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जर्जर जीआईसी के कक्ष की छत धराशायी

Sat, 04 Jul 2020 11:51 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 04 Jul 2020 11:51 PM IST
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The ceiling of a dilapidated GIC dashed
जीआईसी में ढह गई खपरैलदार छत का निरीक्षण करते प्रधानाचार्य। - फोटो : BANDA
बांदा। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों के जमाने में बना मंडल मुख्यालय का जीआईसी भवन अब खतरनाक स्थिति में आ गया है। यह छात्रों और कालेज कर्मचारियों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। जर्जर हो चुके भवन के एक कमरे की छत शुक्रवार की रात बारिश से धराशायी हो गई। रात में कालेज बंद होने से बड़ा हादसा टल गया।
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राजकीय इंटर कालेज (जीआईसी) अंग्रेजों के समय का है। लंबे-चौड़े परिसर में यह भवन आज भी अंग्रेजी खपरैल वाली छत तले चल रहा है। हालांकि इस कालेज से पढ़कर निकले तमाम छात्र राज्य और केंद्र सरकारों में उच्च पदों पर पहुंचे हैं।
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इस भवन की खस्ताहाली करीब कई दशकों से शुरू हो चुकी है। छात्रावास पहले ही धराशायी हो चुका है। खस्ताहाल भवन में कई हजार छात्र और 50 से ज्यादा शिक्षक और शिक्षणेतर कर्मी आते-जाते रहे हैं। आज तक खपरैल हटाकर स्लेब के लिए सरकार ने बजट नहीं दिया। न ही मरम्मत कार्य हुए।
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शुक्रवार की रात हुई बारिश से कालेज के कक्ष संख्या-12 की छत धराशायी हो गई। लकड़ी के ढांचे और अंग्रेजी खपरों की छत पहले से ही खस्ताहाल थी। कक्षों की दीवारों में जगह-जगह दरारें हैं। गनीमत यह रही कि कालेज बंद होने के समय रात में यह हादसा हुआ।
प्रधानाचार्य ब्रजराज सिंह यादव ने बताया कि पूरा विद्यालय भवन जर्जर है। यहां कक्षाओं का संचालन या शिक्षकों का बैठना खतरे से खाली नहीं है। दोनों तरफ गैलरी की छतें टपक रही हैं। सभी दीवारों में सीलन है। विद्यालय इस भवन में वर्ष 1874 से चल रहा है। प्रधानाचार्य ने बताया कि मौजूदा समय कालेज दो शिफ्टों में चलता है।

सुबह 7 से शाम 5 बजे तक कक्षाएं लगती हैं। भवन का पुनर्निर्माण बहुत जरूरी है। प्रधानाचार्य ने आशंका जताई कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इस बाबत जिला विद्यालय निरीक्षक विनोद सिंह का कहना था कि अब छत धराशायी होने पर उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा रहा है। एस्टीमेट आदि की प्रक्रिया की जा रही है।
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