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महानगरों से लौट रहे मंडल के दो लाख लोग बने चुनौती
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बांदा। 45 लाख से ज्यादा आबादी वाले चित्रकूटधाम मंडल में रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों को पलायन कर गए 2 लाख से ज्यादा लोग कोरोना महामारी के बाद तेजी से लौट रहे हैं, लेकिन लॉक डाउन श्रेणी में आ चुके मंडल के इकलौते राजकीय एलोपैथिक मेडिकल कालेज में आईसीयू (इंसिटव केयर यूनिट) और वेंटीलेटर जैसी आवश्यक सेवाएं भी चालू नहीं हैं। ऐसे में कोरोना संक्रमण के संभावित मरीज को जुकाम, खांसी के मामूली प्राथमिक उपचार के बाद रेफर किया जाना मजबूरी है।
चित्रकूटधाम मंडल के चारों जिलों की जनसंख्या 45 लाख से भी ज्यादा का आंकड़ा पार कर चुकी है। कुपोषण और मौसम की मार से होने वाली बीमारियां यहां लगभग पूरे वर्ष बुंदेलियों को जकड़े रहती हैं। उधर, रोजी रोटी की तलाश में मंडल के लाखों युवक, पुरुष और महिलाएं मुंबई, सूरत, दिल्ली आदि महानगरों को हर वर्ष पलायन करते हैं। प्रदेश के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दो लाख से ज्यादा लोग पलायन किए हुए हैं, जबकि असली संख्या इससे काफी ज्यादा है।
कोरोना महामारी के बाद यह सभी पलायित मजदूर यहां अपने घरों को लौट रहे हैं। सरकारी अभिलेखों और आंकड़ों में भले ही स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त बताई जा रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत हैं। मंडल मुख्यालय बांदा में इकलौता मेडिकल कालेज बसपा सरकार में स्वीकृत हुआ था। उसके बाद सपा सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया। भाजपा की मौजूदा सरकार को भी तीन वर्ष बीत गए, लेकिन मेडिकल कालेज पूरी क्षमता से चालू नहीं हो सका। मंडल के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा।
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मौजूदा समय में कोरोना महामारी को लेकर बड़ी संख्या में पलायित मजदूर लौट रहे है। इनमें अधिकांश में खांसी, जुकाम, बुखार के लक्षण हैं। मात्र मेडिकल कालेज में इसके लिए आइसोलेशन वार्ड बनाया गया है, लेकिन आईसीयू और वेंटीलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं हैं।
मेडिकल कालेज में इसके उपकरण और कक्ष सुसज्जित हैं, लेकिन चिकित्सक और स्टाफ नहीं है, जबकि कोरोना के संभावित मरीज के लिए वेंटीलेटर बेहद जरूरी है। उसे श्वांस की समस्या होती है। मौजूदा परिस्थितियों में भी प्रदेश सरकार और सत्तारूढ़ दल के नुमाइंदे इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आ रहे, वरना मुख्यमंत्री और शासन स्तर पर प्रयास और पैरवी करके पर्याप्त स्टाफ की तैनाती कर इन्हें चालू करा सकते हैं।
12 डाक्टर की तत्काल जरूरत
बांदा। मंडल के एकमात्र मेडिकल कालेज में आईसीयू और वेंटीलेटर सुविधाएं चालू करने के लिए करीब 12 डाक्टर और स्टाफ की तत्काल जरूरत है। हालत यह है कि मेडिकल कालेज में गंभीर मरीज को बेहोश करने के लिए विशेषज्ञ एनेस्थीसिया चिकित्सक तक नहीं है। इस बाबत मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य डॉ. मुकेश यादव का कहना है कि आईसीयू और वेंटीलेंटर चालू करने के लिए फौरीतौर पर कम से कम 4 असिस्टेंट प्रोफेसर, 4 एसोसिएट प्रोफेसर, 4 डाक्टर तथा ट्रेंड स्टाफ नर्स एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की फौरी जरूरत है।
बिना साजोसामान डाक्टर जोखिम के बीच कर रहे जांच
बांदा। कोरोना महामारी के संभावित मरीजों की जोखिम भरी जांच में रात-दिन जुटे डाक्टरों की फौज बिना साजोसामान है। उनको न तो सर्जिकल मॉस्क उपलब्ध कराए गए हैं न ही सैनिटाइजर। मेडिकल कालेज या सरकारी अस्पतालों अथवा प्राइवेट नर्सिंगहोम। सभी के डाक्टर और नर्सिंग स्टाफ इस जोखिमभरी स्थितियों से जूझ रहा है।
