खेतों में हरी पट्टी दिखने लगी
अफीम की फसल की बोआई नवंबर के अंतिम सप्ताह से दिसंबर के पहले सप्ताह तक की जाती है। इस वर्ष खेतों में बोआई पूरी हो चुकी है और फसल के कोमल अंकुर निकल आए हैं। खेतों में फैली यह हरी पट्टी किसानों की उम्मीदों को और भी हरा-भरा कर रही है। फसल जनवरी तक पूरी बढ़त पकड़ लेती है और मार्च-अप्रैल में दाना पकने पर चीरा लगाने का काम शुरू होता है। इस चीरे से निकलने वाला सफेद दूध ही सूखकर अफीम बनता है।सीपीएस श्रेणी के किसानों को चीरा लगाने की आवश्यकता नहीं होती। वे फसल का पूरा डोडा काटकर सीधे विभाग को सौंप देते हैं। आमतौर पर एक औसत किसान प्रति पाँच ऐरी में एक से 1.25 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर लेता है।
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सबसे अधिक नुकसान बंदरों, मवेशियों और तेज हवा से
अफीम की खेती की वास्तविक स्थिति जानने के लिए हरख ब्लॉक के भगवानपुर गांव का रुख किया गया, जहां कई दशकों से अफीम की खेती होती आ रही है। यहां किसान सुरेंद्र अपनी पत्नी के साथ खेत में खरपतवार निकालते मिले। सुरेंद्र बताते हैं कि इस फसल को सबसे अधिक नुकसान बंदरों, मवेशियों और तेज हवा से होता है। कई बार रात में मवेशी खेतों में घुस आते हैं। मवेशियों से बचाव के लिए किसान खेतों के चारों ओर बाड़ लगाते हैं। कई स्थानों पर झटका मशीन (इलेक्ट्रिक फेंसिंग) भी लगाई जाती है। कई किसानों ने बताया कि यह फसल जितनी कीमती है, उसकी रखवाली उतनी ही कठिन है।
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