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कोरोना काल में घातक साबित हो सकता है आतिशबाजी का प्रदूषण
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डा.एसडी त्रिपाठी।
- फोटो : BANDA
बांदा। कोरोना ने दीपावली पर आतिशबाजी को इस वर्ष ज्यादा खतरनाक बना दिया है। ऐसे में हमें आतिशबाजी के चयन और उपयोग में काफी सतर्कता बरतनी पड़ेगी। दीपावली पर आतिशबाजी के धमाके और धुआं पर्यावरण में 30 एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) तक बढ़ा देते हैं।
संक्रमण के दौर में यह काफी घातक साबित हो सकता है। पर्यावरण प्रदूषण विभाग के मुताबिक इस समय एक्यूआई का पैमाना लगभग 145 है, जबकि दीपावली में आतिशबाजी के बाद यह बढ़कर 185 तक पहुंच जाता है।
आतिशबाजी का बारूद और धुआं हवा में मिल जाता है। सांस के जरिये फेफड़ों तक पहुंच जाता है। ऐसे में ऑक्सीजन पहुंचने में दिक्कत होती है। दिल की गति (हार्ट बीट) भी बढ़ जाती है।
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इससे दिल का दौरा पड़ने का खतरा हो जाता है। कोरोना संक्रमण काल में कोरोना पॉजिटिव मरीजों के फेफड़े और दिल कमजोर हो गए हैं। उनके लिए आतिशबाजी का प्रदूषण जानलेवा साबित हो सकता है। लोगों को इसका ध्यान रखना चाहिए। -डॉ. एसडी त्रिपाठी, फिजीशियन, जिला अस्पताल, बांदा।
आंखों के लिए नुकसानदायक है बारूद
बारूद आंखों के लिए बेहद नुकसानदेह है। इससे आंखों में जलन, लाल होना और पानी आने की समस्या पैदा हो जाती है। इसके अलावा तेज आवाज के धमाकों से कान के पर्दों को नुकसान पर्दा फटने का खतरा रहता है।
व्यक्ति के सुनने की क्षमता कम हो जाती है। पटाखों के धमाकों से 100 डिसेबिल तक ध्वनि प्रदूषण होता है, जबकि कानों की क्षमता 80 डिसेबिल है। इसके ऊपर ध्वनि प्रदूषण से कान में सनसनाहट या बहरापन हो सकता है। -डॉ. मुकेश रस्तोगी, कान-नाक-गला रोग विशेषज्ञ, बांदा।
दीपावली पर सर्वाधिक सर्वाधिक प्रदूषण आतिशबाजी से होता है। इसमें पर्यावरण और ध्वनि दोनों ही प्रदूषण शामिल है। पर्यावरण में प्रदूषण का पैमाना 210 एक्यूआई तक पहुंचने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसे में फव्वारों से वातावरण में पानी की छिड़काव जरूरी है।
दीपावली के मद्देनजर फायर ब्रिगेड को भी सूचना दी गई है। आतिशबाजी के धुओं से वायु गुणवत्ता सूचकांक में वृद्धि होगी। जिन इलाकों में प्रदूषण ज्यादा हो वहां फव्वारों से पानी का छिड़काव होना चाहिए।-धनश्याम दत्त, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, बांदा।
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संक्रमण के दौर में यह काफी घातक साबित हो सकता है। पर्यावरण प्रदूषण विभाग के मुताबिक इस समय एक्यूआई का पैमाना लगभग 145 है, जबकि दीपावली में आतिशबाजी के बाद यह बढ़कर 185 तक पहुंच जाता है।
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आतिशबाजी का बारूद और धुआं हवा में मिल जाता है। सांस के जरिये फेफड़ों तक पहुंच जाता है। ऐसे में ऑक्सीजन पहुंचने में दिक्कत होती है। दिल की गति (हार्ट बीट) भी बढ़ जाती है।
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इससे दिल का दौरा पड़ने का खतरा हो जाता है। कोरोना संक्रमण काल में कोरोना पॉजिटिव मरीजों के फेफड़े और दिल कमजोर हो गए हैं। उनके लिए आतिशबाजी का प्रदूषण जानलेवा साबित हो सकता है। लोगों को इसका ध्यान रखना चाहिए। -डॉ. एसडी त्रिपाठी, फिजीशियन, जिला अस्पताल, बांदा।
आंखों के लिए नुकसानदायक है बारूद
बारूद आंखों के लिए बेहद नुकसानदेह है। इससे आंखों में जलन, लाल होना और पानी आने की समस्या पैदा हो जाती है। इसके अलावा तेज आवाज के धमाकों से कान के पर्दों को नुकसान पर्दा फटने का खतरा रहता है।
व्यक्ति के सुनने की क्षमता कम हो जाती है। पटाखों के धमाकों से 100 डिसेबिल तक ध्वनि प्रदूषण होता है, जबकि कानों की क्षमता 80 डिसेबिल है। इसके ऊपर ध्वनि प्रदूषण से कान में सनसनाहट या बहरापन हो सकता है। -डॉ. मुकेश रस्तोगी, कान-नाक-गला रोग विशेषज्ञ, बांदा।
दीपावली पर सर्वाधिक सर्वाधिक प्रदूषण आतिशबाजी से होता है। इसमें पर्यावरण और ध्वनि दोनों ही प्रदूषण शामिल है। पर्यावरण में प्रदूषण का पैमाना 210 एक्यूआई तक पहुंचने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसे में फव्वारों से वातावरण में पानी की छिड़काव जरूरी है।
दीपावली के मद्देनजर फायर ब्रिगेड को भी सूचना दी गई है। आतिशबाजी के धुओं से वायु गुणवत्ता सूचकांक में वृद्धि होगी। जिन इलाकों में प्रदूषण ज्यादा हो वहां फव्वारों से पानी का छिड़काव होना चाहिए।-धनश्याम दत्त, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी, बांदा।

डा.मुकेश कुमार।- फोटो : BANDA