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Barabanki News: सांसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाती है भागवत कथा
Sun, 07 Jun 2026 01:10 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Sun, 07 Jun 2026 01:10 AM IST
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बाराबंकी। विश्राम धर्मशाला में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में जैसे ही कथा का प्रवाह शुरू होता है, वातावरण में केवल शब्द नहीं गूंजते, बल्कि भक्ति, वैराग्य और आत्मचिंतन की सूक्ष्म तरंगें उपस्थित जनमानस को भीतर तक स्पर्श करती हैं। विश्राम धर्मशाला शहर की मुख्य बाजार में स्थित है, इससे प्रवचन के गूंजते स्वर बाजार आने वाले लोगों को भी आध्यात्म की सुखद अनभूति करा रहा है।
कथा व्यास पंडित राजेश मिश्रा ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल श्रवण की परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का दिव्य माध्यम है। जब मनुष्य इस कथा का चिंतन, मनन और श्रद्धापूर्वक अनुसरण करता है, तो उसके भीतर संचित विकार क्षीण होने लगते हैं और जीवन में सात्त्विकता का उदय होता है।
भागवत कथा का प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परम सत्य की अनुभूति है। जब मनुष्य अपने भीतर झांकना प्रारंभ करता है, तभी उसे यह बोध होता है कि ईश्वर किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि उसकी ही चेतना में विद्यमान है।
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कथा केवल श्रवण नहीं, बल्कि एक आंतरिक यात्रा है जहां मन सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर भक्ति के प्रवाह में प्रवाहित होने लगता है। पंडित राजेश मिश्रा ने यह भी कहा कि यदि मनुष्य अपने दैनिक जीवन में सत्य, करुणा, सेवा और समर्पण धारण कर ले तो उसका जीवन स्वयं ही एक साधना बन जाता है।
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कथा व्यास पंडित राजेश मिश्रा ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल श्रवण की परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का दिव्य माध्यम है। जब मनुष्य इस कथा का चिंतन, मनन और श्रद्धापूर्वक अनुसरण करता है, तो उसके भीतर संचित विकार क्षीण होने लगते हैं और जीवन में सात्त्विकता का उदय होता है।
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भागवत कथा का प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परम सत्य की अनुभूति है। जब मनुष्य अपने भीतर झांकना प्रारंभ करता है, तभी उसे यह बोध होता है कि ईश्वर किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि उसकी ही चेतना में विद्यमान है।
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कथा केवल श्रवण नहीं, बल्कि एक आंतरिक यात्रा है जहां मन सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर भक्ति के प्रवाह में प्रवाहित होने लगता है। पंडित राजेश मिश्रा ने यह भी कहा कि यदि मनुष्य अपने दैनिक जीवन में सत्य, करुणा, सेवा और समर्पण धारण कर ले तो उसका जीवन स्वयं ही एक साधना बन जाता है।