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जनक विलाप सुन आंखें नम, ‘नाथ शंभु धनु भंजन हारा, होइहै कोउ एक दास तुम्हारा’
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
Updated Sun, 11 Jan 2015 11:51 PM IST
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खप्टिहा कलां के रपरागंज मोहल्ले में रामलीला के अंतिम दिन धनुष यज्ञ व परशुराम-लक्ष्मण संवाद का मंचन हुआ। जनक विलाप देख दर्शकों की आंखें छलक उठीं। संवाद में अध्यात्म के साथ लोक व्यवहार का संदेश दिया।
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राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह को स्वयंवर रचाया। संकल्प लिया कि जो भगवान शिव के धनुष को तोड़ेगा उसी के साथ पुत्री का विवाह करेंगे। स्वयंवर में बड़े-बड़े राजा आए लेकिन धनुष तोड़ना तो दूर कोई उसे हिला तक नहीं सका। इससे दुखी जनक ने विलाप करते हुए कहा कि लगता है पृथ्वी अब वीरों से खाली हो चुकी है।
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मंच पर जनक का विलाप सुन श्रोता भाव विह्वल हुए। गुरु विश्वामित्र के साथ स्वयंवर में मौजूद श्रीराम ने गुरु का इशारा मिलते ही धनुष तोड़ दिया। पंडाल जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा। इस बीच भगवान शिव का धनुष टूटने से कुपित परशुराम जनकपुरी पहुंचे और धनुष तोड़ने वाले के विषय में पूछा।
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इस पर लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा, ‘नाथ शंभु धनु भंजन हारा, होइहै कोउ एक दास तुम्हारा।’ इसके बाद परशुराम-लक्ष्मण के बीच संवाद का लोगों ने आनंद उठाया। बाद में भगवान राम को विष्णु का अवतार समझने के बाद परशुराम उनके जयकारे लगाते वन को चले गए।
राम की भूमिका सोनू त्रिपाठी व लक्ष्मण का किरदार लखन (उन्नाव) ने निभाया। परशुराम का अभियन कमल किशोर शुक्ल (फतेहपुर), जनक राजू (टेढ़ा) और व्यास गद्दी सागर सिंह ने संभाली। तबले पर कमलाकांत (फतेहपुर) व नाल पर गुड्डन (पचनेही) ने संगत की। संचालन मनोज दीक्षित ने किया।