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बकस्वाहा जंगल बचाने की मुहिम में कूदे महिलाएं और बच्चे
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बकस्वाहा जंगल बचाने को तख्तियां लेकर प्रदर्शन करते स्थानीय बच्चे। विज्ञप्ति
- फोटो : BANDA
बांदा। बुंदेलखंड का बकस्वाहा जंगल बचाने के लिए चल रही जद्दोजहद में पर्यावरण पैरोकारों ने दो टूक शब्दों में खबरदार किया है कि किसी भी हाल में पेड़ नहीं कटने देंगे। रात-दिन पेड़ों से चिपके रहेंगे। पर्यावरण के पैरोकारों ने जंगल के पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधे और अपने खून से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखे। बच्चे और महिलाएं भी बड़ी तादाद में शामिल हुए।
बकस्वाहा जंगल बचाने के ताजा तीन दिवसीय अभियान के अंतिम दिन पर्यावरण प्रेमियों का जत्था भीमकुंड पहुंचा। यहां के महिला पुरुष आदिवासियों के साथ बैठक की। ग्रामीणों ने एक स्वर से कहा कि जंगल से ही उनकी रोजी रोटी है। ये कट गए तो वह कहां जाएंगे? पर्यावरण प्रेमियों ने भरोसा दिलाया कि वह उनके साथ हैं।
अभियान के तहत कार्यकर्ताओं ने पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधे और उनसे चिपककर संदेश दिया कि पेड़ काटे गए तो हजारों पर्यावरण प्रेमी इसी तरह दिन-रात पेड़ों से चिपके रहकर कटने नहीं देंगे। बच्चों ने भी हाथों में तख्तियां लेकर पेड़ काटने का विरोध जताया और नारे लगाए। अगुवाई ईश्वर चतुर्वेदी ने की। पर्यावरण पैरोकार डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने ग्रामीणों से कहा कि उन्हें रोजगार से जोड़ने की नीति पर वह रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।
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पौधरोपण के साथ पेड़ बचाने का संदेश
तीन दिनी अभियान में शामिल बिहार से आईं समाजसेविका और दीदी जी फाउंडेशन संस्थान संस्थापक डॉ. नम्रता आनंद सहित अन्य पर्यावरण प्रेमियों ने स्थानीय आदिवासी महिलाओं के साथ पौधरोपण किया। उन्हें समझाया कि ये पेड़ उनकी संस्कृति की धरोहर हैं। इन्हें बचा लिया तो सब पेड़ बच जाएंगे। डॉ. नम्रता ने भरोसा दिलाया कि जंगल बचाओ अभियान में वह पूरा साथ निभाएंगी।
जंगल में निकाला शांति मार्च
तीन दिवसीय अभियान में पर्यावरण पैरोकारों ने बकस्वाहा जंगल में शांति मार्च निकाला। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अपने खून से पत्र लिखे। पर्यावरण पैरोकारों ने कहा कि हमें हीरा नहीं, हरियाली चाहिए।
डॉ. धर्मेंद्र ने किया नेतृत्व
शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राजीव जैन (भोपाल) ने बताया कि तीन दिवसीय कार्यक्रम बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान और पीपल, नीम, तुलसी संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में किया गया। इसमें अंकित कुमार गांधी (छतरपुर), पवन राजावत, राकेश दीक्षित (बार काउंसिल अध्यक्ष, छतरपुर), राजेश यादव (बकस्वाहा), आनंद पटेल (भोपाल), राजेंद्र कुमार (झांसी), ओम प्रकाश पांचाल (सिहोर), डॉ. अभिषेक खरे (पन्ना), दिनेश द्विवेदी, डॉ. कुसुम कश्यप, अश्विनी दुबे (भोपाल), अनुराग विश्नोई (पंजाब), रामबाबू तिवारी (बांदा), नीलय पांडेय, देवेंद्र कुशवाहा, बाबी तिवारी आदि शामिल रहे।
हीरा खदान से छिनेगा हजारों का रोजगार
बांदा। तीन दिवसीय अभियान के दौरान बकस्वाहा में बच्चों ने भी तख्तियां लेकर पेड़ काटने का विरोध किया। स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर नारे लगाए। उधर, सीमा चौहान (जिला मातृ शक्ति, सिवनी) ने कहा कि जंगल बचाने के लिए हम हर हद तक जाएंगे। वृक्ष मित्र सुनील दुबे ने कहा कि जंगल से भूमिहीन परिवारों का रोजगार चल रहा है। जिनकी तादाद हजारों में है। हीरा कंपनी तो सिर्फ 400 लोगों को रोजगार देने की बात कह रही है। श्रद्धा चौहान (मातृ शक्ति, टीकमगढ़) ने कहा कि कुछ असामाजिक तत्व हमारे अभियान में बाधा डाल रहे हैं। हम सभी महिलाएं शपथ लेतीं हैं कि जंगल नहीं कटने देंगे।
