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जोखिम में बसर कर रहे हैं रेल सुरक्षा बल कर्मी
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बांदा में जीआरपी जवानों की जर्जर बैरक।
- फोटो : BANDA
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जीआरपी व आरपीएफ आरक्षियों के लिए विभागीय आवासों का जबरदस्त टोटाहै। 78 आरक्षियों के बीच सिर्फ 16 आवास हैं। चार दर्जन से अधिक जवान अंग्रेजों के जमाने में बनी टिनशेड वाली खस्ताहाल बैरक में रहने को मजबूर हैं। कुछ आरक्षी शहर में किराये के मकान रह रहे हैं।
जीआरपी में थानाध्यक्ष व एसआई समेत 45 जवानों का स्टाफ है, लेकिन विभागीय आवास कुल सात हैं। एक दर्जन सिपाही वर्ष 1818 में बनी सीमेंट के चादर की छत वाली बैरक में बसर कर रहे हैं। बारिश में टूटे टिनों से पानी गिरता है।
अक्सर उनके टुकड़े जवानों पर आकर गिरते हैं। बैरक के पास बाउंड्री भी नहीं है। किचन शेड ध्वस्त हो जाने से खुले में खाना पकाया जाता है। कुएं में लगा सबमर्सिबल खराब पड़ा है। वर्षों से बैरक की मरम्मत व पुताई नहीं कराई गई है।
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कमोवेश यही स्थिति आरपीएफ की है। 33 कर्मियों के बीच नौ आवास हैं। डेढ़ दर्जन जवान अंग्रेजी जमाने में बनी जर्जर बैरक में रह रहे हैं। नाले का पानी जर्जर दीवारों से होकर अंदर प्रवेश कर जाता है। जवानों व उनके परिजनों को रेलवे ट्रक से होकर गुजरना पड़ता है। हर समय हादसे का खतरा बना रहता है।
सिपाहियों ने बताया कि कई बार कालोनियों व बैरक की मरम्मत व रास्ता बनवाने के लिए अधिकारियों से कहा गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कई जवान चार से पांच हजार रुपये मासिक किराये के मकानों में रह रहे हैं। जबकि मकान भत्ता मात्र 1200 रुपये मिलता है। जीआरपी इंस्पेक्टर रामबरन सिंह का कहना है कि बैरक के निर्माण का प्रस्ताव भेजा गया था। कमांडेंट (झांसी) के समक्ष कार्यालय में लंबित है।
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जीआरपी में थानाध्यक्ष व एसआई समेत 45 जवानों का स्टाफ है, लेकिन विभागीय आवास कुल सात हैं। एक दर्जन सिपाही वर्ष 1818 में बनी सीमेंट के चादर की छत वाली बैरक में बसर कर रहे हैं। बारिश में टूटे टिनों से पानी गिरता है।
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अक्सर उनके टुकड़े जवानों पर आकर गिरते हैं। बैरक के पास बाउंड्री भी नहीं है। किचन शेड ध्वस्त हो जाने से खुले में खाना पकाया जाता है। कुएं में लगा सबमर्सिबल खराब पड़ा है। वर्षों से बैरक की मरम्मत व पुताई नहीं कराई गई है।
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कमोवेश यही स्थिति आरपीएफ की है। 33 कर्मियों के बीच नौ आवास हैं। डेढ़ दर्जन जवान अंग्रेजी जमाने में बनी जर्जर बैरक में रह रहे हैं। नाले का पानी जर्जर दीवारों से होकर अंदर प्रवेश कर जाता है। जवानों व उनके परिजनों को रेलवे ट्रक से होकर गुजरना पड़ता है। हर समय हादसे का खतरा बना रहता है।
सिपाहियों ने बताया कि कई बार कालोनियों व बैरक की मरम्मत व रास्ता बनवाने के लिए अधिकारियों से कहा गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कई जवान चार से पांच हजार रुपये मासिक किराये के मकानों में रह रहे हैं। जबकि मकान भत्ता मात्र 1200 रुपये मिलता है। जीआरपी इंस्पेक्टर रामबरन सिंह का कहना है कि बैरक के निर्माण का प्रस्ताव भेजा गया था। कमांडेंट (झांसी) के समक्ष कार्यालय में लंबित है।