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बाराबंकी पहली बार चुनेगा महिला अध्यक्ष
बाराबंकी
Updated Tue, 28 Nov 2017 11:28 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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नगर पालिका परिषद नवाबगंज के अध्यक्ष पद की कुर्सी पर पहली बार महिला प्रत्याशी विराजमान होगी। शहर कल महिला अध्यक्ष के चुनने के लिए एक लाख 46 हजार शहरी वोटर इस ऐतिहासिक पल के गवाह बनेगें। 21 प्रत्याशी चुनाव मैदान में अपना भाग्य आजमा रही हैं। सभी प्रमुख दलों ने अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतार कर मुकाबले को काफी रोचक बना दिया है।
चुनाव मैदान उतरी उम्मीदवारों के पति और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अध्यक्ष की कुर्सी किसे मिलेगी, यह तो परिणाम आने पर ही पता चलेगा पर इतना तय है कि आजादी के बाद पहली बार शहर की नुमाइंदगी महिला के हाथों में होनी तय है।
आजादी से लेकर आज तक नगर पालिका के अध्यक्ष पद की कुर्सी पर भले ही एक से एक नामचीन लोगों ने बैठकर जनता की सेवा की हो किंतु अभी तक आधी आबादी को यहां तक पहुंचने का मौका नहीं मिला। पहली बार बाराबंकी शहर की बागडोर महिला संभालने जा रही हैं।
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शहर का विस्तार भी हुआ, विकास भी हुआ और शहर का मिजाज भी बदला। शहर में सदासुख की लस्सी न ही घंटाघर के मुन्ना के खस्ता और न तो पंडित जी के मटर की चर्चा होती है। टंडन की कचौड़ियों की जगह अब बाटी चोखा से लेकर पिज्जा लेने लगा है। छाया चौराहे पर चाट के ठेले कम, मोमोज की भीड़ शहर के बदलते परिवेश की तस्वीर पेश कर रहे हैं।
चुनाव का जायका कुछ इसी तरह बदला है लोग अब राजनीति में दूसरों से ज्यादा अपनों पर भरोसा कर दांव लगा रहे हैं। आजादी के बाद पहली बार महिला के लिए आरक्षित सीट पर घर की चौखट लांघकर यहां तक महिला का पहुंचना तय है। इस ऐतिहासिक पल में अपनी भूमिका अदा करने के लिए शहर के एक लाख 46 हजार अपने मताधिकार का प्रयोग करेगें।
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चुनाव मैदान उतरी उम्मीदवारों के पति और पार्टी के कई दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। अध्यक्ष की कुर्सी किसे मिलेगी, यह तो परिणाम आने पर ही पता चलेगा पर इतना तय है कि आजादी के बाद पहली बार शहर की नुमाइंदगी महिला के हाथों में होनी तय है।
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आजादी से लेकर आज तक नगर पालिका के अध्यक्ष पद की कुर्सी पर भले ही एक से एक नामचीन लोगों ने बैठकर जनता की सेवा की हो किंतु अभी तक आधी आबादी को यहां तक पहुंचने का मौका नहीं मिला। पहली बार बाराबंकी शहर की बागडोर महिला संभालने जा रही हैं।
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शहर का विस्तार भी हुआ, विकास भी हुआ और शहर का मिजाज भी बदला। शहर में सदासुख की लस्सी न ही घंटाघर के मुन्ना के खस्ता और न तो पंडित जी के मटर की चर्चा होती है। टंडन की कचौड़ियों की जगह अब बाटी चोखा से लेकर पिज्जा लेने लगा है। छाया चौराहे पर चाट के ठेले कम, मोमोज की भीड़ शहर के बदलते परिवेश की तस्वीर पेश कर रहे हैं।
चुनाव का जायका कुछ इसी तरह बदला है लोग अब राजनीति में दूसरों से ज्यादा अपनों पर भरोसा कर दांव लगा रहे हैं। आजादी के बाद पहली बार महिला के लिए आरक्षित सीट पर घर की चौखट लांघकर यहां तक महिला का पहुंचना तय है। इस ऐतिहासिक पल में अपनी भूमिका अदा करने के लिए शहर के एक लाख 46 हजार अपने मताधिकार का प्रयोग करेगें।