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बकस्वाहा जंगल बचाने के ताजा तीन दिवसीय अभियान के अंतिम दिन पर्यावरण प्रेमियों का जत्था भीमकुंड पहुंचा। यहां के महिला पुरुष आदिवासियों के साथ बैठक की। ग्रामीणों ने एक स्वर से कहा कि जंगल से ही उनकी रोजी रोटी है। ये कट गए तो वह कहां जाएंगे? पर्यावरण प्रेमियों ने भरोसा दिलाया कि वह उनके साथ हैं।
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अभियान के तहत कार्यकर्ताओं ने पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधे और उनसे चिपककर संदेश दिया कि पेड़ काटे गए तो हजारों पर्यावरण प्रेमी इसी तरह दिन-रात पेड़ों से चिपके रहकर कटने नहीं देंगे। बच्चों ने भी हाथों में तख्तियां लेकर पेड़ काटने का विरोध जताया और नारे लगाए। अगुवाई ईश्वर चतुर्वेदी ने की। पर्यावरण पैरोकार डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने ग्रामीणों से कहा कि उन्हें रोजगार से जोड़ने की नीति पर वह रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।
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पौधरोपण के साथ पेड़ बचाने का संदेश
तीन दिनी अभियान में शामिल बिहार से आईं समाजसेविका और दीदी जी फाउंडेशन संस्थान संस्थापक डॉ. नम्रता आनंद सहित अन्य पर्यावरण प्रेमियों ने स्थानीय आदिवासी महिलाओं के साथ पौधरोपण किया। उन्हें समझाया कि ये पेड़ उनकी संस्कृति की धरोहर हैं। इन्हें बचा लिया तो सब पेड़ बच जाएंगे। डॉ. नम्रता ने भरोसा दिलाया कि जंगल बचाओ अभियान में वह पूरा साथ निभाएंगी।
जंगल में निकाला शांति मार्च
तीन दिवसीय अभियान में पर्यावरण पैरोकारों ने बकस्वाहा जंगल में शांति मार्च निकाला। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अपने खून से पत्र लिखे। पर्यावरण पैरोकारों ने कहा कि हमें हीरा नहीं, हरियाली चाहिए।
डॉ. धर्मेंद्र ने किया नेतृत्व
शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राजीव जैन (भोपाल) ने बताया कि तीन दिवसीय कार्यक्रम बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान और पीपल, नीम, तुलसी संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में किया गया। इसमें अंकित कुमार गांधी (छतरपुर), पवन राजावत, राकेश दीक्षित (बार काउंसिल अध्यक्ष, छतरपुर), राजेश यादव (बकस्वाहा), आनंद पटेल (भोपाल), राजेंद्र कुमार (झांसी), ओम प्रकाश पांचाल (सिहोर), डॉ. अभिषेक खरे (पन्ना), दिनेश द्विवेदी, डॉ. कुसुम कश्यप, अश्विनी दुबे (भोपाल), अनुराग विश्नोई (पंजाब), रामबाबू तिवारी (बांदा), नीलय पांडेय, देवेंद्र कुशवाहा, बाबी तिवारी आदि शामिल रहे।
हीरा खदान से छिनेगा हजारों का रोजगार
बांदा। तीन दिवसीय अभियान के दौरान बकस्वाहा में बच्चों ने भी तख्तियां लेकर पेड़ काटने का विरोध किया। स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर नारे लगाए। उधर, सीमा चौहान (जिला मातृ शक्ति, सिवनी) ने कहा कि जंगल बचाने के लिए हम हर हद तक जाएंगे। वृक्ष मित्र सुनील दुबे ने कहा कि जंगल से भूमिहीन परिवारों का रोजगार चल रहा है। जिनकी तादाद हजारों में है। हीरा कंपनी तो सिर्फ 400 लोगों को रोजगार देने की बात कह रही है। श्रद्धा चौहान (मातृ शक्ति, टीकमगढ़) ने कहा कि कुछ असामाजिक तत्व हमारे अभियान में बाधा डाल रहे हैं। हम सभी महिलाएं शपथ लेतीं हैं कि जंगल नहीं कटने देंगे।

बकस्वाहा की आदिवासी महिलाओं से बात करतीं पर्यावरण पैरोकार डॉ. नम्रता आनंद। विज्ञप्ति - फोटो : BANDA

जंगल और पर्यावरण बचाने के लिए बकस्वाहा में अलख जगाते बच्चे। विज्ञप्ति - फोटो : BANDA