अक्सर कुछ डाक्टर खुद भयभीत हो रहे हैं। निजी क्षेत्र के डाक्टरों का कहना है कि बाजार में भी मॉस्क और सैनिटाइजर का टोटा है। सरकार ने इन वस्तुओं को आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल तो कर लिया, लेकिन उपलब्धता का कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। मुफ्त तो दरकिनार रियायती दरों पर भी ये दोनों नहीं मिल रहे हैं।
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चित्रकूटधाम मंडल के चारों जिलों की जनसंख्या 45 लाख से भी ज्यादा का आंकड़ा पार कर चुकी है। कुपोषण और मौसम की मार से होने वाली बीमारियां यहां लगभग पूरे वर्ष बुंदेलियों को जकड़े रहती हैं। उधर, रोजी रोटी की तलाश में मंडल के लाखों युवक, पुरुष और महिलाएं मुंबई, सूरत, दिल्ली आदि महानगरों को हर वर्ष पलायन करते हैं। प्रदेश के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दो लाख से ज्यादा लोग पलायन किए हुए हैं, जबकि असली संख्या इससे काफी ज्यादा है।
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कोरोना महामारी के बाद यह सभी पलायित मजदूर यहां अपने घरों को लौट रहे हैं। सरकारी अभिलेखों और आंकड़ों में भले ही स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त बताई जा रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत हैं। मंडल मुख्यालय बांदा में इकलौता मेडिकल कालेज बसपा सरकार में स्वीकृत हुआ था। उसके बाद सपा सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया। भाजपा की मौजूदा सरकार को भी तीन वर्ष बीत गए, लेकिन मेडिकल कालेज पूरी क्षमता से चालू नहीं हो सका। मंडल के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा।
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मौजूदा समय में कोरोना महामारी को लेकर बड़ी संख्या में पलायित मजदूर लौट रहे है। इनमें अधिकांश में खांसी, जुकाम, बुखार के लक्षण हैं। मात्र मेडिकल कालेज में इसके लिए आइसोलेशन वार्ड बनाया गया है, लेकिन आईसीयू और वेंटीलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं हैं।
मेडिकल कालेज में इसके उपकरण और कक्ष सुसज्जित हैं, लेकिन चिकित्सक और स्टाफ नहीं है, जबकि कोरोना के संभावित मरीज के लिए वेंटीलेटर बेहद जरूरी है। उसे श्वांस की समस्या होती है। मौजूदा परिस्थितियों में भी प्रदेश सरकार और सत्तारूढ़ दल के नुमाइंदे इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आ रहे, वरना मुख्यमंत्री और शासन स्तर पर प्रयास और पैरवी करके पर्याप्त स्टाफ की तैनाती कर इन्हें चालू करा सकते हैं।
12 डाक्टर की तत्काल जरूरत
बांदा। मंडल के एकमात्र मेडिकल कालेज में आईसीयू और वेंटीलेटर सुविधाएं चालू करने के लिए करीब 12 डाक्टर और स्टाफ की तत्काल जरूरत है। हालत यह है कि मेडिकल कालेज में गंभीर मरीज को बेहोश करने के लिए विशेषज्ञ एनेस्थीसिया चिकित्सक तक नहीं है। इस बाबत मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य डॉ. मुकेश यादव का कहना है कि आईसीयू और वेंटीलेंटर चालू करने के लिए फौरीतौर पर कम से कम 4 असिस्टेंट प्रोफेसर, 4 एसोसिएट प्रोफेसर, 4 डाक्टर तथा ट्रेंड स्टाफ नर्स एनेस्थीसिया विशेषज्ञ की फौरी जरूरत है।
बिना साजोसामान डाक्टर जोखिम के बीच कर रहे जांच
बांदा। कोरोना महामारी के संभावित मरीजों की जोखिम भरी जांच में रात-दिन जुटे डाक्टरों की फौज बिना साजोसामान है। उनको न तो सर्जिकल मॉस्क उपलब्ध कराए गए हैं न ही सैनिटाइजर। मेडिकल कालेज या सरकारी अस्पतालों अथवा प्राइवेट नर्सिंगहोम। सभी के डाक्टर और नर्सिंग स्टाफ इस जोखिमभरी स्थितियों से जूझ रहा है।
अक्सर कुछ डाक्टर खुद भयभीत हो रहे हैं। निजी क्षेत्र के डाक्टरों का कहना है कि बाजार में भी मॉस्क और सैनिटाइजर का टोटा है। सरकार ने इन वस्तुओं को आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल तो कर लिया, लेकिन उपलब्धता का कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। मुफ्त तो दरकिनार रियायती दरों पर भी ये दोनों नहीं मिल रहे हैं।